ना राम का नाम, ना मर्यादा का पाठ... सिर्फ 'जय लंकेश': 10 सिर वाले राजा की बारात में झूमा पूरा शहर!
Prayagraj Ravan Barat: दशहरे से पहले प्रयागराज में लंकाधिपति रावण की शाही सवारी इस साल भी परंपरागत तरीके से पूरी भव्यता के साथ निकाली गई. महर्षि भारद्वाज के मंदिर से निकाली गई शाही सवारी से पहले प्राचीन शिव मंदिर में लंकाधिपति की आरती और पूजा-अर्चना कर उनके जयकारे लगाए गए.
Prayagraj Ravan Barat/ मो. गुफरान: दशहरे के पावन पर्व से पहले संगम नगरी प्रयागराज की सड़कें एक ऐसी अनूठी और अद्भुत परंपरा की गवाह बनीं, जो पूरे देश में शायद ही कहीं और देखने को मिलती है. यहां भगवान राम की विजयगाथा से ठीक पहले तीनों लोकों के विजेता लंकाधिपति रावण का पूरे राजकीय ठाट-बाट, भव्यता और आन-बान-शान के साथ शाही सवारी निकाला गया. कटरा रामलीला कमेटी ने यह शोभा यात्रा निकाली.
प्राचीन शिव मंदिर में दशानन की आरती
इस प्रसिद्ध 'रावण बारात' को देखने के लिए जनसैलाब सड़कों पर उमड़ पड़ा. शाही यात्रा का आगाज महर्षि भारद्वाज के मंदिर से हुआ. बारात रवाना होने से ठीक पहले प्राचीन शिव मंदिर में दशानन की आरती उतारी गई और 'जय लंकेश' के जयकारे के साथ उनका पूजन किया गया. इसके बाद जब भव्य रथ पर रखे विशालकाय सिंहासन पर सवार होकर रावण निकले, तो उनके तेवर देखने लायक थे.
मायावी सेना सबसे बड़ा आकर्षण
उनके पीछे अलग-अलग भव्य रथों पर महारानी मंदोदरी, भ्राता कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद समेत पूरा शाही कुनबा विराजमान था. इस बारात में सिर्फ गाजे-बाजे ही नहीं थे, बल्कि सबसे बड़ा आकर्षण रावण की वो मायावी सेना थी, जो बारात के आगे-आगे अनोखे करतब दिखाते हुए चल रही थी. धमाकेदार बैंड-बाजा, विजय धुनों की गूंज, रंग-बिरंगी आतिशबाजी और लगातार होती फूलों की बारिश के बीच महौल ऐसा बन गया मानो लंकाधिपति वास्तव में त्रिलोक जीतकर लौटे हों.
आधी रात तक कटरा की गलियों में भीड़
संगम नगरी की यह दशकों पुरानी ऐसी परंपरा है, जहां मर्यादा पुरुषोत्तम राम से पहले रावण के ऐश्वर्य की पूजा की जाती है. सबसे दिलचस्प नियम यह है कि इस पूरी शोभा यात्रा के दौरान राम नाम का जाप करना सख्त वर्जित माना जाता है. इस ऐतिहासिक और रोमांचक पल को अपने कैमरों में कैद करने के लिए आधी रात तक कटरा की गलियों में पैर रखने की जगह नहीं बची थी.
क्यों निकलती है ये शोभा यात्रा?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, धन के देवता कुबेर ऋषि भारद्वाज के नाती थे और रावण उनका भाई था. इस रिश्ते से कटरा क्षेत्र के लोग रावण को अपने इलाके का 'नाती' मानते हैं. यहां रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एक परम ज्ञानी, प्रकांड विद्वान और शिव भक्त के रूप में भी देखा जाता है. इसी वजह से रामलीला की शुरुआत में उनके इसी विद्वान और तेजस्वी स्वरूप को आदर देने के लिए यह शाही शोभा यात्रा निकाली जाती है.