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Ayodhya Assembly Seat History: यूपी विधानसभा चुनाव जैसे जैसे नजदीक आ रहा है. सियासी सरगर्मियां तेज हो रही हैं. यूपी की 403 सीटों में से यदि किसी एक सीट पर सबकी निगाहें आ टिकी हैं तो वह अयोध्या विधानसभा सीट है. वजह प्रदेश के दो शीर्ष नेताओं के बीच शुरू हुआ सियासी टकराव. इस हाई-प्रोफाइल सीट का इतिहास भी दिलचस्प है. सपा और बीजेपी में अगर मुकाबला हुआ तो कौन पड़ेगा भारी?...
कैसे अचानक चर्चा में आ गई अयोध्या सीट?
दरअसल, पिछले दिनों अयोध्या के पूर्व विधायक व मंत्री पवन पांडेय के यहां आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पहुंचे थे. उन्होंने पवन पांडेय को अयोध्या सीट का उम्मीदवार घोषित किया. इस दौरान अखिलेश ने दावा किया कि अयोध्या सीट पर बीजेपी को कैंडिडेट नहीं मिल पा रहा है. इतना ही नहीं अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने को चैलेंज किया.
सीएम योगी ने दिया करारा जवाब
अखिलेश यादव के बयान के बाद का योगी आदित्यनाथ ने करारा जवाब दिया. शनिवार को बलरामपुर पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश को अयोध्या से नामांकन करने को कहा. उन्होंने कहा कि आइए नामांकन करिए एक बार मैं भी किस्मत आजमा लेता हूं. मुख्यमंत्री योगी के इस चैलेंस के बाद यूपी में सियासी हलचल मच गई. राजनीति की थोड़ी भी समझ रखने वालों में ये जिज्ञासा हो गई कि अगर अयोध्या से सीएम योगी और अखिलेश यादव का मुकाबला होता है तो किसका पलरा भारी पड़ेगा?. आइए जानते हैं अयोध्या सीट का इतिहास क्या कहता है.
अयोध्या सीट का इतिहास
अयोध्या विधानसभा सीट का गठन 1967 में हुआ. पहला चुनाव भी 1967 में ही हुआ था. इसमें बी. किशोर भारतीय जनसंघ के टिकट पर पहले विधायक चुने गए. इसके बाद 1969 में कांग्रेस के विश्वनाथ कपूर विधायक बने. 1974 में बेद प्रकाश अग्रवाल भारतीय जनसंघ से विधायक चुने गए. 1977 में जयशंकर पांडे जनता पार्टी के टिकट से चुनाव लड़े और जीत दर्ज की. इसके बाद दो बार यह सीट कांग्रेस के खाते में चली गई. 1980 में कांग्रेस के निर्मल कुमार और 1985 में सुरेंद्र प्रताप सिंह एमएलए बने. 1989 में जयशंकर पांडे जनता दल से विधायक बने.
बीजेपी का रहा है दबदबा
इसके बाद अयोध्या सीट पर बीजेपा का दबदबा कायम रहा. 1991 से 2007 तक लगातार पांच बार बीजेपी के लल्लू सिंह विधायक बने. 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा इस सीट पर सेंध लगाने में कामयाब रही. 2012 में सपा के टिकट से तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय विधायक बने. हालांकि, 2017 में यह सीट फिर से बीजेपी के खाते में चली गई. और वेद प्रकाश गुप्ता भाजपा से विधायक बने. 2022 में भी वेद प्रकाश गुप्ता भाजपा से विधायक चुने गए.

राम मंदिर के बाद बदला सियासी महत्व
अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होने के बाद इस सीट का महत्व भी बढ़ गया. यह सीट राजनीतिक संदेश देने वाला केंद्र बन चुकी है. अयोध्या का चुनाव स्थानीय मुद्दों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजनीति को दिशा देने की क्षमता रखता है. हालांकि, पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अपेक्षित परिणाम नहीं मिला. लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी ने तैयारियां शुरू कर दी हैं
अयोध्या सीट पर जातीय समीकरण
अयोध्या में सबसे ज्यादा ओबीसी वोटर हैं. इसमें कुर्मियों और यादवों की संख्या सबसे ज्यादा है. ओबीसी 22 फीसदी हैं. वहीं, दलित वोटर भी चुनाव की दशा बदलने का दम रखते हैं. यहां दलित वोटर की संख्या 21 फीसदी है. इसमें पासी बिरादरी सबसे ज्यादा हैं. मुस्लिम वोटर की बात करें तो इनकी संख्या 18 फीसदी है. 2022 के चुनाव में बीजेपी के वेद प्रकाश गुप्ता को 1,13,414 वोट मिले थे, सपा के पवन पांडेय को 93,424 वोट मिले थे. बसपा के रवि प्रकाश को 17,706 वोटों मिले. जीत हार का अंतर 19990 वोटों का था, जो 2017 के मुकाबले कम था.

क्या अयोध्या में योगी बनाम अखिलेश होगा?
ताजा बयानबाजी से लग रहा है कि अयोध्या में अखिलेश बनाम योगी मुकाबला होगा. हालांकि, इसे अभी संभावित मुकाबले के तौर पर ही देखा जा सकता है. न कि दोनों की उम्मीदवारी की पुष्टि के रूप में. बहुत कम ही मौके होते हैं जब दो बड़े नेता चुनावी मैदान में आमने सामने होते हैं.
वाराणसी में मोदी बनाम केजरीवाल
2014 में देशभर में मोदी की लहर थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, उस समय आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ वाराणसी सीट से चुनाव मैदान में उतर गए थे. प्रधानमंत्री मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव में 5,81,022 वोट मिले थे. वहीं, अरविंद केजरीवाल को 2,09,238 वोट मिले थे. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय राय भी चुनाव मैदान में थे, उन्हें 75,614 मिले थे.