कंकाल के कटे हाथ, रनवे के नीचे दफन राज: 30 साल बाद जमीन के अंदर से चे ग्वेरा को कैसे ढूंढ लाई थी क्यूबा की टीम?
अगर चे ग्वेरा आज जिंदा होते, तो 98 साल के होते. 9 अक्टूबर 1967 को जब उन्हें गोली मारी गई, तब उनकी उम्र महज 39 साल थी. आज 9 अक्टूबर 2026 को उनकी 59वीं बरसी है. इस मौके पर जानिए करीब 30 साल बाद क्यूबा की टीम कैसे उनका कंकाल ढूंढ लाई थी...
चे ग्वेरा... ये नाम आपने कई बार सुना या पढ़ा होगा...अगर नहीं पढ़ा तो यह खबर आपको पढ़नी चाहिए. 9 अक्टूबर 1967 वही तारीख है, जिस दिन चे ग्वेरा के सीने में गोली दागी गई थी. चे ग्वेरा सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने वाले हर नौजवान की पहचान है. दुनिया से गए उन्हें लगभग 60 साल हो चुके हैं, लेकिन वो आज भी एक जलती हुई आग की तरह याद किए जाते हैं. ग्वेरा एक ऐसे क्रांतिकारी रहे, जो कभी बूढ़े नहीं हुए, उनका चेहरा हमेशा लोगों के जेहन में जवान ही रहा...दुनिया में आज कहीं भी कोई हक की लड़ाई लड़ता है तो चे ग्वेरा की वही स्टार वाली टोपी और बेपरवाह चेहरा टी-शर्ट्स और पोस्टरों पर नजर आ जाता है, मानो वो कह रहे हों कि बगावत कभी उम्र देखकर नहीं होती.
इस क्रांतिकारी की हत्या के बाद उनके दोनों हाथ काट दिए गए और लाश को हवाई पट्टी के नीचे दफना दिया गया, ताकि कोई निशान न बचे, लेकिन 30 साल बाद इस राज से पर्दा उठा. लक्यूबा की टीम बोलीविया कैसे पहुंची और कैसे उनकी मौत के राज से पर्दा उठा, ये हम डिटेल से जानेंगे, लेकिन उससे पहले आपको चे ग्वेरा को समझ लेना चाहिए...
अर्नेस्टो चे ग्वेरा कौन थे?
चे ग्वेरा का जन्म 14 जून 1928 को अर्जेंटीना में हुआ था. उनका पूरा नाम अर्नेस्टो चे ग्वेरा था, पर लोग उन्हें प्यार से बस 'चे' बुलाते थे. उन्होंने डॉक्टरी (मेडिसिन) की पढ़ाई की थी. वो चाहते तो क्लिनिक चलाकर बढ़िया जिंदगी जीते, लेकिन अपने इर्द-गिर्द फैली गरीबी देखकर उन्होंने क्रांति का रास्ता चुना और दुनिया भर में बगावत और सत्ता के खिलाफ जंग का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे.
चे ग्वेरा ने अपनी जवानी के दिनों में मोटरसाइकिल से करीब 10 हजार किलोमीटर की यात्रा की, इस दौरान वो लैटिन अमेरिका के कई देशों में गए. इस सफर के दौरान उन्होंने मजदूरों की बदहाली, बेबसी और सरकारों का जुल्म अपनी आंखों से देखा. इस पूरे सफर पर उन्होंने एक डायरी लिखी, जो बाद में 'द मोटरसाइकिल डायरीज' के नाम से छापी गई थी. ये वही यात्रा थी, जिसके बाद चे ग्वेरा ने तय कर लिया था कि अब पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़नी है. यहीं से शुरू हुआ था वो विद्रोह, जिसने क्यूबा के तानाशाह को उखाड़ फेंकने की कसम खाई थी.
फिदेल कास्त्रो से दोस्ती और फिर तख्ता पलट
बाइक से 10 हजार किलोमीटर का सफर तय करके चे ग्वेरा क्यूबा लौट चुके थे. इसके बाद उनकी मुलाकात फिदेल कास्त्रो से हुई. दोनों ने मिलकर क्यूबा के तानाशाह फुलगेनसियों बतिस्ता को उखाड़ फेंकने की कसम खाई. इसके लिए गुरिल्ला लड़ाकों की फौज तैयार कर डाली. आंदोलन ऐसा बढ़ा कि 1959 में क्यूबा में तख्तापलट हुआ.
