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हल्द्वानी 'शुद्धिकरण' विवाद: संसद से सड़क और उत्तराखंड से कर्नाटक तक FIR की जंग-पढ़िए पूरी टाइमलाइन

Haldwani shuddhikaran row: उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद हुए कथित 'शुद्धिकरण' (हवन-यज्ञ) का विवाद अब शांत होने के बजाय एक बड़े अंतरराज्यीय राजनीतिक संग्राम में बदल चुका है. उत्तराखंड में सत्तासीन बीजेपी की सरकार और पुलिस प्रशासन द्वारा मामले में सख्त कार्रवाई न करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक में बड़ी कानूनी स्ट्राइक की गई है.

हल्द्वानी 'शुद्धिकरण' विवाद: संसद से सड़क और उत्तराखंड से कर्नाटक तक FIR की जंग-पढ़िए पूरी टाइमलाइन
Image Credit: haldwani shuddhikaran row

Kharge venue purification row: उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के बाद हुए 'कथित शुद्धिकरण' (हवन/यज्ञ) ने अब एक बड़े राष्ट्रीय और राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है. यह विवाद संसद से लेकर दिल्ली के प्रेस कॉन्फ्रेंस और अब कर्नाटक (बेंगलुरु) में दर्ज हुई जीरो एफआईआर (Zero FIR) तक पहुंच चुका है. ये विवाद कैसे और कहां से शुरू हुआ और जानिए इस पर ताजा अपडेट....

जानिए इस पूरे विवाद की सिलसिलेवार टाइमलाइन
8 अगस्त 2026
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित रामलीला मैदान में 2027 चुनाव की तैयारियों के सिलसिले में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया था. इसी कार्यक्रम के बाद विवाद की नींव पड़ी थी.

10-11 अगस्त 2026
जनसभा के दो दिन बाद 'श्री राम सेना' नामक एक हिंदूवादी संगठन के सदस्यों ने रामलीला मैदान और मंच पर गंगाजल छिड़ककर 'हवन और शुद्धिकरण' का अनुष्ठान किया. आयोजकों ने इसे धार्मिक अनुष्ठान और स्वच्छता अभियान बताया, जबकि कांग्रेस ने इसे खरगे के अपमान और छुआछूत से जोड़कर देखा।

13 अगस्त 2026 (संसद में गूंजा मुद्दा)
मल्लिकार्जुन खरगे ने संसद के मानसून सत्र के दौरान राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाया था. उन्होंने इसे छुआछूत और दलित समुदाय का अपमान बताते हुए अस्पृश्यता कानून के तहत कार्रवाई और गिरफ्तारी की मांग की. सदन में इस पर तीखी बहस हुई और कार्रवाई की मांग उठी. बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए जांच की बात कही.

मध्य-अगस्त 2026 (उत्तराखंड बीजेपी अध्यक्ष का बयान)
उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कथित शुद्धिकरण का बचाव किया. उनका तर्क था कि रामलीला मैदान की धार्मिक पवित्रता बनाए रखने के लिए यह अनुष्ठान किया गया. इस बयान के बाद विवाद और गहरा गया.  कांग्रेस ने महेंद्र भट्ट पर छुआछूत का समर्थन करने का आरोप लगाया.

29 अगस्त 2026 (राहुल गांधी का हमला व प्रेस कॉन्फ्रेंस)
लोकसभा में नेता प्रतिपक्षराहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मामला उठाया. उन्होंने इसे दलितों के अपमान और आधुनिक दौर की छुआछूत बताया. राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग की कि शुद्धिकरण करने वालों और इसका बचाव करने वाले उत्तराखंड बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र भट्ट पर SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए. राहुल ने इसे 'मनुवादी मानसिकता' और छुआछूत करार दिया.

30-31 अगस्त 2026 (उत्तराखंड में काउंटर FIR का ड्रामा)
हल्द्वानी पुलिस स्टेशन में राहुल गांधी के खिलाफ एक स्थानीय नागरिक की शिकायत पर बीएनएस (BNS) की धाराओं और SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने सफाई अभियान को गलत जातिवादी रंग दिया। इसके विरोध में उत्तराखंड कांग्रेस ने पूरे प्रदेश के थानों में बीजेपी नेताओं के खिलाफ शिकायतें दर्ज करानी शुरू कर दीं.

