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न फंडिंग, न टीम... फिर भी इस दिव्यांग बच्चे ने बदल दी हजारों लोगों की तकदीर, पॉकेट मनी से फूड बैंक शुरू कर बना 'मसीहा'

दिव्यांगता को लोग अक्सर अपने पैरों की बेड़ियां समझ लेते हैं. लेकिन ब्रिटेन के एक बच्चे ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उसने कुछ ऐसा काम किया कि अब पूरी दुनिया में उसकी तारीफ हो रही है.

न फंडिंग, न टीम... फिर भी इस दिव्यांग बच्चे ने बदल दी हजारों लोगों की तकदीर, पॉकेट मनी से फूड बैंक शुरू कर बना 'मसीहा'
Image Credit: ब्रिटेन में एक दिव्यांग बच्चे ने जरूरतमंदों के लिए फूड बैंक शुरू किया

कहते हैं कि अगर हौसला बुलंद हो तो बड़ी-बड़ी मुसीबतें भी रास्ता छोड़ देती हैं. ब्रिटेन के रेडडच (Redditch) शहर में रहने वाले 9 साल के दिव्यांग बच्चे इसाक विनफिल्ड पर यह कहावत सटीक बैठती है. इसाक ने जब अपने आस-पास के कई जरूरतमंद लोगों को दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते देखा, तो उन्होंने चुप बैठने के बजाय खुद कुछ करने की ठानी. उसने नवंबर 2020 में अपनी जेब खर्च के पैसों से करीब 40 पाउंड का राशन खरीदा और अपने घर के बाहर ड्राइववे पर ही एक छोटा सा फूड बैंक लगा दिया. इससे जरूरतमंद लोगों को पेट भरने का एक जरिया मिला.

अब उस घटना को 6 साल हो चुके हैं और उनकी यह छोटी सी कोशिश एक बड़े अभियान के रूप में बदल चुकी है. उन्होंने 'फ्रेंड्स ऑफ इसाक फूड बैंक' नाम का बड़ा नेटवर्क बनाया है. इसके तहत शहर के अलग-अलग 6 स्थानों पर हर साल करीब 5000 लोगों का पेट भरा जाता है. अपनी इस मुहिम को सफल होते देख इसाक आज खुश हैं, लेकिन इसे शुरू करना उनके लिए आसान नहीं था.

न फंडिंग, न टीम, फिर भी शुरू कर दिया मिशन

जब इसाक ने यह शुरुआत की थी, तब उनके पास न तो कोई बड़ी फंडिंग थी, न ही कोई टीम या योजना. इसके बावजूद उन्होंने इस पहल को करने का फैसला किया. उन्हें इसकी प्रेरणा मशहूर फुटबॉलर मार्कस रैशफर्ड की ओर से बच्चों की भुखमरी के खिलाफ चलाए गए अभियान से मिली थी. जिनका कहना था कि किसी को भी सिर्फ इसलिए भूखा नहीं रहना चाहिए क्योंकि उसका वक्त बुरा चल रहा है.

मार्कस रैशफर्ड से प्रेरणा लेकर इसाक ने शुरुआत में अपने परिवार के ड्राइववे पर एक छोटा सा ग्रीनहाउस (पौधे उगाने वाला शेड) रखा और उसमें जरूरत का सामान भर दिया. वहां पर उसने एक बोर्ड टांग दिया, जिस पर लिखा था कि जिसे जो चाहिए, वह ले जा सकता है. वहां पर कोई फॉर्म भरने या किसी वाउचर की औपचारिकता भी नहीं रखी गई. लोग बिना किसी झिझक के आते, अपनी जरूरत का सामान उठाते और चले जाते. इस निस्वार्थ मदद ने उन रुकावटों को खत्म कर दिया, जो अक्सर जरूरतमंदों को मदद मांगने से रोकती हैं.

एक शेड से लेकर छह शाखाओं तक का सफर

छह साल बाद इसाक का यह फूड बैंक एक रजिस्टर्ड कम्युनिटी इंटरेस्ट कंपनी बन चुका है. उनके पास दो वैन, एक गोदाम और रेडडच शहर में छह अलग-अलग जगहें हैं. संगठन की वेबसाइट के मुताबिक, इनमें थ्रॉकमॉर्टन रोड पर 'इसाक्स प्लेस', बैचले में 'सैमुअल्स प्लेस', एबेडेल सोशल क्लब में 'रसेल रिट्रीट', मोन्स मूट नॉर्थ इंडस्ट्रियल एस्टेट में 'फ्रैंक शेड' और चर्च हिल में 'विलो ट्री' शामिल हैं.

ये सभी मिलकर हर हफ्ते करीब 300 परिवारों का पेट भर रहे हैं. खास बात यह है कि ये शेड साल के 365 दिन, यानी छुट्टियों और वीकेंड पर भी खुले रहते हैं. उनके नेटवर्क में 10 से 15 वालंटियर्स हैं. उनके साथ ही, समाज के अन्य लोगों का भी उन्हें सहयोग मिलता रहता है. जिससे यह पूरा सिस्टम चल रहा है.

सिर्फ राशन ही नहीं, हर जरूरत का सामान

खास बात ये है कि उनके शेड्स में केवल दाल-चावल या डिब्बाबंद खाना ही नहीं मिलता, बल्कि टॉयलेट्रीज, सफाई का सामान, पालतू जानवरों का खाना, सैनिटरी पैड और बच्चों के लिए जरूरी चीजें भी मिलती हैं. लोग सीधे शेड पर आकर सामान दे सकते हैं या गोफंडमी और अमेजन विशलिस्ट के जरिए आर्थिक मदद भी करते हैं. सुपरमार्केट, स्थानीय बिजनेस, कॉलेज और वाईएमसीए जैसे संगठन भी इस मुहिम से जुड़े हुए हैं.

रूढ़ियों को तोड़ रही बच्चे की मिसाल

इसाक की मां क्लेर सिमंस बताती हैं कि इसाक ने बिना कुछ ज्यादा कहे, अपने कामों से यह साबित कर दिया कि उम्र या शारीरिक स्थिति से ज्यादा इरादे मायने रखते हैं. उनकी इस पहल ने दूसरे दिव्यांग बच्चों को भी आगे बढ़ने का हौसला दिया है. आज ड्राइववे से शुरू हुआ वह छोटा सा काउंटर हजारों लोगों का सहारा बन चुका है. उन्होंने अकेले रेडडच नहीं बदला, बल्कि अपने साथ सैकड़ों लोगों को जोड़ा. यह इस बात की सबसे बड़ी मिसाल है कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े पदों की नहीं, बल्कि सिर्फ पहल करने की जरूरत होती है.
 

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About the Author

Devinder Kumar

Devinder Kumar

अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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