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Significance of Receiving a Radio Signal from Galaxy: ब्रह्मांड की अरबों-खरबों आकाशगंगाओं में से एक हमारी अपनी अकाशगंगा मिल्की-वे. इस आकाशगंगा में इंसानी जीवन से भरा एक ही ग्रह- हमारी धरती यानी . हमारी पृथ्वी. आज इस पृथ्वी के इंसान तकनीकी रूप से इतने दक्ष हैं कि वो धरती से बाहर चंद्रमा पर उतर सकते हैं, अपने सौरमंडल से बाहर तक देख सकते हैं. ये जानने की कोशिश कर सकते हैं कि क्या हमारी धरती जैसा जीवन से भरा ग्रह कोई और भी है?
धरती जैसे दिखने वाले, जहां जीवन की संभावना हो, उसे स्पेस साइंस की भाषा में एक्सोप्लेनट कहते हैं. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी, जिसका स्पेस मिशन पूरी दुनिया में सबसे बड़ा और व्यापक है, उसने अपने एक्सोप्लेनेट की सूची में 6000 से ज्यादा ग्रह शामिल हैं. ये इतनी दूर हैं, कि इनमें से सिर्फ 100 एक्सोप्लेनेट की खोज डाइरेक्ट इमेजिंग के जरिए हुई है.
इस दिशा में वैज्ञानिकों को एक बड़ी कामयाबी मिली है. वैज्ञानिकों ने पहली बार सौरमंडल के बाहर किसी ग्रह से धरती तक पहुंचे डायरेक्ट रेडियो सिग्नल को कैप्चर किया है. इस रहस्यमयी रेडियो सिग्नल ने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है. ये सिग्नल पृथ्वी से 63 प्रकाश वर्ष दूर एक विशालकाय ग्रह बीटा पिक्टोरीस-बी से आया है.
आज के जी स्पेशल में समझेंगे- वैज्ञानिकों के इसी कौतुहल को. 63 प्रकाश वर्ष दूर ग्रह से आया ये रेडियो सिग्नल क्या संकेत देता है, क्या ये रेडियो सिग्नल किसी एलियन सभ्यता की तरफ से भेजा गया है, या फिर इसके पीछे रहस्य कुछ और है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या ये रेडियो सिग्नल वैसा ही है, जैसा धरती से अंतरिक्ष में भेजा जाता रहा है? अगर ऐसा है, तो क्या 63 प्रकाश वर्ष दूर क्या जीवन के संकेत पुख्ता हैं?
सभ्यता की शुरुआत से ही इंसानों की सहज जिज्ञासा रही है आसमान और अंतरिक्ष को लेकर. क्या इस अंतरिक्ष में हमारे जैसा कोई है. अगर है, तो कहां है, हमसे कितनी दूर है. और अगर उसका वजूद है, तो वो क्या हमारी तरह दिखता है?
एलियंस की परिकल्पना इंसान के इन्हीं सवालों से उपजी. अब तो खैर इसे लेकर कुछ वैज्ञानिक भी कहते नजर आते हैं, कि इतने बड़े ब्रह्मांड में ये संभव ही नहीं, कि जीव के रूप में हमीं अकेले हों. हमें जीवन देने वाली धरती इकलौती ग्रह हो. क्योंकि हमारी धरती इस दृश्य ब्रह्मांड, यानी ब्रह्मांड के जितने हिस्से को हम देख सकते हैं, उसमें धरती का वजूद रेत के एक कण सरीखा ही है.
इसलिए मौजूदा तकनीकों से धरती के वैज्ञानिकों की नजर अंतरिक्ष के सूदर कोनों तक जाती है, इसके लिए 30 से ज्यादा टेलिस्कोप धरती से लेकर अंतरिक्ष में अलग-अलग जगहों में एक्टिव हैं. ऐसा ही एक टेलिस्कोप दक्षिण अफ्रीका में लगा है, मीरकैट रेडियो टेलिस्कोप ऐरे.
