पुतिन की धमकी के बाद कैलिनिनग्राद पर 'महासंग्राम', NATO हलकान; मगर इसमें क्या है भारत का काम?
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कैलिनिनग्राद पर हमले की स्थिति में न्यूक्लियर हथियारों की चेतावनी दे दी है. लेकिन इस रूसी ठिकाने से भारत का भी अहम कनेक्शन है. चलिए आपको बताते हैं.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि अगर कैलिनिनग्राद पर अटैक होता है तो उनका मुल्क परमाणु हथियार से भी हमला कर सकता है. कैलिनिनग्राद रूस का एक इलाका है और बाल्टिक क्षेत्र में स्थित है. पुतिन ने सीधी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर इस इलाके पर हमला हुआ तो रूस अपने जखीरे में मौजूद 'सभी हथियारों' का इस्तेमाल कर सकता है, जिनमें परमाणु हथियार भी शामिल हैं. इस चेतावनी की वजह से पोलैंड और लिथुआनिया के बीच जमीन के एक संकरे हिस्से पर फिर से दुनिया की नजरें टिक गई हैं. इसे 'सुवाल्की गैप' के नाम से जाना जाता है. यह इलाका कैलिनिनग्राद और रूस के सहयोगी बेलारूस के बीच है और इसे रूस और नाटो के बीच टेंशन का एक बड़ा प्वॉइंट माना जाता है.
पुतिन ने कहा कि रूस का किसी भी यूरोपीय देश पर हमला करने का कोई इरादा नहीं है. लेकिन अगर पश्चिमी मुल्क तनाव बढ़ाते हैं या रूसी क्षेत्र को धमकाते हैं, तो वह जवाब देगा. उन्होंने बाल्टिक इलाके में नाटो की सैन्य गतिविधियों, रूसी जहाजों को रोकने की कोशिशों और कैलिनिनग्राद के बारे में दिए गए बयानों का जिक्र किया.
पुतिन ने कहा, 'बाल्टिक सागर में एक के बाद एक सैन्य अभ्यास, फिर हमारे जहाजों और नौकाओं को जब्त करने की कोशिशें. यह सब तनाव बढ़ाने वाली बातें हैं. और फिर हमने कैलिनिनग्राद क्षेत्र के बारे में बयान सुने.' उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा,'अगर रूस पर सीधा हमला होता है, यानी कैलिनिनग्राद और कुछ अन्य इलाके पर, तो जाहिर है कि हमारे जखीरे में मौजूद सभी हथियारों के इस्तेमाल का मुद्दा एजेंडे में आ जाएगा. इससे बचा नहीं जा सकता.'
यह टिप्पणी रूस की उस राजनयिक चेतावनी के बाद आई है, जिसमें कहा गया था कि अगर नाटो जमीन, हवा या समुद्र के जरिए कैलिनिनग्राद का संपर्क काटने की कोशिश करता है, तो रूस परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है. नाटो के महासचिव मार्क रुटे ने कहा कि गठबंधन डिफेंसव है और उन्होंने रूस से परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की बात करना बंद करने की गुजारिश की. उन्होंने यह भी कहा कि रूस से नाटो क्षेत्र को कोई खतरा नहीं है.
रूस के लिए कैलिनिनग्राद क्यों अहम है?
कैलिनिनग्राद रूस का एक ऐसा इलाका है, जहां भारी सैन्य तैनाती है. यह देश की मेनलैंड से अलग-थलग है. यह पोलैंड और लिथुआनिया के बीच स्थित है (जो दोनों NATO के सदस्य हैं) और इसकी सीमा बाल्टिक सागर से लगती है. इस इलाके की आबादी लगभग दस लाख है और यह अमेरिका के कनेक्टिकट राज्य से थोड़ा बड़ा है. इस इलाके को पहले कोनिग्सबर्ग के नाम से जाना जाता था और यह पूर्वी प्रशिया की राजधानी थी। दूसरे विश्व युद्ध के आखिर यानी अप्रैल 1945 में रेड आर्मी के कब्जे के बाद यह सोवियत संघ का हिस्सा बन गया. इसके बाद, जीत हासिल करने वाली मित्र देशों की ताकतों ने पूर्वी प्रशिया को बांट दिया और कोनिग्सबर्ग समेत उत्तरी हिस्सा सोवियत नियंत्रण में आ गया. बाद में इस शहर का नाम बदलकर कैलिनिनग्राद कर दिया गया.
लोकशन रूस के लिए गेमचेंजर
इसकी लोकेशन के कारण यह रूस के लिए बेहद अहम हो जाती है. इससे रूस की बाल्टिक सागर में सैन्य मौजूदगी बनी रहती है. यह रूस के मेनलैंड से तो दूर है. लेकिन कई NATO देशों के करीब है. कैलिनिनग्राद रूसी एयर डिफेंस, मिसाइल और नेवी के लिए एक बेस का काम करता है, जिससे रूस उत्तरी और मध्य यूरोप में अपनी सैन्य ताकत दिखा सकता है.