2 से 3 सितंबर 2026
मल्लिकार्जुन खरगे ने जे.पी. नड्डा को पत्र लिखकर याद दिलाया कि संसद में दिए गए आश्वासन के बावजूद उत्तराखंड में पुलिस ने शुद्धिकरण करने वालों पर कोई FIR दर्ज नहीं की है.

4 सितंबर 2026 (कर्नाटक में जीरो FIR दर्ज)
उत्तराखंड में एफआईआर दर्ज न होने के बाद कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक के बेंगलुरु (विधान सौध पुलिस स्टेशन) में अखिल भारतीय आदिवासी/दलित कांग्रेस के पूर्व पदाधिकारी टी.आर. रामप्पा की शिकायत पर जीरो एफआईआर (Zero FIR) दर्ज की गई. इसमें उत्तराखंड बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और अन्य बीजेपी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को नामजद आरोपी बनाया गया है. यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196, SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 की धाराओं के तहत दर्ज की गई है.

क्या होती है जीरो एफआईआऱ?
जीरो एफआईआर (Zero FIR) का मतलब उस एफआईआर से है, जिसे पीड़ित व्यक्ति घटना किस जगह हुई है (क्षेत्राधिकार/Jurisdiction) की परवाह किए बिना देश के किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज करा सकता है.
सामान्य तौर पर पुलिस केवल अपने क्षेत्र में हुए अपराधों की एफआईआर दर्ज करती है, लेकिन गंभीर परिस्थितियों या आपात स्थिति में यह नियम लागू नहीं होता.

इसे 'जीरो' (0) क्यों कहा जाता है?
सामान्य एफआईआर में थाने का एक विशिष्ट सीरियल नंबर (जैसे: FIR No. 120/2026) दर्ज होता है. जब मामला दूसरे थाने का होता है, तो पुलिस इसे बिना कोई केस नंबर दिए यानी "0" (Zero) नंबर के साथ दर्ज करती है. बाद में जब यह फाइल घटना वाले संबंधित थाने में भेजी जाती है, तब वहां इसे नियमित एफआईआर नंबर दिया जाता है.

जीरो एफआईआर के मुख्य नियम और फायदे
अपराध चाहे किसी भी शहर, जिले या राज्य में हुआ हो, पीड़ित नजदीकी किसी भी थाने में शिकायत दे सकता है.इसका मुख्य उद्देश्य पुलिस को 'यह हमारे इलाके का मामला नहीं है' कहकर पीड़ित को टालने से रोकना और तुरंत जांच या डॉक्टरी सहायता शुरू करना है. घटना के तुरंत बाद कार्रवाई होने से महत्वपूर्ण सुराग और सबूत नष्ट होने से बच जाते हैं. जीरो एफआईआर दर्ज करने वाला थाना प्राथमिक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद मामले को संबंधित (घटनास्थल वाले) पुलिस स्टेशन में ट्रांसफर कर देता है.

यह कब दर्ज कराई जाती है?
हत्या, बलात्कार, अपहरण, आर्म्स एक्ट या गंभीर दुर्घटनाओं जैसे संज्ञेय अपराधों (Cognizable Offences) में, जहां तुरंत एक्शन जरूरी हो. जब पीड़िता या पीड़ित व्यक्ति घटना स्थल से दूर किसी अन्य शहर पहुँच गया हो.

(नोट: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के लागू होने के बाद अब देश में किसी भी थाने में जीरो एफआईआर दर्ज कराना कानूनी रूप से पूरी तरह अनिवार्य और आसान बना दिया गया है।)

नतीजा: मामला संसद, सड़क और अब दो राज्यों की पुलिस कार्रवाई तक पहुंच गया है.  एक तरफ राहुल गांधी पर FIR हुई, दूसरी तरफ बेंगलुरु के विधानसभा सौधा पुलिस स्टेशन में उत्तराखंड बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और अन्य नेताओं के खिलाफ जीरो एफआईआर (Zero FIR) दर्ज कर ली गई है. यह विवाद अब महज एक स्थानीय बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संसद के ऊपरी सदन से लेकर कानूनी नोटिसों और एफआईआर की काउंटर-जंग तक फैल गया है.

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About the Author

Preeti Chauhan

Preeti Chauhan

प्रीति चौहान जीन्यूज में पत्रकार हैं, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड डिजीटल टीम में  ब्रेकिंग, हाइपरलोकल, क्राइम, और अन्य मुद्दों को लेकर खबरें लिखती हैं. 
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