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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शनिवार को सर सैयद अहमद खान की जयंती पर जुटने वाले लोग एक ऐसे शख्स को याद करेंगे, जिसने भारतीय मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा की राह दिखाने का बीड़ा उठाया था. विश्वविद्यालय के संस्थापक का जन्मदिन यहां सिर्फ एक रस्मी आयोजन नहीं, बल्कि उस विचार की याद है जिसने एक बड़े सामाजिक बदलाव की नींव रखी.
इस बार 'सर सैयद डे' कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया है. लेकिन सर सैयद को याद करते हुए एक सवाल पूछना भी जरूरी है कि क्या उनकी आधुनिकता उतनी ही आधुनिक थी जितनी हम आज मान लेते हैं?
सर सैयद अहमद खान का जन्म 17 अक्टूबर 1817 को दिल्ली में हुआ था. 1857 के विद्रोह के बाद भारतीय समाज, खासकर मुस्लिम अभिजात वर्ग, राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रहा था. मुगल सत्ता का पतन हो चुका था और अंग्रेजी शासन अपनी पकड़ मजबूत कर रहा था.
ऐसे दौर में सर सैयद ने समझा कि बदलती दुनिया में सिर्फ अतीत की शान का बखान करके भविष्य नहीं बनाया जा सकता. विज्ञान, अंग्रेजी और आधुनिक ज्ञान से दूरी किसी समाज को पीछे धकेल सकती है. यहीं से उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूमिका शुरू होती है.
सर सैयद ने मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा अपनाने के लिए प्रेरित किया. 1875 में अलीगढ़ में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज की स्थापना इसी सोच का नतीजा थी. यही संस्थान आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना. शिक्षा के लिए चंदा जुटाना, समाज के प्रभावशाली लोगों को साथ लाना और अंग्रेजी शिक्षा के प्रति संदेह दूर करना आसान काम नहीं था.
उनकी सोच का महत्व इस बात में है कि उन्होंने शिक्षा को महज नौकरी पाने का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के साधन के रूप में देखा. 1847 में प्रकाशित उनकी पुस्तक 'आसार-उस-सनादीद' दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों और विरासत के अध्ययन के लिए भी उल्लेखनीय है. वह इतिहास, तर्क और ज्ञान के महत्व को समझते थे.
आज जब शिक्षा पर अक्सर पहचान, विचारधारा और राजनीतिक खेमेबंदी के चश्मे से बहस होती है, तब सर सैयद की यह सीख प्रासंगिक लगती है कि किसी समाज की तरक्की के लिए ज्ञान के नए दरवाजे खोलने पड़ते हैं.
लेकिन इतिहास का ईमानदार मूल्यांकन केवल उपलब्धियों की माला पहनाने से नहीं होता. असली परीक्षा तब होती है, जब हम अपने नायकों के असुविधाजनक विचारों पर भी बात करने का साहस दिखाएं.
सर सैयद की विरासत का सबसे पेचीदा पहलू महिलाओं की शिक्षा को लेकर उनके विचार हैं. पुरुषों के लिए पश्चिमी शिक्षा और आधुनिक ज्ञान की वकालत करने वाले सर सैयद महिलाओं की शिक्षा के मामले में कहीं अधिक परंपरावादी थे.
द वायर पर प्रकाशित एक लेख में सर सैयद के भाषणों और विचारों के हवाले से बताया गया है कि वह महिलाओं की शिक्षा को मुख्यतः धार्मिक ज्ञान, नैतिकता, घरेलू कामकाज, पति के प्रति कर्तव्य और बच्चों की परवरिश तक सीमित रखना चाहते थे. उन्होंने महिलाओं के लिए भूगोल, बीजगणित, त्रिकोणमिति और इतिहास जैसे विषयों की उपयोगिता पर सवाल उठाए थे.
यहां एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है. जिस व्यक्ति ने पुरुषों को बदलते समय के साथ चलने का संदेश दिया, वह महिलाओं के लिए ज्ञान की दुनिया का दायरा सीमित रखने के पक्ष में था.
क्या आधुनिकता का अर्थ सिर्फ पुरुषों के लिए नए अवसर पैदा करना है? क्या समाज को वैज्ञानिक और तार्किक बनाने का सपना आधी आबादी को उन विषयों से दूर रखकर पूरा किया जा सकता है जो आधुनिक दुनिया को समझने के लिए जरूरी हैं?
