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पापा नीतीश का अधूरा सपना पूरा करेंगे निशांत कुमार? यूपी के सियासी अखाड़े में JDU के नए दांव की पड़ताल!

नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार यूपी चुनाव में JDU की कमान संभालने जा रहे हैं. क्या BJP के साथ सीटों का बंटवारा होगा या JDU अकेले चुनाव लड़कर NDA का गणित बिगाड़ेगी? जानिए कुर्मी वोटों और समाजवादी पार्टी पर इसके संभावित असर की पूरी कहानी.

Written By Gunateet Ojha
Published: Nov 02, 2026, 10:39 PM IST | Updated: Nov 02, 2026, 10:48 PM IST
Image Credit: Z Creative (AI Image)
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उत्तर प्रदेश का सियासी रण सजते ही तमाम सियासी रणबांकुरे एक्टिव हो गए हैं. यूपी की बात ही अलग है. यहां की राजनीति में सब अपने सितारे बुलंद करने पर आमादा हैं. बगल के बिहार से यूपी में चुनाव लड़ने की छटपटाहट एक बार फिर जिंदा हो गई है! अचरज तो यह है कि सत्तासीन भाजपा की नाक में दम करने के लिए, बिहार में उनका सहयोगी दल जेडीयू ही अगबगा रहा है! नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने यूपी चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. उन्होंने कहा है कि वे यूपी चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ेंगे. सीटों पर बात नहीं बनी तो अकेले चुनाव लड़ेंगे. अब देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा, निशांत कुमार को कितना वजन देती है? क्योंकि भाजपा के पास कुर्मी समाज का वोट अपने पाले में लाने के लिए यूपी में अनुप्रिया पटेल (अपना दल-एस) पहले से तैयार हैं.

 

नी​तीश कुमार यूपी में आजमा चुके हैं अपनी किस्मत  

अपना दल-एस और जेडीयू में सीटों का बंटवारा हुआ तो वोटों का बिखराव भी होना तय है. भाजपा के लिए यह चैलेंज नया नहीं है. निशांत से पहले उनके पिता नीतीश कुमार भी यूपी में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं. उन्हें बड़ी जीत तो नहीं मिली थी, लेकिन यूपी में एंट्री जरूर मिल गई थी. यूपी में इस सियासी ट्विस्ट ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. भाजपा निशांत कुमार को यूपी में पैर जमाने का मौका देगी या नहीं? यूपी में अपनी किस्मत आजमाने के लिए जेडीयू और क्या हथकंडे अपना सकती है? जेडीयू अगर यूपी में चुनाव लड़ती है तो इससे भाजपा और सपा का चुनावी गणित कैसे प्रभावित होगा? आइये आगे की खबर में जानते हैं इन सवालों के जवाब...

कोई नई बात नहीं है  

यूपी की राजनीति में अच्छी पकड़ रखने वाले लखनऊ में हमारे वरिष्ठ पत्रकार तुषार श्रीवास्तव के साथ इस मसले पर विस्तार से बात हुई. उन्होंने इस विषय पर चर्चा करते हुए उस दौर का जिक्र किया, जब बिहार की राजनीति से निकलकर नीतीश कुमार ने यूपी के सियासी गलियारों में हलचल मचाई थी. बात है साल 2015 की. बिहार चुनाव जीतने के बाद ऐसा लगा था कि जेडीयू अब उत्तर प्रदेश के रास्ते नेशनल लेवल पर अपनी बड़ी पारी खेलने वाली है. वाराणसी से लेकर तमाम जगहों पर हलचल शुरू हुई थी, लेकिन देखते-देखते वो जोश ठंडा पड़ गया और साल 2017 आते-आते जेडीयू पीछे हट गई.

क्या यह सिर्फ प्रेशर पॉलिटिक्स है?  

