)
दिल्ली में राहुल गांधी संविधान, लोकतंत्र और सत्ता के अहंकार पर हमला बोलते हैं. कैमरे उनकी बातों को पकड़ते हैं. सोशल मीडिया पर उनकी रैलियों की चर्चा होती है.
लेकिन लखनऊ पहुंचते ही कांग्रेस की कहानी बदल जाती है. यहां सवाल बीजेपी को घेरने का नहीं बल्कि यह है कि कांग्रेस अपने लोगों को एक साथ कैसे रखे?
यहां नेतृत्व बदलने के बाद भी सियासी बेचैनी खत्म नहीं हो रही है. दिल्ली में कांग्रेस एकजुट विपक्ष बनने का दावा करती है. लखनऊ में उसके नेता एक-दूसरे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिखते. यही यूपी कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना है.
यह सिर्फ अनुशासन का मामला नहीं है. यह राजनीतिक विश्वसनीयता का सवाल है. जो पार्टी अपने नेताओं के बीच भरोसा नहीं बना सकती, वह मतदाताओं से भरोसा मांगने कैसे जाएगी?
अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर आराधना मिश्रा 'मोना' को जिम्मेदारी देना और इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना कांग्रेस की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है.
ब्राह्मण चेहरे के रूप में मोना और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं के बीच प्रभाव रखने वाले मसूद के जरिए पार्टी अपने पुराने सामाजिक समीकरणों को फिर से साधना चाहती है. मगर राजनीति में जातीय गणित बैठा देने भर से संगठन खड़ा नहीं हो जाता है.
अजय राय की नाराजगी इसीलिए महत्वपूर्ण है. वह केवल एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नहीं हैं. वह पूर्वांचल की राजनीति में अपनी पहचान रखते हैं और वाराणसी से उनका जुड़ाव भी राजनीतिक महत्व रखता है.
उनके समर्थकों की नाराजगी यदि व्यक्तिगत असंतोष से आगे बढ़कर संगठनात्मक विद्रोह में बदलती है तो कांग्रेस को इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
उनके वाराणसी जाने, पार्टी के कुछ कार्यक्रमों से अनुपस्थित रहने और नेतृत्व परिवर्तन के बाद पैदा हुए विवाद ने उनके अगले राजनीतिक कदम को लेकर अटकलें तेज की है.
बीजेपी में वापसी की चर्चा भी इसी संदर्भ में हो रही है. लेकिन अटकल को फैसला मान लेना जल्दबाजी होगी. अभी यह कहना उचित नहीं कि अजय राय कांग्रेस छोड़ ही देंगे या किसी दूसरी पार्टी में जाएंगे.
असल सवाल इससे बड़ा है. क्या कांग्रेस अजय राय को सम्मानजनक भूमिका देकर साथ रख पाएगी? और अगर वह पार्टी में रहते हैं तो क्या नए नेतृत्व के साथ काम करेंगे?
संगठन की मजबूती का पैमाना यही होगा. किसी नेता को पद से हटाना आसान है. उसके प्रभाव और समर्थकों को साथ बनाए रखना कठिन होता है.
अजय राय के लिए भी रास्ता उतना सरल नहीं है. पार्टी छोड़ने का फैसला उनके राजनीतिक भविष्य, स्थानीय समीकरणों और उपलब्ध विकल्पों पर निर्भर करेगा. कांग्रेस में बने रहने पर उन्हें नई व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाना होगा.
बाहर जाने पर उन्हें नए सिरे से अपनी उपयोगिता साबित करनी होगी लेकिन कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी नेता की नाराजगी को समय रहते नहीं संभाला गया तो वह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं रहती. वह गुटबाजी का नया केंद्र बन सकती है.
आराधना मिश्रा 'मोना', इमरान मसूद और राजेंद्र पाल गौतम जैसे नेताओं की भूमिका कांग्रेस की सामाजिक पहुंच बढ़ाने में अहम हो सकती है. लेकिन इन चेहरों का होना और इनके बीच प्रभावी समन्वय होना दो अलग बातें हैं.
प्रदेश अध्यक्ष के रूप में मोना के सामने संगठन को एकजुट करने की चुनौती है. इमरान मसूद के सामने अपने प्रभाव को पार्टी की व्यापक रणनीति से जोड़ने की जिम्मेदारी है. राजेंद्र पाल गौतम के जरिए कांग्रेस दलित राजनीति और सामाजिक न्याय के सवालों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाह सकती है.
इन सभी नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि और प्राथमिकताएं अलग हैं. यही विविधता कांग्रेस की ताकत बन सकती है लेकिन इसके लिए साझा रणनीति, स्पष्ट जिम्मेदारियां और आपसी संवाद जरूरी हैं. यदि हर नेता अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में लगा रहेगा तो पार्टी की जमीन कौन तैयार करेगा?
कांग्रेस को यह भी तय करना होगा कि फैसले कौन लेगा और जवाबदेही किसकी होगी. प्रदेश अध्यक्ष के पास अधिकार हैं तो उन अधिकारों का सम्मान भी होना चाहिए. कार्यकारी अध्यक्ष की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए.
दूसरे वरिष्ठ नेताओं को भी यह भरोसा मिलना चाहिए कि उनकी राजनीतिक उपयोगिता खत्म नहीं हुई है. राजेंद्र पाल गौतम समेत सभी प्रमुख नेताओं को किसी साझा संगठनात्मक कार्यक्रम के तहत काम करना होगा. केवल मंच साझा करने या तस्वीर खिंचवाने से समन्वय पैदा नहीं होता है.
