तेजी से अपनी सेनाओं का विस्तार कर रहा चीन केवल भारत ही नहीं बल्कि दूसरे पड़ोसी देशों के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है. उससे निपटने के लिए पड़ोसी मुल्क भी अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ा रहे हैं. इंडोनेशिया भी इन्हीं मुल्कों में से एक है. चीन की आर्थिक और सैन्य ताकत से मुकाबले के लिए उसे भारत में भरोसेमंद दोस्त नजर आ रहा है. यही वजह है कि दुनिया की सबसे तेज ब्रह्मोस मिसाइल की खरीद के बाद अब वह अपनी वायुसेना के लिए भारत से अस्त्र Mk1 मिसाइल की खरीद के प्रस्ताव को भी गंभीरता से आगे बढ़ा रहा है. अगर यह समझौता परवान चढ़ जाता है तो चीनी विमानों या उसके आसमान में जाए बिना ही वह काफी दूर से उसे निशाना बना सकेगा.
रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम मोदी ने इस साल जुलाई में इंडोनेशिया की यात्रा की थी. उस दौरान दोनों देशों में ब्रह्मोस और हवा से हवा में मार करने वाली अस्त्र Mk1 की खरीद पर सहमति बनी थी. अब इस खरीद की आखिरी शर्तों और कीमत पर बातचीत चल रही है. अगर यह समझौता हो जाता है तो अस्त्र Mk1 खरीदने वाली इंडोनेशिया दुनिया का पहला विदेशी मुल्क बन जाएगा.
अब हम आपको उन वजहों के बारे में बताते हैं, जिसकी वजह से इंडोनेशिया का इस घातक मिसाइल पर दिल आ गया है. असल में हवा से हवा में फाइट के लिए इंडोनेशिया अब तक रूस निर्मित R-77 मिसाइल का इस्तेमाल करता आ रहा है. जिसकी अधिकतम रेंज 70-80 किमी है. लेकिन बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए अब वह इस रेंज को बढ़ाना चाहता है और ऐसी मिसाइल को खरीदने की दौड़ में है, जो उसके बजट में आ सके.
भारत की अस्त्र Mk1 मिसाइल उसकी ये सारी जरूरतें पूरी करती है. इस मिसाइल रेंज 110 किमी है और हवा से हवा में मार करने वाली दुनिया की बाकी मिसाइलों की तुलना में यह काफी सस्ती भी है. जिससे इंडोनेशिया पर ज्यादा भार भी नहीं पड़ेगा. तीसरी वजह ये है कि भारत और इंडोनेशिया, दोनों रूस निर्मित लड़ाकू विमानों सुखोई का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में अगर भारत से यह मिसाइल लेकर इंडोनेशिया उसे अपने विमानों में इंटीग्रेट कर लेता है तो उसे संचालन में खास दिक्कत भी नहीं होगी.
लेकिन अब सवाल आता है कि इंडोनेशिया को आखिर ऐसा क्या खतरा नजर आ रहा है, जिसके चलते वह अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत कर रहा है. तो इस सवाल का जवाब है चीन. क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता और दक्षिण चीन सागर में उसकी दबंगई से इंडोनेशिया भी परेशान है. तीन ऐसे बड़े मुद्दे हैं, जिन पर देर-सबेर चीन से इंडोनेशिया की भिड़ंत होनी तय मानी जा रही है. ये मुद्दे कौन-से हैं, आइए आपको विस्तार से बताते हैं:
चीन ने आसियान देशों को जोड़ने वाले पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना कब्जा करने का अभियान चलाया हुआ है. इसके लिए उसने अपनी तथाकथित 'नाइन-डैश लाइन' बना रखी है, जिसके जरिए वे इस समंदर के बहुत बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है. इसमें इंडोनेशिया का 'नटुना सागर' क्षेत्र भी आता है, जो प्राकृतिक गैस और मछलियों के भंडारों से समृद्ध है. इस क्षेत्र में चीनी जहाजों और तटरक्षक बलों जब-तब दबंगई करते हुए घुसपैठ करते रहते हैं.
इंडोनेशिया एक ऐसा विशाल देश है, जो बहुत सारे द्वीपों को मिलाकर बना है. इस देश के चारों ओर गहरा समंदर है. अपने विशेष आर्थिक क्षेत्रों और वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए वह अपनी नौसेना और वायु सेना को मजबूत बनाना चाहता है. जिससे कोई बाहरी शक्ति उसकी समुद्री सीमाओं का उल्लंघन न कर सके.
दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के आक्रामक सामरिक रुख को काबू में रखने के लिए इंडोनेशिया अपनी रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बना रहा है. इसके लिए वह दुश्मन का दुश्मन दोस्त वाली रणनीति पर चलते हुए भारत जैसे मित्र देशों से रक्षा साझीदारी गहरा कर रहा है. वह भारत से जैसे ब्रह्मोस और अस्त्र जैसे खतरनाक हथियार खरीदना चाहता है, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर में चीनी हथियारों को कबाड़ बना दिया था.
भारत भी मौके की नजाकत को समझते हुए खुलकर इंडोनेशिया की मदद कर रहा है. वह उसे अपनी आधुनिकतम मिसाइल ब्रह्मोस की तटीय बैटरियां, रडार और गाइडेंस सिस्टम उपलब्ध करा रहा है. इस मिसाइल के मिलने से इंडोनेशिया के तटों की ओर आ रहे किसी भी जहाज को वह उसे आसानी से समंदर में दफन कर सकता है.
वहीं, आसमान में डॉगफाइट किए बिना चीनी विमानों को हवा में उड़ाने के लिए वह उसे अस्त्र Mk1 मिसाइल देने जा रहा है. यह मिसाइल मिलने पर इंडोनेशियाई वायुसेना 100 किमी दूर से ही चीनी लड़ाकू विमानों को खाक कर सकेगी.
जंग की स्थिति में चीन की रीढ़ यानी उसकी अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिए दोनों मुल्क अंदरखाने तैयारियों में जुटे हैं. इसके लिए भारत और इंडोनेशिया मिलकर सबांग बंदरगाह को विकसित कर रहे हैं. मलक्का स्ट्रेट के मुहाने पर बनने वाला इंडोनेशिया का यह पोर्ट भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बहुत करीब स्थित है.
इस पोर्ट के बनने पर दोनों देश मलक्का से होने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार की प्रभावी निगरानी कर सकेंगे. चीन का 80 फीसदी व्यापार इसी मार्ग से होता है. ऐसे में जंग की हालत में दोनों देश संयुक्त सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर जब चाहे, चीन को घुटनों पर ला सकेंगे.
भारत और इंडोनेशिया की नौसेनाएं मिलकर समुद्र में संयुक्त गश्त भी कर रही हैं. इससे हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में कोई खतरा दिखने पर दोनों देश एक-दूसरे को वक्त रहते रियल इनपुट दे सकते हैं. कुल मिलाकर, चीन जितना दुनिया में आक्रामकता दिखा रहा है. उतना ही उससे निपटने के लिए दुनिया भी एकजुट होती जा रही है. अगर भविष्य में कभी चीन ने दुस्साहस करने का प्रयास किया तो उसके लिए वह बर्बादी की शुरुआत हो सकती है.