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वियतनाम पहुंचे अजीत डोभाल, तो विक्रम मिस्री गए यूएई: ब्रह्मोस मिसाइल से लेकर रक्षा एक्सपो तक, भारत की नई रणनीति समझिए

दुनिया की उथल-पुथल से दूर भारत मूक रणनीति पर काम करते हुए अपने दुश्मनों के खिलाफ घेरा सख्त करने में लगा है. इसी णनीति के तहत NSA अजीत डोभाल वियतनाम पहुंचे, तो विदेश सचिव विक्रम मिस्री सोमवार को यूएई में थे.

वियतनाम पहुंचे अजीत डोभाल, तो विक्रम मिस्री गए यूएई: ब्रह्मोस मिसाइल से लेकर रक्षा एक्सपो तक, भारत की नई रणनीति समझिए
Image Credit: राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने वियतनाम का दौरा किया

दुनिया में रूस-यूक्रेन और यूएस-ईरान की जंग से सब जगह उथल-पुथल मची हुई है. पावरफुल देश चाहते हैं कि मजबूत राष्ट्र होने के नाते भारत तटस्थ न रहे और इस माहौल को शांत करने में अपनी भूमिका निभाए. लेकिन भारत इस बिचौलियागिरी पर लगातार खामोश बना हुआ है. उसकी यह चुप्पी अनायास नहीं है बल्कि एक सधी हुई रणनीति है. इस मूक रणनीति के जरिए वह अपने दोनों दुश्मनों यानी चीन-पाकिस्तान के खिलाफ अपने घेरे को और सख्त कर रहा है.  

पाकिस्तान को घेरने के लिए वह जहां इजरायल और यूएई के साथ मिलकर रक्षा सहयोग गहरा करने पर जोर दे रहा है. वहीं, चीन से मुकाबले के लिए उसके बैकयार्ड वाले मुल्कों से संबंध मजबूत करने में भी जुटा है. इसी रणनीति के तहत विदेश सचिव विक्रम मिस्री यूएई गए तो एनएसए अजित डोभाल वियतनाम पहुंचे हैं.

अचानक UAE क्या करने पहुंचे मिस्री?

सचिव विक्रम मिस्री ने पश्चिम एशिया में भारत के सबसे करीबी साझीदारों में से एक संयुक्त अरब अमीरात एक नवंबर से दो दिवसीय दौरा किया. इस दौरान उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने के लिए वहां के नेताओं और अधिकाकरियों से गहन चर्चा की.

मिस्री ने अबू धाबी में यूएई की अंतरराष्ट्रीय सहयोग राज्य मंत्री और भारत के लिए विशेष दूत रीम अल हाशमी से मुलाकात की. इस बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी की समीक्षा की. साथ ही, आपसी सहयोग के नए रास्ते तलाशने और क्षेत्रीय विकास के मुद्दों पर अपने विचार साझा किए.

भारतीय विदेश सचिव ने आर्थिक और निवेश संबंधों को स्पीड देने के लिए अबू धाबी के वित्त विभाग के अध्यक्ष और एलइमाड होल्डिंग कंपनी के ग्रुप सीईओ जैसम मोहम्मद बु अताबा अल जाबी से भी मुलाकात की. इसके साथ हीवे अबू धाबी के संस्कृति और पर्यटन विभाग के अध्यक्ष मोहम्मद खलीफा अल मुबारक से भी मिले. इन चर्चाओं का मकसद सांस्कृतिक और रचनात्मक आदान-प्रदान के क्षेत्रों में नए रास्ते खोजना था.

डोभाल ने भी किया वियतनाम का दौरा

वहीं भारत के स्पाई मास्टर कहे जाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने सोमवार को वियतनाम में थे. उन्होंने  राजधानी हनोई में उन्होंने वियतनाम के उप प्रधानमंत्री व रक्षा मंत्री जनरल फान वान ज्यांग के साथ लंबी मुलाकात की. इस मीटिंग में चीन से बढ़ते खतरे को देखते हुए द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को गहरा करने की जरूरत बताई.