इसके बाद फिदेल कास्त्रो की कम्युनिस्ट सरकार में चे उद्योग मंत्री बनाए गए, थोड़ा वक्त बीता, लेकिन कुछ सालों बाद रूस और चीन से रिश्तों को लेकर कास्त्रो और चे में अनबन शुरू हो गई. नतीजा ये हुआ कि चे, क्यूबा की सत्ता छोड़कर दूसरे देशों में क्रांति की अलख जगाने निकल पड़े. उन्होंने भेष बदलकर कुछ वक्त कांगो में बिताया और फिर बोलीविया के जंगलों में जा पहुंचे.
9 अक्टूबर 1967 को गोली लगने से मौत
चे ग्वेरा एक कट्टर मार्क्सवादी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने क्यूबा में अमेरिका समर्थक सरकार को उखाड़ फेंककर वॉशिंगटन की नींद उड़ा दी थी. वह क्यूबा तक नहीं रुके, बल्कि पूरे लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में अमेरिकी दबदबे के खिलाफ बगावत की आग भड़काना चाहते थे, इसी वजह से अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए हाथ धोकर उनके पीछे पड़ गई थी. आखिरकार बोलीविया के जंगलों से चे को पकड़ लिया गया. बताया जाता है कि 9 अक्टूबर 1967 को एक छोटे से स्कूल के कमरे में उन्हें गोली मार दी गई. मरते वक्त चे ने कहा था 'तुम एक इंसान को मार रहे हो, लेकिन उसके विचार को नहीं मार सकते.'
इसके बाद शुरू हुई वो कहानी, जो 30 साल तक दुनिया के सामने नहीं आई. ये कहानी थी चे ग्वेरा के शव को दफनाने की, जो बोलीविया की सेना और सीआईए ने मिलकर बनाई थी.
दरअसल, बोलिविया को अमेरिका का सपोर्ट था. जब ग्वेरा की गोली लगने से मौत हो गई तो उस वक्त बोलीविया की सेना और सीआईए को लगा कि सिरदर्द हमेशा के लिए खत्म हो गया, लेकिन इसके तुरंत बाद एक नया डर पैदा हुआ. दोनों को डर ये था कि अगर चे ग्वेरा की कब्र बन गई तो वह दुनिया भर के बागियों और वामपंथियों के लिए तीर्थ बन जाएगी, इसलिए उनकी लाश को गायब करने का ऐसा सीक्रेट मिशन शुरू हुआ, जिसने 30 साल तक इस सच को दबाए रखा.
दोनों हाथ काटे और लाश को कर दिया गायब
बताया जाता है कि हत्या के बाद चे ग्वेरा की लाश को हेलिकॉप्टर के पहियों से बांधकर पास के कस्बे वालेग्रांदे ले जाया गया, जहां एक अस्पताल में कपड़े धोने वाले सिंक पर शव रखा गया और दुनिया भर के पत्रकारों और कैमरामैनों को बुलाया गया, ताकि पूरी दुनिया को यकीन हो जाए कि चे मर चुके हैं, लेकिन इसके बाद जो हुआ वो हैरान करने वाला था.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बोलीवियाई सेना के अधिकारियों ने आदेश दिया कि चे की दोनों कलाइयां काट दो. कटे हुए हाथों को केमिकल (फॉर्मेलिन) से भरे कांच के जार में रख दिया गया, ताकि अर्जेंटीना पुलिस के पास मौजूद उनके फिंगरप्रिंट से मिलान करके अमेरिका को पक्का सबूत भेजा जा सके.
चे ग्वेरा के हाथ काटने के बाद 11 अक्टूबर 1967 की आधी रात को बुलडोजर बुलाया गया और वालेग्रांदे की कच्ची हवाई पट्टी के पास एक गहरा गड्ढा खुदवाकर चे और उनके 6 साथियों की लाशों को दफन कर दिया गया. बाद में उस जगह हवाई पट्टी का रनवे बढ़ा दिया गया, ताकि किसी को पता ना चले कि चे ग्वेरा असल में दफन कहां हैं.
चे ग्वेरा को क्यूबा की टीम ने कैसे ढूंढ निकाला?
अब लौटते हैं उस बात पर कि आखिर जमीन के अंदर से चे ग्वेरा को क्यूबा की टीम ने कैसे ढूंढ निकाला. हुआ ये कि इस राज से पर्दा साल 1995 में तब उठा, जब अमेरिकी लेखक जॉन ली एंडरसन चे की बायोग्राफी 'चे ग्वेरा: अ रेवोल्यूशनरी लाइफ' लिख रहे थे. रिसर्च के दौरान एंडरसन ने बोलीविया के रिटायर्ड जनरल मारियो वर्गास से मुलाकात की, जो उस वक्त कैंसर से जूझ रहे थे और आखिरी सांसें गिन रहे थे. ये वही मारियो वर्गास थे, जिन्होंने 1960 के दशक में चे के गुरिल्लाओं से लड़ाई लड़ी थी.