इस रणनीतिक अहमियत के साथ-साथ एक कमजोरी भी जुड़ी है. चूंकि यह इलाका दूसरे देशों की जमीन से घिरे होने के कारण रूस की मुख्य भूमि से अलग है, इसलिए किसी टकराव के दौरान यहां सामान पहुंचाने या सेना की मदद भेजने में रूस को लॉजिस्टिकल चुनौतियां आ सकती हैं. इसकी जमीनी सीमाएं पोलैंड और लिथुआनिया से लगती हैं, जबकि बाल्टिक सागर तक पहुंच इस इलाके की सैन्य और राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करती है.
फरवरी 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था, उसके बाद से कैलिनिनग्राद की स्थिति और भी संवेदनशील हो गई है. NATO ने अपने पूर्वी हिस्से को मजबूत किया है, जबकि फिनलैंड और स्वीडन साल 2023 और 2024 में इस गठबंधन में शामिल हुए. उनकी सदस्यता ने बाल्टिक सागर के आसपास सुरक्षा माहौल को बदल दिया है और इस इलाके में गठबंधन की सैन्य मौजूदगी को लेकर रूस की टेंशन बढ़ा दी हैं.
सुवाल्की गैप की कमजोरी
सुवाल्की गैप पोलैंड और लिथुआनिया की सीमा पर जमीन का एक संकरा हिस्सा है. यह लगभग 60 मील लंबा है. यह कैलिनिनग्राद को रूस के करीबी सहयोगी बेलारूस से अलग करता है. यह एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया जैसे बाल्टिक देशों को बाकी नाटो देशों से जोड़ने वाला जमीनी रास्ता भी है. इस रास्ते का रणनीतिक महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि अगर रूस इस पर कब्जा कर ले, तो हालात बदल सकते हैं. अगर रूसी सेना इस गैप से आगे बढ़ती है, तो कैलिनिनग्राद और बेलारूस के बीच संपर्क बन सकता है और बाल्टिक देशों तथा अन्य नाटो सदस्यों के बीच जमीनी संपर्क टूट सकता है.
ऐसा होने पर संघर्ष के समय एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया अलग-थलग पड़ सकते हैं. उनकी सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि नाटो सेनाएं पोलैंड और लिथुआनिया के रास्ते अपने सैनिकों, उपकरणों और जरूरी सामान को कितनी आसानी से पहुंचा सकती हैं. इसलिए, मिलिट्री एक्सपर्ट्स सुवाल्की गैप को गठबंधन की पूर्वी सुरक्षा व्यवस्था का एक कमजोर प्वॉइंट मानते हैं.
हालांकि, यह गैप रूस के किसी करीबी सैन्य अभियान के लिए कोई तय रास्ता नहीं है. इस पर कब्जा करने की किसी भी कोशिश का मतलब होगा पोलैंड और लिथुआनिया, और इस तरह नाटो के साथ सीधा सैन्य टकराव. यही वजह है कि बाल्टिक देशों की सुरक्षा से जुड़ी सैन्य योजनाओं और चर्चाओं में इस रास्ते का जिक्र बहुत ज्यादा होता है.
रूस के लिए, कैलिनिनग्राद एक मिलिट्री एसेट भी है और एक ऐसा इलाका भी कि अगर संघर्ष के कारण वहां पहुंचने के रास्ते बंद हो जाएं तो सुरक्षा करना मुश्किल हो सकता है. नाटो के लिए, सुवाल्की गैप इसलिए अहम है क्योंकि यह गठबंधन के बाल्टिक सदस्यों को बाकी ब्लॉक से जोड़ता है. इस ज्योग्राफी के कारण, यह इलाका सक्रिय सैन्य टकराव के बिना भी तनाव का एक सेंटरप्वॉइंट बन सकता है.
हालिया तनाव की वजह क्या है?
रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद बाल्टिक इलाके में नाटो की मौजूदगी बढ़ने से कैलिनिनग्राद को लेकर तनाव बढ़ गया है. मॉस्को ने इस इलाके के पास पश्चिमी देशों की सैन्य गतिविधियों की बार-बार आलोचना की है और कैलिनिनग्राद के बारे में यूरोपीय अधिकारियों की टिप्पणियों को धमकी भरा बताया है.
मई 2026 में, रूस ने लिथुआनिया के विदेश मंत्री की टिप्पणियों की निंदा की. उन्होंने कहा था कि नाटो को यह दिखाना होगा कि वह रूस के कैलिनिनग्राद में बनाए गए छोटे किले में घुस सकता है और उसके एयर डिफेंस और मिसाइल बेस को तबाह कर सकता है.