जनरल फान वान ज्यांग ने यह भी कहा कि भारत क्षेत्र का एक पावरफुल देश है. उसे वियतनाम को रक्षा सहयोग बढ़ाने और सार्वभौमिकता के मुद्दे पर समर्थन देना जारी रखना चाहिए. फान ने दिसंबर में हनोई में आयोजित होने वाले 'वियतनाम इंटरनेशनल डिफेंस एक्सपो' में भाग लेने के लिए भारतीय रक्षा कंपनियों को भेजने के लिए भी आमंत्रित किया.

आंतरिक और विदेश मंत्रियों से की मुलाकात

डोभाल  भारतीय रक्षा मंत्रालय और रक्षा उद्यमों को दिसंबर में हनोई में आयोजित होने वाले 'वियतनाम इंटरनेशनल डिफेंस एक्सपो' में अपने उत्पादों को प्रदर्शित करने के लिए आमंत्रित किया.

अपने इस दौरे में डोभाल ने वियतनाम के जन सुरक्षा मंत्री जनरल लुओंग तम क्वांग और विदेश मंत्री ले होआई ट्रुंग से भी मुलाकात की. उन्होंने 2027 में दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों की 55वीं वर्षगांठ मनाने के तरीकों पर चर्चा की. वियतनाम के शीर्ष नेताओं से मुलाकात के बाद डोभाल हनोई स्थित ऐतिहासिक 'क्वान सु पैगोडा' पहुंचे. इसे दोनों देशों की बौद्ध विरासत का प्रतीक माना जाता है. वहां पर पैगोडा के मुख्य मठाधीश थिच थान न्हिएउ और नेशनल वियतनाम बुद्धिस्ट संघ के महासचिव थिच डुक थिएन ने अंगवस्त्र पहनाकर उनका स्वागत किया.

क्यों पास आ रहे हैं भारत और ताइवान?

असल में भारत और ताइवान के पास आने की एक ही वजह है और वह है चीन. दोनों मुल्क ड्रैगन की मनमानी से परेशान हैं. चीन जहां अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में धीरे-धीरे कब्जा करने की रणनीति पर बढ़ रहा है. वहीं, पूरे दक्षिण चीन सागर पर क्षेत्राधिकार का दावा उसने इस इलाके के देशों को समुद्री संसाधनों से लगभग महरूम कर दिया है.

इस क्षेत्र में पहले अमेरिका खुद को दुनिया की एकमात्र सुपरपावर के रूप में प्रोजेक्ट करता था. लेकिन जैसे-जैसे चीन आर्थिक और सैन्य रूप से ताकतवर होता चला गया. अमेरिका उससे भिड़ने के बजाय उसके तुष्टिकरण में लग गया. इसके चलते वहां के देश अब अपने आपको बेहद असुरक्षित करते हैं.

खतरनाक हथियारों से सज्जित करने में मदद

इसी मौके को भुनाते हुए भारत अब इस क्षेत्र को देशों को खतरनाक हथियारों से सुसज्जित करने में लगा है. उसने पहले फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल दी. इसके बाद इंडोनेशिया को यह मिसाइल खरीदने के लिए मनाया. अब वियतनाम भी भारत से यह घातक मिसाइल हासिल करना चाहता है. तीनों मुल्क ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस मिसाइल का कमाल देख चुके हैं, जब उसने चीन के एयर डिफेंस सिस्टम्स को कबाड़ बना दिया था.

यही नहीं, चीन के विरोध की वजह से वियतनाम अपने समुद्री क्षेत्र में तेल-गैस की खोज नहीं कर पा रहा था. उसने भारत को इस प्रोजेक्ट में साथ जुड़ने का ऑफर दिया. भारत ने चीन की मनमानी को धता बताते हुए ऑफर मंजूर किया और अब दोनों मुल्कों की कंपनियां गहरे समुद्र में तेल खोज रही हैं. इससे वियतनाम समेत क्षेत्र के देशों को भारत पर भरोसा बना है कि वह चीन की दादागिरी का डटकर मुकाबला कर सकता है और अगर जंग छिड़ी तो वह खुलकर उनकी मदद भी कर सकता है. 
 

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About the Author

Devinder Kumar

Devinder Kumar

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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