वैसे बीटा पिक्टोरिस स्पेस साइंटिस्ट के लिए कोई नया ग्रह नहीं है. इस पर वैज्ञानिकों की नजर दो साल से हैं. वैज्ञानिक अब तक बीटा पिक्टोरिस बी के साथ डी और इसके पूरे स्टार सिस्टम की जानकारी अपने डेटाबेस में दर्ज कर चुके हैं. इस बार जो बीटा पिक्टोरिस से जो दिखा वो अपने आप में अनूठा था. इस ग्रह से एक नहीं बल्कि छोटे-छोटे रेडियो सिग्नल्स धरती तक बार बार पहुंचे.
किसी भी ग्रह से रेडियो सिग्नल के निकलने के दो कारण होते हैं. एक तो उस ग्रह का चुंबकीय बल और दूसरा उस ग्रह पर मौजूद किसी मशीन या यंत्र से. यानी एक कारण प्राकृतिक है, तो दूसरा उस ग्रह पर तकनीकी यंत्र बनाने वाली किसी उन्नत सभ्यता का संकेत. तो आखिर बीटा पिक्टोरी-बी से आए रेडियो सिग्नल्स को कैप्चर करने के बाद वैज्ञानिकों के बीच क्या क्या विचार चल रहे हैं? क्या धरती से दूर किसी ग्रह पर जीवन का पहला पुख्ता संकेत है?
आज अगर आधुनिक टेलिस्कोप के जरिए वैज्ञानिक ब्रह्मांड के अलग अलग ठिकानों पर जीवन के सुराग ढूंढ रहे हैं, तो ये कोई नई इंसानी पहल नहीं है. अगर आपको थोड़ा पहले की कहानी बताएं, तो आपको बता चलेगा, धरती से अलग परग्रह जीवन, जिसे आज एलियंस कहा जाता है, इसे लेकर मान्यताएं 3 हजार साल पुरानी हैं.
आज से करीब 3 हजार साल पहले से ही इंसानों जैसे रहस्यमयी जीवों के धरती पर होने की बाते होती रही है. चीन के प्राचीन दस्तावेजों में 410 ईसा पूर्व में UFO देखने की बात मिलती है. बाद के बरसों में एलियंस को लेकर मानव कल्पनाएं इतनी बढ़ने लगी, कि सन 200 ईस्वी में एलियंस पर पहली गल्प कथा लिख दी गई.
लेखक थे लुसियन समोस्टा. ये कोई वैज्ञानिक या साइंस फिक्शन राइटर नहीं, बल्कि एक व्यंग लेखक थे. इन्होंने अपनी चांद पर एलियंस जैसे प्राणियों की कल्पना की थी. अब बात कल्पना से आगे बढ़कर ठोस प्रमाणों तक पहुंच चुकी है, क्योंकि जिस तरह बीटा पिक्टोरिस बी से रेडियो सिग्नल धरती पर पहुंचा है, उसमें जीवन के सुराग ढूंढने की उत्सुकता बढ़ा दी है.
वैज्ञानिकों की टीम ने 2025 और 2026 में चार बार बीटा पिक्टोरिस नाम के स्टार सिस्टम को देखा. इस दौरान उन्हें 0.85 से 3.5 गीगाहर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी पर छोटे-छोटे रेडियो सिग्नल बार-बार मिले. सबसे खास बात यह थी कि सिग्नल की जगह बीटा पिक्टोरिस बी ग्रह से मिल रही थी, न कि उसके स्टार से पहले भी ऐसे स्टार सिस्टम से रेडियो सिग्नल मिल चुके हैं, जिनके आसपास ग्रह मौजूद हैं. लेकिन तब यह पक्का नहीं हो पाया था कि सिग्नल ग्रह से आया है या उसके स्टार से. इस बार वैज्ञानिकों ने सिग्नल की जगह को बहुत सटीक तरीके से जांचा. इसी वजह से वैज्ञानिक इसे किसी एक्सोप्लैनेट से सीधे मिला पहला रेडियो सिग्नल बता रहे हैं.
