आईटीबीपी के जवानों को विशेष स्ट्राइक कोर्स करवाया जा रहा है. इसके साथ ही, आईटीबीपी विशेष ड्रोन वॉरफेयर की तैयारी भी कर रही है.लेकिन पहले आप समझिए कि आईटीबीपी ने शौर्य कमांडोज प्लाटून का गठन क्यों किया और इनकी ट्रेनिंग कैसे होती है. वर्ष 2020 में गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद भारत चीन सीमा पर सुरक्षा की नई जरूरतों को ध्यान में रखकर शौर्य कमांडोज को तैयार किया गया है.
शौर्य कमांडोज बहुत ज्यादा ऊंचाई वाले दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से प्रतिक्रिया देने की ट्रेनिंग दी गई है. ये कमांडो चीन की सेना के साथ होने वाले 'फेस-ऑफ' या झड़पों से आक्रामक रूप से निपटेंगे और भारत-चीन सीमा पर ITBP की ऑपरेशनल ताकत को बढ़ाएंगे.
इसके लिए शौर्य कमांडो का प्रशिक्षण बेहद कठिन और उच्च स्तर का होता है, ताकि वे सबसे कठिन माहौल में भी टिक सकें. हाई-एल्टीट्यूड वॉरफेयर की ट्रेनिंग देकर इन कमांडोज को कम ऑक्सीजन स्तर, शून्य से नीचे तापमान और जमा देने वाली ठंड में ऑपरेट करने के लिए ढाला गया है. यानी जहां पर आम इंसान के लिए खड़ा रहना मुश्किल है. वहां शौर्य कमांडोज़ लड़ने के लिए तैयार हैं.
आईटीबीपी के शौर्य कमांडोज़ को पर्वतारोहण, आधुनिक हथियारों के सटीक इस्तेमाल, ड्रोन ऑपरेशंस की ट्रेनिंग दी गई है. इसके अलावा बिना हथियारों के नजदीकी लड़ाई में इन्हें पारंगत किया गया है क्योंकि चीन के साथ ज्यादातर ऐसी ही झड़पें होती हैं.
आईटीबीपी भारत चीन सीमा पर भारतीय सेना के साथ मिलकर काम करती है. इसीलिए सेना के साथ समन्वय मजबूत करना भी जरूरी है. इसके लिए शौर्य कमांडोज़ की संयुक्त ट्रेनिंग सेना की 'फायर एंड फ्यूरी कोर' के साथ भी होती है. सेना की ये कोर लेह में मौजूद है.
ITBP के 'शौर्य कमांडो' का 'ऑपरेशन चीन' भारत के 'शौर्य' ने PLA को कैसे सिखाया सबक? चीन से निपटने वाली 'नई फोर्स' का DNA टेस्ट
— Zee News (@ZeeNews) October 23, 2026
इन कमांडोज को भारतीय सेना की प्रतिष्ठित और सबसे आक्रामक घातक प्लाटून की तर्ज पर ट्रेनिंग दी गई है
फिलहाल आईटीबीपी की हर बटालियन में एक शौर्य कमांडो टीम का गठन किया जा चुका है. ITBP की योजना आगे चलकर हर बटालियन में एक पूरी 'शौर्य कमांडो कंपनी' तैयार करने की है.
आईटीबीपी की 1 बटालियन में 6 कंपनियां होती हैं. हर कंपनी में 100 से 120 जवान होते हैं. इसका मतलब आने वाले वक्त में आईटीबीपी की हर बटालियन में लगभग 100 से 120 शौर्य कमांडो होंगे. इसके अलावा, पूरी तरह से स्वतंत्र ऑपरेशंस के लिए एक समर्पित 'शौर्य कमांडो बटालियन' के गठन पर भी तेजी से काम चल रहा है.
शौर्य कमांडो प्लाटून के साथ-साथ ITBP अपनी युद्धक क्षमता बढ़ाने के लिए कई अन्य मोर्चों पर भी काम कर रही है. आईटीबीपी ने गलवान जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए एक विशेष 'स्ट्राइक' कोर्स शुरू किया है. गलवान में चीन के जवानों के साथ भारतीय जवानों की करीबी लड़ाई हुई थी. जिसमें चीन की सेना ने पत्थर, नुकीले डंडे और लोहे की छड़ों का इस्तेमाल किया था.
ऐसी स्थितियों से निपटने की ट्रेनिंग इसी स्ट्राइक कोर्स के जरिए दी जा रही है. जवानों के प्रशिक्षण के लिए 330 मास्टर ट्रेनर भी तैयार किए गए हैं. इसके अलावा ITBP भारत-चीन सीमा पर किसी भी चुनौती से निपटने के लिए आधुनिक तकनीक और बुनियादी ढांचे को लगातार मजबूत कर रही है.
इसके तहत सीमा पर विशेष ड्रोन यूनिट्स स्थापित की जा रही हैं. इसके लिए ITBP ने मॉर्डनाइजेशन के लिए मिले बजट का 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ ड्रोन और एंटी ड्रोन तकनीक पर खर्च किया है. इसके अलावा सैनिकों की सुरक्षा और सामरिक बढ़त के लिए बॉर्डर के इलाके में आधुनिक भूमिगत बंकर विकसित किए जा रहे हैं. दुर्गम पहाड़ी इलाकों में तेज आवाजाही के लिए आधुनिक हथियारों के साथ-साथ क्विक रिएक्शन व्हीकल्स को बेड़े में शामिल किया जा रहा है.
