लखनऊ, विशाल रघुवंशी: यूपी की राजनीति में अगर सत्ता का सिंहासन हासिल करना है, तो सामाजिक और जातीय समीकरणों का गणित सटीक होना बहुत जरूरी है. 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कुर्मी कार्ड के दम पर प्रचंड जीत हासिल की. बीजेपी ने 403 में से 255 सीटों पर कब्जा कर लिया था. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले झटके के बाद अब बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए नए सिरे से गोटियां सेट कर रही है.
इस बार बीजेपी की रणनीति केवल कुर्मी समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि वह कुर्मी समाज के साथ-साथ दलित वर्ग की सबसे प्रभावशाली 'पासी' जाति को भी साधकर एक अभेद्य 'ओबीसी-दलित गठबंधन' तैयार करने में जुटी हुई है. पंकज चौधरी को यूपी बीजेपी की कमान सौंपना इसी रणनीति का सबसे बड़ा उदाहरण माना जा रहा है. आइए समझते हैं कि यूपी के इस पूरे सियासी समीकरण और आंकड़ों का खेल क्या है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यादवों के बाद कुर्मी समाज अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है. साल 2001 में यूपी सरकार की बनाई हुकुम सिंह कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, कुर्मी की आबादी राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 7.4% है. 2011 जनगणना में यूपी की कुल आबादी करीब 20 करोड़ थी. 2026 की अनुमानित आबादी करीब 25 करोड़ हो सकती है. इस हिसाब से यूपी में कुर्मी की आबादी करीब 1.75 से 2 करोड़ के बीच मानी जाती है.
वर्तमान समय में यूपी के 403 विधायकों में कुर्मी/पटेल की संख्या 40 है. इसमें भाजपा से 27, सपा से 12 और कांग्रेस से 1 विधायक हैं. 100 एमएलसी में 5 कुर्मी समाज से हैं. 2024 के झटके के बाद पार्टी ने कुर्मी समाज के दिग्गज नेता पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यह साफ संदेश दिया है कि 2027 के चुनाव में कुर्मी उम्मीदवारों को अधिक से अधिक टिकट दिए जाएंगे.

विधानसभा चुनाव 2027 में कुर्मी के साथ-साथ पासी समाज को भी भाजपा साथ में रख रही है. दलित समुदाय के भीतर दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली पासी जाति बहुत महत्वपूर्ण है. यूपी में 2011 की जनगणना के मुताबिक, पासी जाति की आबादी 6522166 थी.
उत्तर प्रदेश में पासी जाति के मतदाताओं का मजबूत प्रभाव अवध और पूर्वांचल में देखने को मिलता है. लखनऊ, रायबरेली, अमेठी, बाराबंकी, हरदोई, उन्नाव, सीतापुर, कौशांबी, प्रयागराज, फतेहपुर, बस्ती, गोंडा और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में पासी मतदाता जीत-हार में अहम भूमिका निभाते हैं.
प्रदेश की कम से कम 103 विधानसभा सीटों के चुनावी नतीजों में इनकी अहम भूमिका रहती है. करीब 60 से 70 विधानसभा सीटों और 12 से 15 लोकसभा सीटों पर पासी मतदाता जीत-हार में बेहद निर्णायक माने जाते हैं.
पूर्व के विधानसभा चुनावों में इन दोनों जातियों के उम्मीदवारों का स्ट्राइक रेट (जीत का प्रतिशत) काफी शानदार रहा है. राजनीति के जानकारों की मानें तो 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का जो दांव चला था, बीजेपी अब उसकी काट के रूप में कुर्मी (गैर-यादव ओबीसी) और पासी (गैर-जाटव दलित) के इस जुगलबंदी पर काम कर रही है.
अगर बीजेपी अपने इस 'कुर्मी + पासी' समीकरण को धरातल पर उतारने में सफल रहती है, तो अवध और पूर्वांचल के बड़े हिस्से में विपक्ष के सियासी गणित को भारी झटका लग सकता है. 2027 के रण से पहले बीजेपी का यह सोशल इंजीनियरिंग प्लान यूपी की राजनीति को एक नया मोड़ देता दिख रहा है.