यूपी का इकलौता मंदिर,जहां साल के 364 दिन ढकी रहती है रावण की मूर्ति, दशहरे पर होती है लंकापति की पूजा
जहां देशभर में दशहरे पर रावण का दहन होता है, वहीं कानपुर में उसकी पूजा की जाती है! जी हां, उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां रावण को बुराई का प्रतीक मानकर जलाया नहीं जाता, बल्कि उसकी विद्वता और ज्ञान का सम्मान करते हुए विधि-विधान से पूजन किया जाता है.
कानपुर: विजयादशमी यानी दशहरे का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है. इस दिन देश के कोने-कोने में रावण के बड़े-बड़े पुतले जलाए जाते हैं और आतिशबाजी होती है. लेकिन उत्तर प्रदेश केकानपुर में एक ऐसी जगह मौजूद है, जहां परंपराएं बिल्कुल अलग हैं. यहां रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि उसकी विद्वता और ज्ञान को नमन करते हुए उसकी विधि-विधान से पूजा की जाती है. आइए जानते हैं इस अनोखे मंदिर की खासियत और यहां दशहरे पर होने वाले पूजन के बारे में।
कैलाश मंदिर परिसर में स्थित है 130 साल पुराना मंदिर
कानपुर के पुराने और प्रतिष्ठित इलाके शिवाला में स्थित प्रसिद्ध कैलाश मंदिर के प्रांगण में ही यह अनोखा दशानन मंदिर बना हुआ है. इतिहास के दस्तावेजों पर एक नजर डालें तो इस मंदिर की स्थापना लगभग 1890 के दशक में महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने करवाई थी. इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसका नियम है. यह साल के 364 दिन पूरी तरह बंद रहता है और केवल साल में एक बार विजयादशमी के पावन दिन ही आम जनता के दर्शन के लिए खोला जाता है.
सालभर कपड़े से ढकी रहती है प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह में लंकापति रावण की करीब पांच फीट ऊंची भव्य प्रतिमा स्थापित है.साल के बाकी दिनों में इस मूर्ति को एक विशेष चादर से ढंक कर रखा जाता है. जैसे ही विजयादशमी की सुबह होती है, मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और मूर्ति से पर्दा हटाया जाता है. इसके बाद यहां पहुंचने वाले सैकड़ों श्रद्धालु 'लंकानरेश रावण की जय' के जयकारे लगाते हैं. लोग उनकी प्रतिमा के सामने सरसों के तेल के दीपक जलाते हैं, धूपबत्ती अर्पित करते हैं और अपने परिवार के कल्याण की मन्नत मांगते हैं.
क्यों होती है यहां रावण की पूजा?
स्थानीय मान्यताओं और जानकारों के अनुसार, रावण भले ही अपने अहंकार और माता सीता के अपहरण के कारण कुख्यात रहा हो, लेकिन वह वेदों का मर्मज्ञ, महान पंडित, प्रकांड ज्योतिषी और भगवान शिव का परम भक्त भी था. मंदिर परिसर में स्थापित मां छिन्नमस्तिका देवी के पूजन के साथ रावण की पूजा को भी महत्व दिया जाता है. लोगों का ऐसा विश्वास है कि यहां रावण की आराधना करने से ज्ञान, बुद्धि और हर क्षेत्र में सफलता का आशीर्वाद मिलता है.
शाम ढलते ही बंद हो जाते हैं कपाट
दशहरे के दिन सुबह से लेकर शाम तक इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है. जैसे ही शहर में जगह-जगह रावण दहन का समय नजदीक आता है, इस मंदिर में विशेष आरती संपन्न की जाती है. इसके तुरंत बाद, शाम ढलते ही (करीब 7 से 8 बजे के बीच) मंदिर के कपाट आगामी एक साल के लिए फिर से बंद कर दिए जाते हैं.
उत्तर प्रदेश की यह अनूठी संस्कृति और परंपरा यह सिखाती है कि हमारी सनातन परंपरा में केवल बुराइयों के अंत (दहन) का ही विधान नहीं है, बल्कि ज्ञान और विद्वत्ता के सम्मान का भी एक अनूठा पहलू शामिल है.
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