यहां एक और खतरा है. अगर नए नेतृत्व को पुराने गुटों के विरोध का सामना करना पड़ता रहा तो उसकी शुरुआत ही कमजोर हो जाएगी. और यदि नए नेतृत्व ने विरोधियों को किनारे लगाने की कोशिश की तो गुटबाजी और गहरी हो सकती है. कांग्रेस को इन दोनों रास्तों से बचना होगा.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि उसका मुकाबला केवल बीजेपी से नहीं है. उसे अपने गठबंधन सहयोगी समाजवादी पार्टी के बीच भी राजनीतिक जगह बनानी है.
बीजेपी के पास लंबे समय से तैयार संगठनात्मक ढांचा, चुनावी संसाधन और बूथ स्तर तक पहुंच बनाने की क्षमता है. समाजवादी पार्टी के पास अपना मजबूत सामाजिक आधार, क्षेत्रीय नेतृत्व और कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है.
दोनों पार्टियों की रणनीतियां अलग हो सकती हैं लेकिन उन्हें चुनावी मुकाबले में अपनी संगठनात्मक ताकत का लाभ मिलता है.
कांग्रेस के सामने इसके उलट दोहरी मुश्किल है. उसे अपना संगठन खड़ा करना है और गठबंधन में अपनी हैसियत भी बचानी है.
सपा के साथ सीटों के बंटवारे में यदि कांग्रेस को कम सीटें मिलती हैं तो उसके स्थानीय कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हो सकता है.
बीजेपी से मुकाबला करने के लिए विपक्षी एकता जरूरी हो सकती है लेकिन एकता का अर्थ संगठन का आत्मसमर्पण नहीं है. कांग्रेस को ऐसी रणनीति चाहिए जिसमें गठबंधन भी बचे और पार्टी का अपना आधार भी बढ़े.
कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस विवाद को सुलझा सकता है. उसके पास वरिष्ठ नेताओं को साथ बैठाने, जिम्मेदारियां तय करने और संगठनात्मक फैसलों पर सहमति बनाने की क्षमता है. लेकिन समाधान केवल दिल्ली में बैठक बुलाने से नहीं निकलेगा.
केंद्रीय नेतृत्व को पहले यह समझना होगा कि उत्तर प्रदेश में असंतोष की वजह केवल प्रदेश अध्यक्ष का बदलना नहीं है.
सवाल यह भी है कि स्थानीय नेताओं को फैसलों में कितना भरोसे में लिया जाता है, कार्यकर्ताओं को कितनी राजनीतिक जगह मिलती है और चुनाव की तैयारी में उनकी भूमिका क्या है.
राहुल गांधी और पार्टी के दूसरे केंद्रीय नेताओं के सामने चुनौती केवल लोकप्रियता को वोट में बदलने की नहीं है. उन्हें राज्यों में ऐसी इकाइयां तैयार करनी होंगी जो अपने स्तर पर फैसले ले सकें, विवाद सुलझा सकें और चुनावी जिम्मेदारी उठा सकें.
हर विवाद का समाधान दिल्ली से आने वाले निर्देश पर निर्भर होगा तो प्रदेश संगठन कभी आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगा.
कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में एक स्पष्ट संगठनात्मक रोडमैप चाहिए. किस जिले में किस नेता की जिम्मेदारी होगी? पुराने कार्यकर्ताओं को कैसे जोड़ा जाएगा?
नए सामाजिक प्रतिनिधित्व को संगठन में वास्तविक अधिकार कैसे मिलेंगे? गठबंधन के बावजूद पार्टी अपना जनाधार कैसे बढ़ाएगी?
दिल्ली की कांग्रेस उम्मीद जगा सकती है लेकिन लखनऊ की कांग्रेस को उस उम्मीद के लिए जमीन तैयार करनी होगी.
चुनावी पोस्टर पर एक चेहरा काफी हो सकता है, चुनाव जीतने के लिए संगठन चाहिए. और जो पार्टी अपने ही नेताओं को साथ लेकर नहीं चल सकती वह जनता को साथ लाने का दावा कितने दिन करेगी?
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को बीजेपी से लड़ने से पहले अपने भीतर के अविश्वास को हराना होगा. वरना चुनाव आएगा, भाषण होंगे, गठबंधन होगा और फिर वही सवाल खड़ा होगा कि कांग्रेस का मुकाबला आखिर कौन कर रहा है बीजेपी या कांग्रेस खुद?
दिल्ली में कांग्रेस लोकतंत्र की लड़ाई लड़ सकती है. लेकिन लखनऊ में उसे पहले अपने संगठन के भीतर लोकतांत्रिक व्यवहार और अनुशासन दिखाना होगा.
क्योंकि चुनाव में जनता बीजेपी और सपा से कांग्रेस की तुलना करेगी लेकिन वोट देने से पहले यह भी देखेगी कि कांग्रेस खुद कितनी तैयार है.
अगर पार्टी अपने मुख्यालय में एक नेतृत्व परिवर्तन नहीं संभाल सकती तो लाखों मतदाताओं के भरोसे को संभालने का दावा कैसे करेगी?
2027 में कांग्रेस को बीजेपी से लड़ना है. सपा के साथ सीटों की लड़ाई भी लड़नी है. उससे पहले उसे अपने भीतर चल रही उस लड़ाई को रोकना होगा, जिसमें हर गुट जीतना चाहता है और पार्टी हारने का जोखिम उठा रही है.