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एक 19 साल के लड़के ने कमाल कर दिया है. उसने साबित कर दिया है कि एक नेक सोच कैसे हजारों जिंदगियों को बदल सकती है. ये कहानी है न्यू जर्सी के 19 साल के डेरियस ब्राउन की है, जिन्होंने 10 साल की उम्र में शुरू की गई एक छोटी सी कोशिश से हजारों बेजुबानों को घर दिलाया है. डिस्लेक्सिया की चुनौती को मात देकर उन्होंने शेल्टर होम के बेजुबानों के लिए रंग-बिरंगे बो-टाई बनाने का अनोखा मिशन शुरू किया. उनका यह आइडिया इतना असरदार साबित हुआ कि अब तक 7,000 से ज्यादा जानवरों को गोद लिया जा चुका है और शेल्टर पेट्स की मदद के लिए 4 करोड़ रुपये से अधिक का फंड जुट चुका है.
दरअसल, डेरियस ब्राउन डिस्लेक्सिया से जूझ रहे थे. यह कोई बीमारी या मंदबुद्धि होने का संकेत नहीं है, यह सिर्फ सीखने और पढ़ने से जुड़ी एक परेशानी है. इसमें इंसान को अक्षर पहचानने, शब्द पढ़ने, स्पेलिंग याद रखने और सही बोलने में दिक्कत होती है. ऐसे लोगों का दिमाग बिल्कुल सामान्य या कई बार आम लोगों से भी ज्यादा क्रिएटिव होता है, बस उनका दिमाग शब्दों और अक्षरों को थोड़ा अलग तरीके से समझता है.
(@GratitudeDNA) June 22, 2019
बचपन में ठीक से पढ़ और बोल न पाने के कारण साथी बच्चे डेरियस का मजाक बनाते थे. उस मुश्किल वक्त में उन्हें जानवरों और बो-टाई से सुकून मिलता था. बो-टाई पहनने से उनका आत्मविश्वास बढ़ता था, इसी से उन्हें 10 साल की उम्र में एक अनोखा आइडिया आया कि अगर बो-टाई उन्हें हिम्मत दे सकती है, तो क्या यह शेल्टर होम के बेसहारा कुत्तों और बिल्लियों की किस्मत नहीं बदल सकती?
डेरियस अब 19 साल के हैं और उनकी यह छोटी सी सोच आज दुनिया भर में छा चुकी है. अपनी संस्था 'बोक्स एंड पॉज' के जरिए वे शेल्टर होम्स में 7,000 से ज्यादा बो-टाई बांट चुके हैं. इसके साथ ही उन्होंने बेसहारा जानवरों की देखभाल के लिए 4 करोड़ रुपये से ज्यादा की मदद भी जुटाई है.
बचपन की कमजोरी बनी सबसे बड़ी ताकत
डेरियस जब प्राइमरी स्कूल में थे, तब उन्हें डिस्लेक्सिया और स्पीच डिसऑर्डर (बोलने में कठिनाई) का पता चला. स्कूल में अक्सर वे अलग-थलग महसूस करते थे. अपनी इस हिचक को मिटाने के लिए उन्होंने बो-टाई पहनना शुरू किया, लोगों से तारीफ मिली तो हौसला बढ़ा.
2016 में घर से शुरू हुआ था बो-टाई का सफर
साल 2016 में जब अमेरिका में आए तूफानों के चलते कई पालतू जानवर बेघर होकर शेल्टर होम पहुंचे, तो डेरियस का दिल पसीज गया. उन्होंने अपनी मां सिरिटा ब्राउन की मदद से घर पर ही रंग-बिरंगे कपड़ों से बो-टाई सिलना सीखा. मकसद साफ था शेल्टर के जानवरों को सुंदर दिखाना, ताकि लोग उन्हें आसानी से गोद ले सकें.
बो-टाई का जादू: महीनों से बंद बेजुबानों को दिनों में मिला घर
पिंजरों में बंद मायूस जानवरों की साधारण तस्वीरें सोशल मीडिया की भीड़ में खो जाती थीं, लेकिन जैसे ही इन कुत्तों और बिल्लियों के गले में रंग-बिरंगी, स्टाइलिश बो-टाई बंधी, लोगों की नजरें वहीं ठहर गईं, फिर क्या था, पूरा नजारा ही बदल गया.
बो-टाई पहने जानवरों की तस्वीरों को सामान्य से कई गुना ज्यादा लाइक्स, शेयर और एडॉप्शन पूछताछ मिलने लगी. शेल्टर होम के कर्मचारियों के मुताबिक, जो कुत्ते-बिल्लियां महीनों से पिंजरों में पड़े थे, वे बो-टाई वाली नई तस्वीरों के बाद कुछ ही दिनों में गोद ले लिए गए. खास बात ये है कि अमेरिका के दर्जनों राज्यों के अलावा विदेशों के एनिमल शेल्टर्स में भी डेरियस के तैयार किए गए बो-टाई भेजे जा चुके हैं.
'बोक्स एंड पॉज' सिर्फ जानवरों को सजाने तक सीमित नहीं है. संस्था ने मर्चेंडाइज बिक्री, चंदे और कार्यक्रमों के जरिए अब तक 5 लाख डॉलर से ज्यादा का फंड जुटाया है, इस रकम का इस्तेमाल सीधे रेस्क्यू किए गए जानवरों की मदद में होता है. इस पैसे के जरिए घायल या बीमार जानवरों का इलाज और सर्जरी कराई जाती है. जरूरी टीकाकरण होता है. इसके अलावा शेल्टर होम में जानवरों के भोजन, बिस्तरों और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा किया जाता है.
एक छोटी सोच से इतना बड़ा बदलाव
डेरियस के लिए पढ़ने और बोलने की दिक्कतों के बीच इतना बड़ा एनजीओ संभालना आसान नहीं था. लेकिन उन्होंने अपनी मां और युवाओं की टीम के दम पर यह कर दिखाया. आज दुनिया भर से लोग उन्हें तस्वीरें भेजते हैं, जिन्होंने उनकी बो-टाई देखकर जानवरों को अपनाया और अब वे बेजुबान घरों में आराम से रह रहे हैं. डेरियस की कहानी सिखाती है कि अगर नीयत साफ हो, तो एक छोटा सा विचार भी हजारों बेसहारा जिंदगियों की तकदीर बदल सकता है.