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Pakistan Military Preparations against BrahMos: ऑपरेशन सिंदूर के 17 महीने बाद भी पाकिस्तान से ब्रह्मोस मिसाइल मिसाइल का खौफ खत्म होने का नाम नहीं ले रहा हैं. पाकिस्तान ने अब इस मिसाइल से निपटने के लिए चीन से मदद मांगी है. उसकी सहायता से पाकिस्तान के मिलिट्री बेसेस पर चाइनीज LD-2000 सिस्टम तैनात किया जा रहा है.
पाकिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक कमर चीमा भी भारत की बढ़ती ताकत से परेशान हैं. वे कहते हैं, 'इंडिया का जो ब्रह्मोस मिसाइल है वो सुपरसोनिक मिसाइल सिस्टम है. आप कल्पना करें कि इंडिया अगर 1000 मिसाइल फेंक रहा है, ब्रह्मोस तो ये बहुत मुश्किल है कि उन मिसाइलों को कंट्रोल किया जाए. उनको कंट्रोल करना बहुत मुश्किल है, कोई इतना आसान काम नहीं है.'
यही वह खौफ है, जिसकी वजह से पाकिस्तान ने अपनी संवेदनशील जगहों पर LD-2000 सिस्टम की तैनाती शुरू कर दी हैं. अभी इसे पाकिस्तान के नूरखान एयरबेस पर तैनात किया गया है. पाकिस्तान ने चीन से इसकी 6 यूनिट और मांगी हैं. जिससे इस बार पाकिस्तान में ऑपरेशन सिंदूर जैसी तबाही ना मचे. असल में पाकिस्तानी आज तक उस तबाही को भुला नहीं पाए हैं.
बता दें कि LD-2000 चीन का एक डिफेंस सिस्टम है. जो 30MM की 7 नलियों से फायर करता है. आमतौर पर इसे ड्रोन, हेलीकॉप्टर और क्रूज मिसाइलों से निपटने के लिए लगाया जाता है. जो हर एक मिनट में 4000 से 5800 राउंड फायर करता हैं.
वैसे पाकिस्तान रूस से उसका पेंटासिर सिस्टम खरीदना चाहता था. लेकिन डील फाइनल नहीं हो सकी. इस वजह से पाकिस्तान को चीन का रुख करना पड़ा है.
सबसे बड़ी बात यह है कि LD-2000 को ब्रह्मोस के खिलाफ कोई जादुई ढाल नहीं माना जा सकता. यह एयर डिफेंस की आखिरी परत के तौर पर काम करता है, यानी जब कोई ड्रोन, क्रूज मिसाइल या दूसरा हवाई खतरा बेहद करीब पहुंच जाए, तब उसकी तेज फायरिंग क्षमता से उसे रोकने की कोशिश की जाती है.
ऐसे में पाकिस्तान अगर इसे एयरबेस के आसपास तैनात कर रहा है, तो इसका मकसद अपनी संवेदनशील सैन्य सुविधाओं के चारों तरफ एक अतिरिक्त सुरक्षा घेरा तैयार करना है. हालिया रक्षा रिपोर्टों में भी LD-2000 को पाकिस्तान के संभावित टर्मिनल डिफेंस नेटवर्क का हिस्सा बताया गया है.
पाकिस्तान के लिए नूर खान एयरबेस का महत्व भी इस तैनाती को खास बनाता है. रावलपिंडी के चकलाला इलाके में स्थित यह एयरबेस पाकिस्तान की एयर मोबिलिटी कमांड से जुड़ा है और 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव के दौरान भी यहां मिसाइल हमले हुए थे. ऐसे में किसी क्लोज-इन डिफेंस सिस्टम की तैनाती का सीधा संकेत यही है कि पाकिस्तान अब अपने अहम एयरबेसों की सुरक्षा को कई परतों में मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.
वह अपने एयर डिफेंस नेटवर्क में बदलाव कर रहा है. लंबी दूरी के एयर डिफेंस सिस्टम के बाद अब एयरबेस की बिल्कुल आखिरी सुरक्षा परत को मजबूत किया जा रहा है. जिससे कम ऊंचाई पर आने वाले ड्रोन, क्रूज मिसाइल और दूसरे खतरों के खिलाफ अंतिम क्षण में भी जवाब दिया जा सके. हालांकि, यह कितना कारगर हो पाएगा, यह देखने लायक बात होगी.