अब सवाल यह उठता है कि क्या यूपी में जेडीयू का यह कदम कोई सीरियस चुनावी तैयारी है या फिर यह सिर्फ एनडीए के भीतर मोलभाव करने यानी प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा है. जब भी कोई क्षेत्रीय पार्टी दूसरे राज्य में चुनाव लड़ने की बात करती है, तो उसका एक मकसद गठबंधन के भीतर अपनी सौदेबाजी यानी बारगेनिंग पावर को मजबूत करना होता है. जेडीयू जानती है कि अगर वे यूपी में अपनी थोड़ी बहुत भी मौजूदगी दिखा देते हैं तो बिहार या राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पूछ और ताकत बढ़ जाएगी.

यूपी में जेडीयू का रिकॉर्ड बहुत ज्यादा शानदार नहीं  

लेकिन अगर इतिहास पर नजर डालें तो यूपी में जेडीयू का रिकॉर्ड बहुत ज्यादा शानदार नहीं रहा है. साल 2002 में समता पार्टी के दौर में 2 सीटें और साल 2007 में बीजेपी के साथ मिलकर 1 सीट जीतने वाली जेडीयू उसके बाद पूरी तरह संघर्ष करती नजर आई. साल 2012 और 2022 में जब पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ा, तो उसे एक भी सीट नसीब नहीं हुई और साल 2022 में तो पार्टी का वोट शेयर गिरकर मात्र 0.11 फीसदी पर सिमट गया था. ऐसे में बिना किसी मजबूत जमीनी कैडर और बूथ स्तर के ढांचे के अचानक मैदान में कूदना कितना सही है, यह तो वक्त ही बताएगा.

इस बार कहानी में मसालेदार ट्विस्ट  

इस बार कहानी में एक बहुत बड़ा और मसालेदार ट्विस्ट है. इस बार जेडीयू ने अपने किसी पुराने मंजे हुए खिलाड़ी को नहीं बल्कि खुद नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को मैदान में उतारने का दांव चला है. निशांत कुमार की इस सियासी लॉन्चिंग ने राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है. हर कोई यही चर्चा कर रहा है कि क्या निशांत कुमार वो करिश्मा दिखा पाएंगे जो उनके पिता दो दशकों में नहीं कर सके.

निशांत कुमार की लॉन्चिंग और जेडीयू का मास्टरप्लान  

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की पार्टी एनडीए का एक बहुत मजबूत और अहम हिस्सा है. लेकिन जब कोई पार्टी अपने राज्य की सीमा लांघकर दूसरे राज्यों खासकर यूपी जैसे बड़े सियासी अखाड़े में पैर पसारने की कोशिश करती है, तो उसके कई मतलब निकाले जाते हैं. इस बार जेडीयू ने पूरी रणनीति के तहत यूपी चुनाव की कमान निशांत कुमार के हाथों में सौंप दी है. इसे साफ तौर पर निशांत कुमार की नेशनल लेवल पर लॉन्चिंग और उनके सियासी पदार्पण के रूप में देखा जा रहा है.

निशांत क्या चाहते हैं?  

पार्टी यह चाहती है कि निशांत को सीधे एक बड़े राज्य के रण में उतारकर उनके नेतृत्व को परखा जाए और उन्हें पार्टी के नए युवा चेहरे के रूप में स्थापित किया जाए. निशांत कुमार ने खुद यह बात साफ कर दी है कि यूपी में हमारी इच्छा एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की है, जिसके लिए हमारे बड़े नेता बीजेपी के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं. लेकिन राजनीति में हर चीज इतनी आसान कहां होती है. अगर बीजेपी के साथ सीट शेयरिंग पर बात नहीं बनी तो जेडीयू ने साफ कर दिया है कि वे अकेले भी मैदान में उतर सकते हैं. ठीक वैसा ही जैसा उन्होंने साल 2022 में भी किया था.

बीजेपी के लिए नफा या नुकसान?  