इंडिपेंडेंट डॉट ओआरजीमें छपे एक लेख के अनुसार, बातचीत में भावुक होकर जनरल ने 28 साल पुराना राज उगल दिया. उन्होंने लेखक जॉन ली एंडरसन से कहा 'चे को कभी जलाया नहीं गया था, जैसा कि दुनिया से कहा गया, हमने उसे और उसके साथियों को वालेग्रांदे की हवाई पट्टी के पास एक सामूहिक कब्र में दफना दिया था.'
जैसे ही ये खबर सामने आई तो हर कोई हैरान था. क्यूबा के राष्ट्रपति और चे के दोस्त फिदेल कास्त्रो ने इसे अपनी साख का सवाल बना लिया था. नतीजा ये हुआ कि भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकते हुए बोलीविया के राष्ट्रपति ने क्यूबा और अर्जेंटीना के डॉक्टरों व वैज्ञानिकों को वहां खुदाई करने की इजाजत दी.
करीब डेढ़ साल की खुदाई के बाद मिला था सुराग
क्यूबा की आधिकारिक राज्य समाचार एजेंसी Prensa Latina की खबर के अनुसार, दिसंबर 1995 में क्यूबा के जाने-माने फॉरेंसिक डॉक्टर जॉर्ज गोंजालेज पेरेज के नेतृत्व में एक टीम वालेग्रांदे पहुंची. उनके साथ अर्जेंटीना की मशहूर फॉरेंसिक टीम भी थी.
काम नामुमकिन जैसा था, क्योंकि 30 सालों में उस जगह का पूरा नक्शा बदल चुका था, झाड़ियां उग आई थीं, सड़कें बन गई थीं. टीम ने जमीन के अंदर देखने वाले रडार और पुराने सैटेलाइट नक्शों के सहारे दर्जनों गड्ढे खोदे. महीनों तक सिर्फ मायूसी हाथ लगी, बोलीविया की सेना के पुराने अफसर भी नहीं चाहते थे कि यह राज खुले, इसलिए वे अड़ंगे लगा रहे थे, लेकिन कहते हैं ना कि सच बाहर आ ही जाता है. इस मामले में भी यही हुआ. करीब डेढ़ साल की माथापच्ची के बाद 28 जून 1997 की सुबह इतिहास पलट गया.
रनवे के किनारे गड्ढा खोदते वक्त बुलडोजर का ब्लेड एक इंसानी हड्डी से टकराया. डॉक्टरों ने फौरन काम रुकवाया और हाथ में खुरपियां व ब्रश लेकर खुद मिट्टी हटाने लगे, नीचे एक सामूहिक कब्र थी, जिसमें 7 कंकाल एक के ऊपर एक पड़े थे. जैसे ही कंकाल नंबर 2 सामने आया, वैज्ञानिकों के रोंगटे खड़े हो गए, क्योंकि इस कंकाल के हाथ कटे हुए थे. उसकी दोनों कलाइयां गायब थीं.
ऐसे हुई थी कंकाल की पहचान
चे के बचपन के मेडिकल रिकॉर्ड पहले से मौजूद थे. कंकाल के ऊपरी जबड़े का एक दांत गायब था और बाकी दांतों की बनावट हू-ब-हू चे के मेडिकल रिकॉर्ड से मिल गई. खोपड़ी की भौंहों वाली हड्डी की बनावट भी चे के चेहरे से पूरी तरह मेल खाती थी. इसके बाद डीएनए और फॉरेंसिक जांच की गई, जिसमें आधिकारिक मुहर लग गई कि यह कंकाल किसी और का नहीं, बल्कि 30 साल से जमीन के नीचे दबे चे ग्वेरा का ही है.
1997 में क्यूबा लाई गई थीं चे की अस्थितां
हत्या के ठीक 30 साल बाद अक्टूबर 1997 में चे की अस्थियों को एक छोटे से लकड़ी के ताबूत में रखकर क्यूबा लाया गया. हवाना के चौराहे पर लाखों लोग रो रहे थे. चे की बेटी अलीदा ने वह कलश फिदेल कास्त्रो को सौंपा. फिर उस ताबूत को संता क्लारा ले जाया गया, ये वही शहर था, जहां 1958 में चे ने बख्तरबंद ट्रेन उड़ाकर क्यूबा की क्रांति की तकदीर बदल दी थी. वहां बने एक बड़े समाधि स्थल में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें दफनाया गया.
उस दिन भरी आवाज में उनके दोस्त और क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने पूरी दुनिया से कहा था 'वे सोचते थे कि चे को जमीन में गाड़कर वे उसके विचारों को भी दफन कर देंगे, वे गलत थे. आज 30 साल बाद हम यहां चे को अलविदा कहने नहीं, बल्कि अपने घर में उनका स्वागत करने आए हैं.'
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