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हिमालयी सुनामीः नेपाल को दोबारा खड़े होने में लगेंगे 48,000 करोड़; PM बालेन को जिस फंड से आस, वो खुद बदहाल

नेपाल ने तुरंत आर्थिक मदद पाने के लिए संयुक्त राष्ट्र के 'लॉस एंड डैमेज फंड' (FRLD) से गुहार लगाई है, लेकिन दुख की बात यह है कि अमीर मुल्कों द्वारा पैसा न देने की वजह से यह फंड खाली है. आइए जानते हैं नेपाल ने इस आपदा के लिए किन देशों को जिम्मेदार ठहराया है.

Written ByBhoopendra Rai
Published: Sep 04, 2026, 06:54 PM IST|Updated: Sep 05, 2026, 09:01 PM IST
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हिमालयी सुनामीः नेपाल को दोबारा खड़े होने में लगेंगे 48,000 करोड़; PM बालेन को जिस फंड से आस, वो खुद बदहाल
Image Credit: नेपाल ने तुरंत आर्थिक मदद पाने के लिए जिस फंड से मदद मांगी है, वो खुद खाली है.

About the Author

Bhoopendra Rai

Bhoopendra Rai

पत्रकारिता में 9 साल से सक्रिय भूपेंद्र कुमार राय Zee News में सीनियर सब एडिटर के तौर पर न्यूज टीम का हिस्सा हैं, देश विदेशी की खबरें कवर करते हैं. 2017 में ETV Bharat (हैदराबाद) से करियर की शुरुआत करने के बाद वे 2020 में Zee News पहुंचे, जहां 2022 तक काम किया. 2023 में News24 की स्पोर्ट्स टीम को लीड करने का मौका मिला. इसके बाद India Daily Live में बतौर चीफ सब एडिटर स्पोर्ट्स टीम के साथ जुड़े. 2024 में दोबारा News24 लौटे और नई स्पोर्ट्स वेबसाइट लॉन्चिंग का अहम हिस्सा रहे. अक्टूबर 2025 में News24 से अलविदा लेकर एक बार फिर Zee News पहुंचे हैं. खेलों में गहरी रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, ओलंपिक गेम्स, हॉकी वर्ल्ड कप समेत बड़े खेल इवेंट को कवर करने का अनुभव है. ब्रेकिंग न्यूज, क्रिकेट एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर अच्छी पकड़ है. जी न्यूज में खेल से जुड़ी खबरों के बाद अब न्यूज टीम के साथ रियलटाइम न्यूज पर काम कर रहे हैं. एक्सप्लेनर और किसी भी मुद्दे पर रिसर्च के साथ उसे आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. आप Bhoopendra.Rai@zeemedia.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facebook से जुड़ सकते हैं.
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नेपाल इस वक्त सदी की सबसे भयानक आपदा से जूझ रहा है. चीन-तिब्बत सीमा पर एक ग्लेशियर झील फटने से भोटेकोशी नदी में बर्फीले पानी और पत्थरों का ऐसा सैलाब आया कि जो सामने दिखा, सब बह गया. सरकार ने इसे 'हिमालयी सुनामी' नाम दिया है, जिसमें अब तक 1,200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लापता हैं. इस भारी बर्बादी के बीच नेपाल ने दुनिया के अमीर और ताकतवर मुल्कों के सामने हाथ फैलाने से साफ इनकार कर दिया है. नेपाल का कहना है कि उसे भीख या दान नहीं चाहिए, उसका जो भी नुकसान हुआ है उसका हर्जाना भरा जाए.

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि यह कोई दान मांगने का मामला नहीं है, बल्कि दुनिया की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह नुकसान की भरपाई करे. नेपाल सरकार का कहना है कि वह ऐसे जलवायु संकट की मार झेल रहा है, जिसे उसने पैदा ही नहीं किया.

नेपाल ने किससे मांगी मदद?

नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका को दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण (ग्रीनहाउस गैसें) फैलाने वाला देश बताया है. नेपाल का कहना है कि इन्हीं देशों के प्रदूषण और ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से बागमती प्रदेश के कई जिलों में यह भीषण बाढ़ आई है, इसलिए इन बड़े देशों को इस तबाही के नुकसान की भरपाई के लिए 'जलवायु मुआवजा' (क्लाइमेट कंपनसेशन) देना चाहिए.

इस पूरे मामले को 4 आसान सवालों और जवाबों से समझिए

1. नेपाल में असल में हुआ क्या और नुकसान कितना बड़ा है?

26 अगस्त को पहाड़ों पर जमी बर्फ की झील अचानक फट गई थी, जिसे वैज्ञानिक भाषा में GLOF (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) कहते हैं. इस आपदा में 1,200 से अधिक मौतें हुईं और हजारों लोग लापता हैं. नौवें दिन भी रेस्क्यू जारी है.

अचानक आई बाढ़ के चलते दर्जनों हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, पक्के पुल, सड़कें और पूरे के पूरे गांव मलबे में दब गए. नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले के मुताबिक, देश को दोबारा पैरों पर खड़ा करने के लिए करीब 4 से 5 अरब डॉलर (35,000 से 45,000 करोड़ रुपये) चाहिए, यह नेपाल की पूरी जीडीपी का लगभग 10% है.

