फीस पर फसाद: दंगों से झुलसा फ्रांस, प्रदर्शनकारियों ने फूंक दी ऐतिहासिक इमारत, जगह-जगह लूटपाट; US ने जताई चिंता
फ्रांस के युवा किसी भी अन्याय के खिलाफ मुखर होकर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. यहां महंगाई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर युवाओं ने कई दिनों से तांडव मचा रखा है. अब ये प्रदर्शन हिंसक हो चुके हैं. प्रदर्शनकारी आंदोलन के नाम पर आगजनी और लूटमार कर रहे हैं. हालत बेहद खराब हैं और कई जगहों पर प्रशासन ने इमरजेंसी लगाई है.
फ्रांस में बढ़ती महंगाई के खिलाफ हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं. युवाओं के देशव्यापी प्रदर्शनों का स्वरूप बिगड़ चुका है. अब कुछ कथित प्रदर्शनकारी और जेन-Z दंगाइयों जैसी हरकतें करके लूटमार मचा रहे हैं. इस कड़ी में कुछ दंगाइयों ने करीब 143 पुरानी सिटी टाउन हॉल की इमारत को आग के हवाले कर दिया. कई शहरों की रैलियों में हिंसा हो चुकी है. राजधानी पेरिस, ल्योन, मार्सिले और लिले में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प हुई हैं. प्रदर्शनों के दौरान लूटपाट और आगजनी की घटनाएं भी सामने आई हैं.
मैक्रों पर बढ़ा दबाव
इन प्रदर्शनों के दौरान सरकारी और सार्वजनिक दफ्तरों की इमारतों पर भी हमले किए गए हैं. पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक, देशभर में 400 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है. स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है, हालांकि अधिकांश इलाकों में हालात नियंत्रण में हैं. फ्रांस में यह अशांति ऐसे समय छाई है जब छह महीने बाद चुनाव होने वाले हैं और राजनीतिक अनिश्चितता लगातार तेजी से बढ़ रही है. मैक्रों पर हालात संभालने का दबाव बढ़ गया है.
इससे पहले पुलिस ने हिंसक हो रही भीड़ को रोककर, पीछे धकेलने के लिए हल्का-फुल्का बल प्रयोग किया है. पुलिस ने प्रदर्शन के नाम पर दंगा करने पर उतारू भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले दागते हुए वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया.
धू-धकर जली इमारत, स्टोर लूटे
प्रदर्शन के नाम पर दंगा और लूटमार कर रहे कुछ जेन-Z युवा इतने निर्दयी हो गए हैं कि सरकारी संपत्ति को फूंकने के साथ लोगों की रोजी रोटी भी छीन रहे हैं. वीकेंड पर एक महिला हाथ जोड़कर गुहार लगाती रही कि मेरा स्टोर मत लूटो, लेकिन हिंसा पर उतारू 'दंगाइयों' ने उनकी एक न सुनी और उसकी आंखों के सामने उसकी कमाई का जरिया ही खत्म कर दिया.
एतिहासिक इमारत फूंकी
इसी तरह प्रदर्शनकारियों के एक अन्य गुट ने फ्रांस की 143 साल पुरानी एतिहासिक इमारत को फूंक दिया. उसका गुंबद जब जलकर नीचे गिरा तो उस वक्त का नजारा भयावाह था. ऐतिहासिक इमारत के गुंबद के टूट कर गिरने और उसके धू-धू कर जलने की तस्वीरों ने लोगों को परेशान किया है.
फ्रांस में बीते दस सालों में प्रदर्शन के नाम पर सैकड़ों सरकारी और गैरसरकारी इमारतों को निशाना बनाने के साथ-साथ गाड़ियों को फूंका गया है. ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि कहीं प्रदर्शनकारियों की भीड़ में घुसकर कुछ असामाजिक तत्व भीड़ को हिंसा करने के लिए नहीं कह रहे. पुलिस, प्रदर्शनों के हिंसक होने की जांच कर रही है.
शो रूम लूटे
इन कथित प्रदर्शनकारियों ने देश की इकॉनमी को चोट पहुंचाई है. प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाकर्मियों और पुलिस की पीटाई की है. इन दंगाइयों ने रोलेक्स जैसे नामचीन ब्रैंड्स के शो रूम में तोड़फोड़ करके लाखों की महंगी घड़ियां और अन्य कीमती सामान लूट लिए. कई जगह लूटपाट की खबरें आई हैं.