सर सैयद अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित थे, लेकिन यही बात उनके विचारों की आलोचना को खत्म नहीं कर देती. उनका युग उन्हें समझने का संदर्भ देता है, हर विचार को सही ठहराने का प्रमाणपत्र नहीं है.
आज एएमयू और दूसरी संस्थाओं में पढ़ने वाली छात्राओं की उपलब्धियों को देखते हुए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. महिलाओं की शिक्षा किसी पुरुष की शिक्षा का अप्रत्यक्ष लाभ नहीं बल्कि उनका स्वतंत्र अधिकार है.
सर सैयद की सामाजिक सुधार संबंधी सोच पर एक दूसरा सवाल भी है, आखिर उनकी नजर में शिक्षा और तरक्की का लाभ किन लोगों तक पहुंचना चाहिए था?
महिलाओं की शिक्षा को लेकर उनकी कल्पना में वर्ग और सामाजिक हैसियत की सीमाएं भी दिखाई देती हैं. इस आलोचना का आधार यह है कि आधुनिक शिक्षा की वकालत करने के बावजूद उनकी सोच सभी सामाजिक समूहों के लिए समान रूप से समावेशी नहीं थी.
यह विरोधाभास सिर्फ सर सैयद तक सीमित नहीं था. उन्नीसवीं सदी के अनेक सुधारक अपने समाज की रूढ़ियों को चुनौती देते हुए भी जाति, वर्ग और लैंगिक समानता के सवालों पर अपने समय की सीमाओं से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाए.
इसलिए सर सैयद का मूल्यांकन करते समय दो बातें एक साथ स्वीकार करनी होंगी. उन्होंने आधुनिक शिक्षा का रास्ता खोलने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई लेकिन उनकी सुधारवादी दृष्टि की भी सीमाएं थीं. किसी व्यक्ति का एक क्षेत्र में क्रांतिकारी होना उसे हर दूसरे क्षेत्र में प्रगतिशील नहीं बना देता.
सर सैयद की विरासत पर बहस का एक और पहलू भारतीय राष्ट्रवाद और मुस्लिम पहचान के बीच संबंधों से जुड़ा है. 1857 के बाद उन्होंने ब्रिटिश शासन के साथ टकराव के बजाय सहयोग और शिक्षा के माध्यम से मुस्लिम समाज को आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाई. उनकी प्राथमिकताओं में आधुनिक शिक्षा और समुदाय की सामाजिक स्थिति सुधारना प्रमुख था.
समय के साथ उनकी राजनीति और सामुदायिक पहचान संबंधी विचारों पर भी बहस हुई. सर सैयद के विचारों का आगे चलकर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं ने अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल किया. लेकिन बाद के घटनाक्रमों की पूरी जिम्मेदारी उनके सिर डाल देना भी इतिहास को सरल बनाकर पेश करना होगा.
उनकी विरासत का उचित आकलन करने के लिए यह देखना होगा कि उन्होंने अपने दौर की चुनौतियों का सामना कैसे किया, किन विचारों को बढ़ावा दिया और किन सवालों पर उनकी सोच सीमित रही.
सर सैयद अहमद खान की जयंती का अर्थ उनके योगदान को कम करके आंकना नहीं है. इसका अर्थ यह भी नहीं कि उनकी आलोचना करके उनकी उपलब्धियों को मिटा दिया जाए.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय उनकी शैक्षिक दृष्टि का जीवंत प्रमाण है. हजारों विद्यार्थियों और शिक्षकों की दुनिया में इस विरासत का महत्व आज भी बना हुआ है.
लेकिन किसी संस्थापक का सम्मान उसके हर विचार को अंतिम सत्य मान लेने से नहीं बल्कि उसकी सोच को समय के साथ आगे बढ़ाने से होता है.
अगर सर सैयद ने अपने दौर में शिक्षा के बंद दरवाजे खोलने की कोशिश की, तो आज उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का मतलब उन दरवाजों को हर वर्ग, हर समुदाय और हर लिंग के लिए खुला रखना है.
अगर उन्होंने आधुनिक ज्ञान को अपनाने की जरूरत समझी तो आज उनके नाम पर होने वाली चर्चा में महिलाओं की समानता, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक न्याय के सवाल भी शामिल होने चाहिए.
सर सैयद की महानता इस बात में है कि उन्होंने अपने समय की एक बड़ी चुनौती को पहचाना और शिक्षा के जरिए बदलाव की राह बनाई. उनकी सीमा इस बात में थी कि वह बदलाव की उस राह को सभी के लिए समान रूप से खुला नहीं देख पाए.