2. नेपाल दुनिया से 'हर्जाना' क्यों मांग रहा है?

नेपाल का तर्क सीधा और साफ है तबाही की वजह ग्लोबल वॉर्मिंग है और इसके जिम्मेदार बड़े देश हैं. दुनिया में जो जहरीला धुआं और कार्बन फैल रहा है, उसमें नेपाल की हिस्सेदारी न के बराबर है. प्रदूषण में नेपाल का हिस्सा 0.1% भी नहीं है. नेपाल सरकार का दावा है कि अमेरिका, चीन और भारत जैसे बड़े और अमीर देशों की फैक्ट्रियों-गाड़ियों से धरती गर्म हो रही है, इस गर्मी से हिमालय के ग्लेशियर पिघले और फूटे.

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल का कहना है कि 'जब प्रदूषण हमने फैलाया ही नहीं, तो बर्बादी का बिल हम क्यों भरें? यह अमीर देशों की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि वे मुआवजा दें.'

पर्यावरण विशेषज्ञ हरजीत सिंह (संस्थापक निदेशक, सतत संपदा जलवायु फाउंडेशन) के अनुसार, अध्ययनों से साबित हुआ है कि ऐतिहासिक रूप से प्रदूषण फैलाने में अमेरिका और यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. अकेले अमेरिका पर जलवायु नुकसान का 30% और यूरोपीय संघ पर 24% का दायित्व बनता है, जबकि भारत की ऐतिहासिक हिस्सेदारी बेहद कम (लगभग 0.5%) रही है.

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कांतिपुर टीवी से बातचीत में साफ कहा कि नेपाल अब दुनिया के सामने मदद की गुहार नहीं लगाएगा, बल्कि अपने हक, न्याय और नुकसान के मुआवजे (क्लाइमेट कंपनसेशन) की मांग करेगा.नेपाल ने तुरंत आर्थिक मदद पाने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) के 'लॉस एंड डैमेज फंड' का दरवाजा खटखटाया है. इसके साथ ही, वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इस भयानक आपदा का मुद्दा उठाने और जलवायु न्याय के लिए अपनी आवाज बुलंद करने की तैयारी में है.

 'द काठमांडू पोस्ट' की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल सरकार ने भारत, चीन और अमेरिका से अलग-अलग मुआवजा मांगने के बजाय संयुक्त राष्ट्र के 'लॉस एंड डैमेज फंड' को सीधे औपचारिक अर्जी भेजी है. इस फंड को बनाने पर सहमति 2022 के COP27 जलवायु सम्मेलन में बनी थी, और 2023 के COP28 सम्मेलन में इसे गरीब व संवेदनशील देशों की मदद के लिए शुरू किया गया था. नेपाल की ओर से भेजे गए इस आधिकारिक पत्र पर वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और वन एवं कृषि मंत्री गीता चौधरी, दोनों ने मिलकर दस्तखत किए हैं.

3. नेपाल ने जिस FRLD के जरिए मदद मांगी उसमें कितना पैसा है?

नेपाल, संयुक्त राष्ट्र के 'लॉस एंड डैमेज फंड' यानी FRLD से तुरंत मदद मांगने वाला पहला देश है. FRLD का पूरा नाम 'Fund for Responding to Loss and Damage' (नुकसान और क्षति राहत कोष) है. आसान शब्दों में कहें तो यह संयुक्त राष्ट्र (UN) की तरफ से बनाया गया एक आपातकालीन गुल्लक (फंड) है, जो जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण आई भयानक आपदाओं (जैसे बाढ़, सूखा या तूफान) में भारी तबाही झेलने वाले देशों की मदद के लिए है.

FRLD में कितना पैसा है?

दुनिया के अमीर और विकसित देशों ने इसमें करीब 82 करोड़ डॉलर (लगभग 6,800 करोड़ रुपये) देने का सिर्फ वादा किया था, लेकिन खाते में जमा सिर्फ 35 करोड़ अमेरिकी डॉलर ही हुए. इस फंड के नियम ऐसे हैं कि किसी एक प्रोजेक्ट के लिए अधिकतम 20 करोड़ डॉलर ही दिए जा सकते हैं, जबकि नेपाल का नुकसान 4 अरब डॉलर से ज्यादा हुआ है. इसका मतलब यह है कि नेपाल को फंड में मौजूद मदद की राशि से कई गुना अधिक की जरूरत है. ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस फंड को तबाही के शिकार देशों की फौरी ढाल बनना था, वह खुद पैसों की भारी कमी और फाइलों के फेर में फंसा हुआ है.

4. अब आगे क्या करेगा नेपाल?

नेपाल अब चुप बैठने के मूड में नहीं है. सरकार प्रधानमंत्री बालेन शाह को सीधे न्यूयॉर्क में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भेजने की तैयारी कर रही है. संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र 8 सितंबर से शुरू होगा, जिसकी आम बहस सितंबर के तीसरे और चौथे सप्ताह में निर्धारित है. इस मंच पर जाकर नेपाल अपनी स्थिति और न्याय की मांग कर सकता है.

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