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर जेडीयू यूपी के चुनावी मैदान में पूरी ताकत से उतरती है, तो इसका सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ेगा और क्या इससे बीजेपी की मुश्किलें बढ़ेंगी. इसका सीधा असर एनडीए के समीकरणों पर पड़ सकता है. यूपी में जेडीयू की नजर सीधे तौर पर कुर्मी और पिछड़े वोट बैंक पर है, जो कि फिलहाल बीजेपी का एक बहुत बड़ा और मजबूत पारंपरिक वोटर माना जाता है. उत्तर प्रदेश में कुर्मी समाज का सबसे बड़ा एनडीए चेहरा इस वक्त अनुप्रिया पटेल यानी अपना दल-सोनेलाल हैं. अगर जेडीयू मैदान में उतरती है, तो कुर्मी समाज के नेतृत्व के लिए एक और बड़ा दावेदार खड़ा हो जाएगा. जिससे अपना दल के जनाधार में सेंध लगना तय है. इसके अलावा, बीजेपी के सामने पहले से ही अपना दल, निषाद पार्टी और ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा जैसे मजबूत सहयोगी हैं. ऐसे में अगर जेडीयू एनडीए के तहत सीटों की मांग करती है, तो बीजेपी के लिए अपने सभी पुराने और नए साथियों के बीच सीटों का सही बंटवारा करना किसी सिरदर्द से कम नहीं होगा.

कुर्मी वोटों का बिखराव और सपा की मौज!  

उत्तर प्रदेश का चुनावी पैटर्न थोड़ा अलग किस्म का है. यहां कुर्मी वोटर किसी एक राजनीतिक पार्टी के साथ पूरी तरह सेफ नहीं बंधा हुआ है. अगर आप साल 2024 के लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनावों के आंकड़ों को देखें, तो कुर्मी समुदाय का वोट बीजेपी, अपना दल, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच बंटा हुआ नजर आता है. यही वजह है कि आज यूपी में इन सभी प्रमुख दलों के पास अपने-अपने कुर्मी विधायक मौजूद हैं. साल 2024 की बात करें तो, चुनाव में कुर्मी समाज का एक बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी की तरफ शिफ्ट हुआ था. ऐसे में अगर जेडीयू भी अलग से मैदान में कूद पड़ती है और कुर्मी वोटों को अपने पाले में खींचने की कोशिश करती है, तो वोटों का बिखराव और ज्यादा बढ़ जाएगा. अगर जेडीयू को एनडीए में सीटें नहीं मिलती हैं और वे अकेले 20 से 30 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार देते हैं, तो वे सीधे तौर पर एनडीए के ही वोट काटेंगे. इतिहास गवाह है कि साल 2012 और 2022 में भी ऐसा ही हुआ था, जिसका सीधा और बड़ा फायदा विपक्षी दलों खासकर समाजवादी पार्टी को मिला था.

क्या निशांत कुमार बदल पाएंगे पुराना इतिहास?  

अब निगाहें पूरी तरह से इस बात पर टिकी हैं कि क्या निशांत कुमार अपने पिता नीतीश कुमार के उस अधूरे सियासी सपने को पूरा कर पाएंगे जिसे वे पिछले दो दशकों में भी जमीन पर नहीं उतार सके. यूपी की राजनीति में बिना किसी मजबूत लोकल ऑर्गेनाइजेशन और जमीन पर काम करने वाले नेताओं के चुनाव जीतना आसान नहीं होता है. पूरी बाजी इस बात पर निर्भर करेगी कि बीजेपी उन्हें अपने साथ एनडीए मेंसम्मानजनक सीटें देती है या फिर जेडीयू को एक बार फिर अकेले ही अपनी किस्मत आजमानी पड़ती है.

यह भी पढ़ें : 200 पर कांग्रेस, 70 पर सपा और 60 पर पल्लवी पटेल का दावा: यूपी में कैसे सुलझेगा सीटों का महापेच?
 

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About the Author

गुणातीत ओझा ज़ी न्यूज डिजिटल में एसोसिएट न्यूज एडिटर हैं. वर्तमान में ज़ी न्यूज डिजिटल के उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड डिजिटल को लीड कर रहे हैं. वह दिसंबर 2021 में ज़ी न्यूज से जुड़े. देश-दुनिया और राजनीतिक खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं. 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. इससे पहले एनडीटीवी डिजिटल, लाइव हिन्दुस्तान डिजिटल, लोकमत डिजिटल, जागरण डॉट कॉम, राजस्थान पत्रिका डिजिटल, हिन्दुस्तान अखबार, दैनिक जागरण अखबार के साथ भी काम कर चुके हैं.
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