कांटो भरा ताज!
बीते एक दशक की बात करें तो 2017 में इमैनुएल मैक्रों के राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद कभी पॉलिसी पैरालिसिस और सिस्टम फेल्योर के नाम पर 2018 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब तक 2026 में भी जारी हैं.
कभी येलो वेस्ट कर्मचारी तो कभी सरकारी कर्मचारी और छात्र संगठन अपनी जायज मांगों को लेकर सिस्टम को ध्वस्त करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं.
राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों तो 9 सालों से रुक-रुक कर हो रहे प्रदर्शनों के बीच कुर्सी बचाए हुए हैं, लेकिन 2021 से 2026 के बीच 6 प्रधानमंत्री बदल गए.
प्रोटेस्ट का दशक
कभी येलो वेस्ट कर्मचारी तो कभी सरकारी कर्मचारी और छात्र संगठन अपनी जायज मांगों को लेकर सिस्टम को ध्वस्त करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं. 2017 के चुनावों में लोगों ने 40 साल के युवा इमैनुअल मैक्रों को राष्ट्रपति चुनकर उम्मीद लगाई थी कि वह देश के हालात सुधारने के साथ उनकी लाइफ स्टाइल में सकारात्मक बदलाव लाएंगे, लेकिन जब उन्हें लगा कि ऐसा नहीं हो पा रहा है तब उन्होंने प्रदर्शनों की झड़ी लगा दी.
237 साल पहले हुई फ्रांस की ऐतिहासिक क्रांति के सफल होने के बाद यहां के लोगों ने अपने पहले संबोधन में निरंकुश राजशाही और तानाशाही का खात्मा होने के साथ सामंती व्यवस्था का हमेशा के लिए अंत करने का ऐलान कर दिया था. आज फ्रांस के लोग चुनी हुई सरकारों को आईना दिखाकर लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने में देर नहीं लगाते.
किसी भी सूरत में हिंसा जायज नहीं है. इस बात को भूलकर यहां के लोगों का कलेजा इतना मजबूत है कि किसी भी अन्याय के खिलाफ मुखर होकर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं.
इटली में भी बिगड़े हालात
इटली के कुछ शहरों में भी प्रदर्शनकारियों ने बढ़ती महंगाई, एजुकेशन सिस्टम में सुधार, कम सैलरी के विरोध में प्रदर्शन किया है. मिलान, बोलोगा और ट्यूरिन में हेल्थ सेक्टर की खामियों के विरोध में सड़कों पर उतरकर नारेबाजी की है.
अमेरिका ने जताई चिंता
दंगों की आग में झुलस रहे यूरोपीय देशों की हालत पर चिंता जताते हुए अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने प्रेसिडेंट ट्रंप की लाइन लेते हुए पश्चिमी देशों के उदारवादी नेताओं और उनकी लचीली नीतियों पर निशाना साधते हुए कहा, इन लोगों ने तीसरी दुनिया के लोगों को अपने यहां बसाकर यूरोप का हाल बेहाल कर दिया है.
वेंस ने पोस्ट में लिखा, 'पश्चिमी उदारवादियों ने विविधता और करुणा के नाम पर 'तीसरी दुनिया' के लोगों को फ्रांस और अन्य देशों में ला बसाया. उन्होंने घुलने-मिलने और आपसी तालमेल जैसे बुनियादी सवालों को नजरअंदाज कर दिया. उन्हें पहले ही चेतावनी दी गई थी कि ऐसा हो सकता है, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी. मैं प्रार्थना करता हूं कि खूबसूरत देश फ्रांस की सरकार इस पागलपन को समय रहते रोक दे, ताकि उसकी ऐतिहासिक विरासत और साइट्स जलकर खाक न हो जाएं. इसके साथ मुझे उम्मीद है कि अमेरिका के लोग भी फ्रांस की हालत देख रहे होंगे. कांग्रेस में मौजूद डेमोक्रेट्स सांसद और नेता आपके महान देश के लिए ऐसा भविष्य चाहते हैं.'
फ्रांस के लोगों का कलेजा जीवट है. वो अन्याय के खिलाफ और अपने जायज हक के लिए आवाज उठाने में देर नहीं लगाते. पेरिस से लेकर देशभर में चल रहे प्रदर्शनों ने 1968 की फ्रांस की ऐतिहासिक स्टूडेंट क्रांति की यादों को ताजा कर दिया है.