इन सभी कदमों का मुख्य उद्देश्य उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में फोर्स की मारक क्षमता और तुरंत प्रतिक्रिया देने की ताकत को बढ़ाना है. अगले साल दिसंबर के अंत तक सीमा पर तैनात आईटीबीपी का हर जवान स्ट्राइक कोर्स कर लेगा . यानी चीन से मुकाबले के लिए तैयार होगा.
वैसे गलवान के बाद सिर्फ आईटीबीपी ने नहीं भारतीय सेना ने भी LAC पर अपनी तैयारी मजबूत की है. गलवान में झड़प के दौरान जिस तरह भारतीय सेना ने चीन के सैनिकों को सबक सिखाया था. उससे चीन भी सकते में आ गया था और चीन ने भी LAC पर खुद को मजबूत करने की कोशिश की है.
चीन ने तिब्बत के ऊंचे पठारों पर अपने हवाई क्षेत्र को सुरक्षित करने के लिए HQ-9 और HQ-16 जैसी शक्तिशाली मिसाइल प्रणालियों का मजबूत जाल बिछाया है और बड़े पैमाने पर रडार कवरेज बढ़ाई है. इसके मुकाबले भारत ने रूस से मिले अत्याधुनिक S-400 एयर डिफेंस सिस्टम के साथ-साथ स्वदेशी आकाश मिसाइलों की आक्रामक तैनाती की है.
चीन ने लद्दाख और तिब्बत के पास स्थित होटन और काशगर एयरबेस का विस्तार किया है. इसके अलावा लड़ाकू विमानों को सुरक्षित रखने के लिए अंडरग्राउंड शेल्टर्स बनाए हैं. इसके जवाब में भारत ने पूर्वी लद्दाख और अरुणाचल सीमा के पास न्योमा, दौलत बेग ओल्डी और थॉइस जैसी रणनीतिक एयरफील्ड्स को आधुनिक बना लिया है.
हालांकि चीन के पास रनवे ज्यादा हैं, लेकिन भारत के फाइटर बेस कम ऊंचाई पर हैं, जिससे भारतीय जेट विमान उड़ान भरते समय अधिक हथियार और ईंधन ले जा सकते हैं.
चीन ने LAC के ठीक पीछे अपना G219 हाईवे मजबूत किया है और सैनिकों को तेजी से लाने-ले जाने के लिए पैंगोंग झील के ऊपर दो नए पुलों का निर्माण किया है. भारत ने भी इसका मुंहतोड़ जवाब देते हुए सेला सुरंग, अटल टनल और अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे का निर्माण तेजी से किया है. जहां बुनियादी ढांचे के मामले में चीन दशकों आगे था, वहीं भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इस अंतर को लगभग 80% तक कम कर दिया है.
चीन ने तिब्बत के क्षेत्र में अपनी स्थायी 'कम्बाइंड आर्म्स ब्रिगेड' तैनात की हैं और सीमा पर ड्रोन सर्विलांस को बहुत बढ़ा दिया है. इसके मुकाबले भारत ने अपनी पुरानी रक्षात्मक नीति को बदलते हुए आक्रामक रक्षा की नीति अपनाई है. भारत ने पाकिस्तान की सीमा से अपना ध्यान कम करके एलएसी पर लगभग 10 नई ब्रिगेड की स्थायी तैनाती की है और अपनी हर बटालियन में विशेष 'ड्रोन प्लाटून' शामिल की है.
चीन और पाकिस्तान के दोहरे खतरे से निपटने के लिए भारतीय सेना जमीन पर युद्ध की अपनी तैयारियों को अगले स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रही है. इसके साथ ही रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने जमीनी युद्ध के लिए भारतीय सेना की नई डॉक्ट्रिन जारी की है. इसे Land Warfare Doctrine 2026' का नाम दिया गया है.
भारतीय सेना की नई युद्धनीति बता रही है कि भविष्य के युद्ध अब केवल सरहदों पर बंदूकों से नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, साइबर स्पेस और अंतरिक्ष के तालमेल से लड़े जाएंगे. यही नई भारत की 'Land Warfare Doctrine 2026' का मूलमंत्र भी है. आज आपको भारत की नई युद्ध नीति की कुछ खास बातें भी जाननी चाहिए.
रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्धों से सीख लेते हुए इस नई रणनीति को भविष्य के आधुनिक युद्धों के लिए तैयार किया गया है. इसमें युद्ध के मैदान में ड्रोन और मानवरहित प्रणालियों के इस्तेमाल को सबसे अहम जगह दी गई है. भारतीय सेना अब युद्ध के दौरान AI का भी इस्तेमाल करेगी. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से सेना को तेजी से फैसले लेने और खुफिया जानकारी का विश्लेषण करने में मदद मिलेगी.
यह रणनीति Multi-Domain Operations पर जोर देती है. इसका मतलब जमीन के साथ-साथ साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को एक साथ जोड़ती है. चीन के साथ LAC और पाकिस्तान के मोर्चे पर दोहरी चुनौतियों से निपटने के लिए यह रणनीति बेहद महत्वपूर्ण है.
नई डॉक्ट्रिन में दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सैनिकों की तेजी से आवाजाही, निगरानी और लॉजिस्टिक सपोर्ट को आधुनिक बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है. इसमें थल सेना के साथ-साथ वायु सेना, नौसेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने की बात कही गई है.
विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करने के लिए 'आत्मनिर्भर भारत' और स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास को प्राथमिकता दी गई है. इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय सेना को समय के साथ बदलकर एक तकनीकी रूप से सक्षम और भविष्य के लिए तैयार फोर्स बनाना है.