दुल्हन लाई बारात, पर तरसता रहा 'विकास': आजादी के दशकों बाद भी पगडंडियों के सहारे उत्तराखंड का ये गांव
चकराता के उदावा गांव में दुल्हन दूल्हे के घर बारात लेकर पहुंची. इस शादी में न कोई फिजूलखर्ची थी और न ही दहेज की कोई मांग. खुशियों के बीच कड़वी हकीकत यह रही कि कोई पक्की सड़क न होने से उबड़-खाबड़ रास्तों पर सभी को पैदल सफर तय करना पड़ा.
चकराता, विजयपाल सिंह भण्डारी: एक तरफ दुनिया चांद पर आशियाना तलाश रही है, तो दूसरी तरफ देश की पटरियों पर बुलेट ट्रेन के फर्राटा भरने की तैयारी में है, लेकिन इन सब के बीच उत्तराखंड की हसीन वादियों में बसा एक गांव आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रहा है. हम बात कर रहे हैं चकराता के उदावा गांव की, जहां आज भी 'विकास' किसी गाड़ी में बैठकर नहीं, बल्कि उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर पैदल ही सफर तय करता है.
फिर कैसे चर्चाओं में आया ये गांव?
यह गांव उस वक्त सुर्खियों में आ गया, जब मंगलवार को यहां एक अनोखी शादी संपन्न हुई. इस शादी ने जौनसार बावर की उस खूबसूरत परंपरा को दुनिया के सामने रखा, जिसमें दुल्हन सज-धजकर ढोल-दमाऊ की थाप पर दूल्हे के घर बारात लेकर पहुंचती है वो भी बिना किसी दहेज और दिखावे के, लेकिन इस शादी के जश्न के साथ ही एक कड़वी हकीकत ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है.
बिना गाड़ियों के निकली बारात
मंगलवार को सुंदर पारंपरिक पहनावे में सजी-धजी दुल्हन खुद बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंची. न तो कोई फिजूलखर्ची थी और न ही दहेज की कोई मांग. आज के दौर में जहां शादियां स्टेटस सिंबल बन चुकी हैं, वहीं उदावा गांव की इस शादी ने सादगी और समानता की एक मिसाल पेश की, लेकिन इस खुशी भरे माहौल में एक दर्दनाक सच फिर सामने आया. दुल्हन और उसके रिश्तेदारों का हुजूम गाड़ियों में नहीं, बल्कि मीलों लंबे पथरीले, खतरनाक और कच्चे रास्तों पर पैदल चलकर दूल्हे के घर पहुंचे.
आजादी के दशकों बाद भी सड़क से महरूम
शादी में शामिल होने आए मेहमान जब गांव के बदहाल रास्तों और कनेक्टिविटी के अभाव से रूबरू हुए, तो वे हैरान रह गए. उन्होंने इस पर चुप्पी तोड़ने का फैसला किया. फिर क्या था बारातियों ने इस खतरनाक सफर के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर कर दिए, जो अब तेजी से वायरल हो रहे हैं. आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी एक पक्की सड़क का न होना, न सिर्फ प्रशासनिक दावों पर सवाल खड़े करता है.
गांव वालों का कहना है कि सड़क न होने का खामियाजा उन्हें रोजाना भुगतना पड़ता है. किसी बुजुर्ग या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो, या फिर घर का राशन पहुंचाना हर छोटे-बड़े काम के लिए जान जोखिम में डालनी पड़ती है.
मुख्यधारा से कब जुड़ेगा ये गांव?
जो उदावा गांव अपनी अनूठी और प्रगतिशील संस्कृति से पूरे देश को समानता और सादगी की दिशा दिखा रहा है, वही गांव आज पक्की सड़क के लिए तरस रहा है. ढोल-दमाऊ की थाप पर झूमते बारातियों के कदम भले ही नहीं रुके, लेकिन हर किसी के जेहन में बस एक ही सवाल है आखिर कब इस गांव तक सड़क पहुंचेगी? कब तक विकास का यह सफर सिर्फ पगडंडियों तक ही सीमित रहेगा?
यह भी पढ़िए: सिलक्यारा टनल को लेकर आई सबसे बड़ी खबर: मार्च 2027 में पूरा हो जाएगा निर्माण कार्य, जानें कब से दौड़ेंगे वाहन?