पश्चिमी देशों के एक सैन्य सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि अगस्त के मध्य में कैलिनिनग्राद के आसपास के एयरस्पेस में नाटो देशों के दर्जनों विमानों ने एक बिना घोषित ऑपरेशन में हिस्सा लिया. खबरों के मुताबिक, इस ऑपरेशन में यह दिखाया गया कि संघर्ष की स्थिति में यह गठबंधन इलाके के रेडियो और रडार लिंक के साथ-साथ एयर डिफेंस को भी बाधित कर सकता है.
नाटो का कहना है कि बाल्टिक सागर में उसकी बढ़ी हुई मौजूदगी, समुद्र के नीचे मौजूद जरूरी एनर्जी और कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए खतरों को लेकर जताई गई चिंताओं का एक जवाब है. गठबंधन ने अपनी पूर्वी सीमा पर सुरक्षा और मजबूती बढ़ाने की जरूरत का भी जिक्र किया है.
वहीं, रूस ने नाटो पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगाया है और अपने दूतावासों के जरिए कूटनीतिक बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट का इस्तेमाल करके उन सैन्य गतिविधियों और बयानों की ओर ध्यान खींचा है जिन्हें वह धमकी भरा मानता है. गठबंधन ने इस बात को खारिज कर दिया है कि उसका कैलिनिनग्राद पर हमला करने या उसे अलग-थलग करने का कोई इरादा है.
कैलिनिनग्राद से भारत के मिलिट्री रिश्ते
यूरोपीय सुरक्षा में अपनी रणनीतिक अहमियत के अलावा, कैलिनिनग्राद का रूस के यांतर शिपयार्ड के जरिए भारत से सीधे मिलिट्री संबंध हैं. इस इलाके में स्थित यांतर ने भारतीय नौसेना के लिए कई युद्धपोत बनाए हैं, जिनमें दो अपग्रेडेड तलवार-क्लास फ्रिगेट- INS तुशील और INS तमाल शामिल हैं. दोनों जहाज रूस में बनाए गए और कैलिनिनग्राद में ही भारतीय नौसेना में शामिल किए गए.
INS तुशील को 28 अक्टूबर, 2021 को यांतर शिपयार्ड में लॉन्च किया गया और दिसंबर 2024 में नौसेना में शामिल किया गया. इस प्रोजेक्ट के तहत दूसरा फ्रिगेट, INS तमाल, 1 जुलाई, 2025 को इसी जगह पर नौसेना में शामिल किया गया.
ये दोनों जहाज प्रोजेक्ट 1135.6 के तहत भारत और रूस के बीच चार फ्रिगेट बनाने के समझौते का हिस्सा हैं. इस समझौते में रूस में दो और भारत में दो जहाज बनाना शामिल है, जिसमें रूसी पक्ष से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और डिजाइन में मदद मिली है.
खत्म नहीं हुआ भारत का नेवी सहयोग
INS तमाल के नौसेना में शामिल होने के साथ ही इस प्रोजेक्ट का रूस में बनने वाला हिस्सा पूरा हो गया. हालांकि, इन दो युद्धपोतों की डिलीवरी के साथ ही रूस के साथ भारत का नौसैनिक सहयोग खत्म नहीं हुआ है.
बाकी दो फ्रिगेट, INS त्रिपुत और INS तवस्या, भारत में गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) में बनाए जा रहे हैं. पहला जहाज यानी त्रिपुत 23 जुलाई 2024 को लॉन्च किया गया. जबकि तवस्या 22 मार्च 2025 को लॉन्च किया गया. दोनों प्रोजेक्ट 1135.6 के डिजाइन पर आधारित हैं और इनका मकसद सतह, पानी के नीचे और हवा में कॉम्बैट ऑपरेशन करना है. ये जहाज 124.8 मीटर लंबे हैं, इनका डिस्प्लेसमेंट लगभग 3,600 टन है और ये ज्यादा से ज्यादा 28 नॉट की स्पीड तक पहुंच सकते हैं.
इनका निर्माण यह दिखाता है कि भारत रूस से सीधे युद्धपोत खरीदने से आगे बढ़कर विदेशी डिजाइन की मदद से उन्हें देश में ही बनाने की ओर बढ़ रहा है. रक्षा मंत्रालय ने इस प्रोजेक्ट को भारत की ओर से स्वदेशी युद्धपोत निर्माण को मजबूत करने की कोशिशों का हिस्सा बताया है. इन जहाजों में भारत में बने उपकरण, हथियार और सेंसर का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल किया गया है. इनमें ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम, टॉरपीडो लॉन्चर, सोनार और सहायक कंट्रोल सिस्टम जैसे स्थानीय स्तर पर बने पुर्जे शामिल हैं.
क्या भारत अब भी कैलिनिनग्राद पर निर्भर है?
इस खास प्रोजेक्ट के तहत भारत को कैलिनिनग्राद से अब पूरे फ्रिगेट नहीं मिल रहे हैं. हालांकि, गोवा में बन रहे दो जहाजों के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और डिजाइन में मदद की व्यवस्था के जरिए रूस के साथ जुड़ाव बना हुआ है.