वैज्ञानिकों के मुताबिक बीटा पिक्टोरिस बी से मिले रेडियो सिग्नल उसके ऑरोरा से जुड़े हैं. पृथ्वी पर भी ऑरोरा दिखाई देता है. इसे नॉर्दर्न लाइट्स और सदर्न लाइट्स के नाम से जाना जाता है. यह तब बनता है, जब चार्ज्ड पार्टिकल्स ग्रह के मैग्नेटिक फील्ड के साथ मिलते हैं.
इसी प्रक्रिया से पृथ्वी और जूपिटर के ऑरोरा से जुड़े रेडियो सिग्नल भी बनते हैं. इस सिग्नल से ग्रह के मैग्नेटिक फील्ड के बारे में भी जानकारी मिली है. रिसर्च के मुताबिक जिस जगह से रेडियो सिग्नल निकल रहा है, वहां मैग्नेटिक फील्ड की ताकत पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड से हजारों गुना ज्यादा मजबूत है.
हालांकि बीटा पिक्टोरिस बी से मिले तरंगों का विश्लेषण अभी जारी है. शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसका व्यास धरती से 16 गुना बड़ा है और कुल द्रव्यमान करीब 2765 गुना बड़ा है. ये हमारे सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति से करीब डेढ़ गुना बड़ा है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है, इस ग्रह का चुंबकीय और गुरुत्वाकर्षण बल कितना ताकतवर होगा? ऐसा मजबूत गुरुत्वाकर्षण अक्सर ग्रहों पर जीवन के अनुकूल वातावरण बनाता है. तो क्या बीटा पिक्टोरिस बी ही वो ग्रह है, जहां एलियन सभ्यता मौजूद हो सकती है?
धरती तक पहुंची पिक्टोरस बी-ग्रह की रेडियो तरंगों ने किसी अज्ञात जीवन या सभ्यता के बारे में कोई साफ संकेत नहीं दिया है, लेकिन एलियंस की अवधारणा धरती के वैज्ञानिकों के लिए कोई गल्प कथा भर नहीं है. धरती पर आज कोई भी वैज्ञानिक एलियन्स के नहीं होने की बात नहीं करता. एलियन्स हैं कहां, ये जरूर एक रहस्य है. लेकिन इसका मतलब कतई नहीं कि वो हैं नहीं.
जैसे इस धरती पर हम हैं, वैसे ब्रह्मांड के किसी कोने में उनका भी वजूद हो सकता है. ये बात हमारे दौर के सबसे बड़े भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग कई बात दोहरा चुके थे.
20वीं सदी में आइंस्टीन के बाद सबसे मशहूर साइंटिस्ट स्टीफन हॉकिंग तो एलियंस से लगातार संपर्क बनाने की कोशिश तक कर रहे थे. ब्रह्मांड को समझने के लिए उनके लंबे रिसर्च का एक बड़ा हिस्सा एलियन्स पर था. इसके लिए वो कई तरह की रेडियो फ्रीक्वेंसी अंतरिक्ष में छोड़ रहे थे, जैसे बीटा पिक्टोरिस से रेडियो सिग्नल धरती तक पहुंचा है.
स्टीफन हॉकिंग की अगुवाई में अमेरिका समेत कई जगहों पर बड़े टेलिस्कोप और फ्रिक्वेंसी भेजने के लिए खास डिवाइस तैयार की गई. 100 मिलियन डॉलर के इस प्रोजेक्ट में कई और भी वैज्ञानिक जुड़े थे. इसके तहत कई सिग्नल्स भेजे गए और बाहरी दुनिया से कई सिग्नल पकड़े भी गए. इन सिग्नल्स के करोड़ों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में टकराने की वजह से स्टीफन हॉकिंग ने कहा- बह्रमांड में हम अकेले नहीं हैं. एलियन्स हमारे आस पास हो सकते हैं और संभव है धरती की पूरी गतिविधियों पर उनकी नजर हो.
