मंगल पर पानी का बड़ा सबूत! NASA के पर्सिवरेंस रोवर को मिलीं ऐसी चट्टानें, जिनका 3 बार पानी से हुआ है सामना
नासा के पर्सिवरेंस रोवर ने मंगल ग्रह पर ऐसी आग्नेय चट्टानें खोजी हैं, जिनका पानी से कम से कम तीन बार आमना-सामना हुआ है. इस हैरान करने वाली खोज ने लाल ग्रह के प्राचीन इतिहास और जीवन की संभावनाओं को लेकर अब एक नई थ्योरी पेश की है.
मंगल ग्रह पर कभी पानी था या नहीं, यह सवाल कई सालों से वैज्ञानिकों को उलझाता रहा है. अब इसी सवाल को लेकर नासा के वैज्ञानिकों को ऐसी सफलता हाथ लगी है, जिसने लाल ग्रह के इतिहास को लेकर अब तक की सारी थ्योरी को हिलाकर रख दिया है. नासा के रोवर ने मार्स की सतह पर कुछ ऐसा खोज निकाला है, जिसकी वैज्ञानिकों को दूर-दूर तक उम्मीद नहीं थी.
लाल ग्रह यानी मंगल को लेकर वैज्ञानिकों की खोज लगातार नए-नए सवालों के जवाब दे रही है. अब नासा के पर्सिवरेंस रोवर ने लाल ग्रह पर ऐसी चट्टानों का पता लगाया है, जो मंगल के शुरुआती दौर में वहां पानी की गतिविधियों की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं. खास बात यह है कि वैज्ञानिकों को यहां तलछटी चट्टानों की उम्मीद थी, लेकिन रोवर को आग्नेय चट्टानें मिलीं. इन चट्टानों की जांच में पानी के साथ कम से कम तीन अलग मौकों पर हुई प्रतिक्रिया के संकेत मिले हैं.
क्या थी वैज्ञानिकों की उम्मीद और क्या मिला?
कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरनमेंट जर्नल की एक स्टडी के अनुसार साल 2023 के सितंबर में जब मंगल पर पर्सिवरेंस रोवर उस इलाके में पहुंचा जिसे वैज्ञानिक मार्जिन यूनिट कहते हैं, तो उन्हें उम्मीद थी कि वहां रेत और पुरानी झील के किनारे की परतें मिलेंगी. ऐसी सेडिमेंट्री चट्टानों में प्राचीन सूक्ष्मजीवों के निशान मिलने की संभावना सबसे ज्यादा होती है. साथ ही, वहां कार्बोनेट मिनरल्स होने के संकेत भी मिले थे, जो अमूमन झीलों में बनते हैं.
लेकिन जब रोवर ने वहां जांच शुरू की, तो स्थिति पूरी तरह से अलग निकली. वहां रेत की परतें नहीं, बल्कि आग्नेय चट्टानें मिलीं. यानी वे पत्थर जो जमीन के अंदर मैग्मा के ठंडा होने या ज्वालामुखी गतिविधियों से बनते हैं.
पानी से हुआ था तीन बार आमना-सामना!
इन चट्टानों के अंदर मौजूद मिनरल क्रिस्टल इस बात की गवाही देते हैं कि इनका पानी के साथ कम से कम तीन बार अलग-अलग मौकों पर सामना हुआ था. रोवर पर लगे सुपरकैम टूल ने लेजर की सहायता से इन पत्थरों की केमिकल बनावट को स्कैन किया.
इस रिसर्च की राइटर कैंडिस बेडफोर्ड के मुताबिक पहले वैज्ञानिकों को लगता था कि यहां सिर्फ एक ही पुरानी झील का असर है. लेकिन अब साफ हो गया है कि यह जगह कभी अलग-अलग वॉटर सिस्टम का एक बड़ा स्थान हुआ करती थी.
जीवन की तलाश में क्यों खास है यह खोज?
रोवर ने जब इस यूनिट के ऊंचे इलाकों की जांच की, तो वहां ओलिविन नाम के मिनरल वाले सख्त पत्थर मिले, जिन पर पानी का नामोनिशान नहीं था. लेकिन जैसे ही रोवर नीचे की तरफ उतरा, तस्वीर बदल गई. वहां ओलिविन के टुकड़े टूटे हुए मिले और उनके बीच सिलिका भी पाई गई.
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वैज्ञानिकों के लिए यह बहुत काम की बात है. जब पानी ओलिविन के साथ रिएक्ट करता है, तो उससे हाइड्रोजन निकलती है जो कुछ छोटे जीवों यानी माइक्रोब्स का भोजन बन सकती है. इसके साथ ही, यह प्रक्रिया कार्बोनेट और सिलिका पीछे छोड़ती है, जो प्राचीन जीवन के निशानों को करोड़ों साल तक सुरक्षित रख सकती है.
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