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क्या हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं? सदियों से इंसान के मन में यह सवाल आता है, लेकिन अभी तक इसका जवाब नहीं मिल पाया है. अब नासा इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश में है. इसके लिए नासा एक ऐसा अनोखा मिशन शुरू करने जा रही है, जो ब्रह्मांड के रहस्यों से पर्दा उठाएगा. सबसे अच्छी बात यह है कि इस बड़े और ऐतिहासिक मिशन की कमान हमारे अपने देश की एक बेटी के हाथों में है. बेंगलुरु के पास पली-बढ़ी वैज्ञानिक डॉ. राम्या मंजूनाथ आंचे अब नासा के इस खास मिशन को लीड कर रही हैं. यह मिशन न सिर्फ यह बताएगा कि तारों और ग्रहों का जन्म कैसे होता है, बल्कि एलियन लाइफ यानी दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं को तलाशने का रास्ता भी साफ करेगा.
नासा के इस नए और बड़े मिशन का नाम PUFFINS यानी पफिंस है.
नासा ने अपने एस्ट्रोफिजिक्स पायनियर्स प्रोग्राम के तहत इस मिशन के लिए लगभग 2 करोड़ डॉलर यानी करीब 165 से 170 करोड़ रुपये का फंड दिया है. इसे साल 2030 तक अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी है. पफिंस मिशन के तहत एक छोटा सेटेलाइट स्पेस में भेजा जाएगा, जिसमें 10 इंच का एक विशेष टेलिस्कोप लगा होगा. यह सेटेलाइट हमारे ब्रह्मांड के करीब 70 अलग-अलग तारों से आने वाली पराबैंगनी यानी अल्ट्रावायलेट रोशनी को चेक करेगा.
अक्सर हम अपने घरों में जमी धूल को बेकार मानकर साफ कर देते हैं, लेकिन स्पेस की दुनिया में ऐसा नहीं है. डॉ. राम्या के अनुसार जब भी कोई नया तारा बनता है, तो उसके चारों तरफ गैस और धूल का एक बड़ा सा घेरा बन जाता है. धीरे-धीरे यही धूल आपस में जुड़कर नए ग्रह, छोटे पिंड और एस्टेरॉयड बनते हैं. सरल शब्दों में कहा जाए तो, धूल ही हमारा बीता हुआ कल है और धूल ही हमारा आने वाला कल.
सिलिकेट
जो रेत जैसी दिखती है.
कार्बन कण
जो कोयले की कालिख की तरह होते हैं.
अंतरिक्ष में तैरने वाले ये धूल के कण इतने बारीक होते हैं कि किसी इंसान के एक बाल की मोटाई में ऐसे सैकड़ों कण समा जाएं. ये कण 0.01 से 0.1 माइक्रोन के बीच होते हैं. नार्मल दूरबीनें या इंफ्रारेड टेलिस्कोप इतने बारीक कणों को ठीक से नहीं देख पाते. इसके लिए पराबैंगनी रोशनी यानी अल्ट्रावायलेट लाइट की जरूरत पड़ती है. जब तारों की रोशनी इन कणों से होकर गुजरती है, तो वैज्ञानिक रोशनी की दिशा और उसमें आने वाले बदलाव यानी पोलराइजेशन को देखकर यह पता लगा लेते हैं कि धूल किस चीज से बनी है. पिछले तीन दशकों यानी करीब 30 सालों में पहली बार नासा इस तकनीक का इस्तेमाल करके इतने छोटे कणों का नक्शा तैयार करने जा रहा है.
बेंगलुरु के पास एक मिडिल क्लास वाले माहौल में पली-बढ़ीं डॉ. राम्या जब स्कूल में थीं, तब उन्होंने भारत की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के बारे में पढ़ा था. उसी पल से उनके दिल में अंतरिक्ष को जानने की ललक पैदा हुई. आज जब वे यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना के स्टीवर्ड ऑब्जर्वेटरी में रिसर्च प्रोफेसर हैं, तब भी उनका मानना है कि ब्रह्मांड हमें यह सिखाता है कि हम इस विशाल दुनिया में कितने छोटे हैं, और फिर भी कितना कुछ जानना बाकी है. अगर नासा का यह मिशन सफल रहता है, तो हम यह जान सकेंगे कि पृथ्वी की तरह दूसरे ग्रहों पर जीवन पनपने की परिस्थितियां कैसे बनती हैं.