हालांकि अपनी रिसर्च और इससे मिले रिजल्ट के आधार पर स्टीफन हॉकिंग ने ये सलाह दी कि एलियन्स से संपर्क करना छोड़ दिया जाना चाहिए, क्योंकि हमें उनके बारे में पता नहीं. ऐसे में वो इंसानी सभ्यता के लिए खतरनाक भी हो सकते हैं. लेकिन आज सवाल खतरे का नहीं, सवाल एलियन्स के वजूद का है, कि आखिर वो ब्रह्मांड के किस कोने में हैं.
धरती से अलग दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश का सिलसिला चंद्रमा से लेकर मंगल जैसे ग्रहों तक चल रहा है. लेकिन ये सब-कुछ इतना खर्चीला है, यहां तक पहुंचने का सफर इतना चुनौती भरा है, कि सबसे पहले वैज्ञानिक इसे आसान करने में जुटे हैं. वैज्ञानिकों के इस अभियान का पहला पड़ाव है चंद्रमा और उसके बाद मंगल. अगले 10 साल में वैज्ञानिकों की तैयारी है चंद्रमा से आगे बढ़कर मंगल पर इंसानी बस्ती बसाने की. कैसे, समझिए जी स्पेशल के इस हिस्से में.
इसी साल अप्रैल में जब अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के आर्टिमिस मिशन ने जिस तरह से 4 दिन में चंद्रमा की दूरी पूरी की, उसके अनदेखे दक्षिणी ध्रुव की करीब से तस्वीरें लीं, इसे चंद्रमा पर बस्ती बनाए जाने की दिशा में बडी कामयाबी मानी गई.
आर्टिमिस से पहले एलन मस्क की कंपनी स्पेस टूर पर लोगों को ले जाकर अंतरिक्ष यात्रा के प्रति लोगों को जागरुक कर रही है. और साथ ही इसे कम जोखिम भरा बनाने की दिशा में काम कर रही है. अब वो जोखिम न्यूनतम हो चुका है. यानी अंतरिक्ष की यात्रा उतनी ही सुरक्षित है, जैसे कोई हवाई यात्रा. अब यहां से शुरू होती है चांद पर इंसानी बस्तियां बसाने की चुनौती.
नासा और एलेन मस्क ने चांद पर इंसानी बस्ती का प्रोटोटाइप तैयार कर लिया है, उसके लिए उस हर तकनीक को रेखांकित कर लिया है, जो चांद पर इंसानों के रहने के लिए जरूरी है. इसे आप कुछ ऐसे समझ सकते हैं
1. दक्षिणी ध्रुव के पास ठिकाना
पहली मानव बस्ती दक्षिणी ध्रुव पर बसाई जाएगी, क्योंकि यहां पानी बर्फ रूप में मौजूद है.
2. बिजली और ऑक्सीजन
इसके लिए चांद की मिट्टी और न्यूक्लियर प्लांट लगाए जाएंगे. यूरोपियन स्पेस एजेंसी 3 टन चांद की मिट्टी से एक टन ऑक्सीजन बना चुकी है. बिजली के लिए सोलर पैनल के साथ न्यूक्लियर प्लांट लगाने होंगे.
3. इन्फ्रास्ट्रक्चर बिल्डिंग
इसके तहत थ्री-डी टेक्निक से मॉड्यूलर हाउस बनाए जाएंगे. इसके साथ लैंडिंग पैड्स और फार्म एरिया डेवलप किए जाएंगे. ये सारा निर्माण कार्य चांद की मिट्टी से होगा, जो लोहे से मजबूत होगा.
नासा और एलेन मस्क का दावा है, कि 2028 से 2030 तक बड़े कार्गो स्पेस शिप चांद पर उतारे जा सकेंगे, जिसमें ब्लिडिंग मेटेरियल, वर्किंग रोबोट्स होंगे, जो कुछ समय में ही इंसानी बस्ती तैयार कर देंगे. अगर ये मुमकिन होता है, तो यहां से मंगल मिशन धरती की तुलना में 1 चौथाई कम खर्चीला और आसान हो जाएगा. इससे मंगल पर स्थाई निवास के बाद तो सौरमंडल के बाहर की दुनिया का दरवाजा ही खुल जाएगा.