)
त्योहारों की रौनक मिट्टी के बिना अधूरी है, और दीयों की रोशनी से जगमगाते घरों के पीछे उन कुम्हारों की असल जिंदगी संघर्षों के साये में बीत रही है, जिनके हाथों में यह हुनर पलता है. अमेठी में कुम्हारी कला आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है. मिट्टी की भारी किल्लत, बढ़ती उत्पादन लागत और उसके मुकाबले कम मुनाफे ने पुश्तैनी कारीगरों की कमर तोड़ दी है.
आलम यह है कि नई पीढ़ी इस कारोबार से मुंह मोड़ रही है और कई परिवार रोजगार की तलाश में पलायन करने को मजबूर हो गए हैं.
पुश्तैनी धंधे से दूरी बना रहे परिवार
अमेठी के गांवों में कभी कुम्हारों के चाक की गूंज आम हुआ करती थी. घरों में दीये, कुल्हड़, घड़े, सुराही और करवाचौथ के करवे तैयार होते थे. यही पुश्तैनी हुनर हजारों परिवारों की आजीविका का आधार था, लेकिन बदलते समय के साथ मिट्टी के बर्तनों की मांग और कारोबार दोनों प्रभावित हुए हैं. अब कई गांवों में गिने-चुने परिवार ही इस काम से जुड़े रह गए हैं. कोई दूसरे कारोबार में चला गया तो किसी ने रोजगार की तलाश में पलायन कर लिया.
मिट्टी के दाम आसमान पर
कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्ची मिट्टी की उपलब्धता है. पहले तालाबों से आसानी से मिट्टी मिल जाती थी, लेकिन अब इसके लिए भी पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं. जो मिट्टी पहले करीब 200 रुपये प्रति ट्रॉली मिलती थी, उसके लिए अब 500 से 800 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं. इसके अलावा बर्तनों को पकाने के लिए लकड़ी और उपलों पर भी खर्च करना पड़ता है. लागत बढ़ रही है, लेकिन तैयार बर्तनों की कीमत में उसके मुताबिक इजाफा नहीं हो रहा.
आर्थिक स्थिति सुधारना मुश्किल
कमाई की तस्वीर और भी परेशान करने वाली है. हीरालाल जैसे कारीगर बाजार में दुकान लगाकर नहीं, बल्कि गांव-गांव घूमकर अपने बर्तन बेचते हैं. कई बार त्योहारों पर नकद पैसे की जगह गेहूं और चावल मिलते हैं. कारीगर राजेश प्रजापति बताते हैं कि परिवार के सभी सदस्य दिनभर मेहनत करते हैं, लेकिन एक बर्तन पर एक से चार रुपये तक ही बच पाते हैं. यानी पुश्तैनी हुनर तो है, लेकिन इससे परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना मुश्किल हो रहा है.
यह भी पढ़िए: दीपोत्सव में इकबाल अंसारी: प्रभु राम के आगमन की बड़ी तैयारी, अयोध्या में सजेगा कौमी एकता का महाकुंभ
इलेक्ट्रिक चाक का क्यों नहीं हो पाया इस्तेमाल?
सरकार ने कुम्हारी कला को बढ़ावा देने के लिए इलेक्ट्रिक चाक वितरण की योजना चलाई. उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के माटीकला बोर्ड की ओर से वर्ष 2019-20 से 2025-26 तक अमेठी में 145 इलेक्ट्रिक चाक मुफ्त में बांटे गए, लेकिन कई कारीगरों का कहना है कि बिजली की समस्या और तकनीकी खराबी के चलते इन चाकों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है. ऐसे में आज भी बड़ी संख्या में कारीगर हाथ से चलने वाले पारंपरिक चाक पर ही निर्भर हैं.
मामले पर क्या बोले जिलाधिकारी?
हालांकि, कुम्हारों की समस्याओं को लेकर जिला प्रशासन की ओर से भूमि आवंटन और बाजार उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं. प्रशासन के मुताबिक, अमेठी में कुम्हारी कला से जुड़े 910 टोले हैं, जिनमें 824 परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हैं. जिलाधिकारी शशांक चौधरी के अनुसार, मिट्टी उपलब्ध कराने के लिए प्राप्त सभी 824 आवेदनों को स्वीकृत करते हुए पट्टे आवंटित किए जा चुके हैं. वहीं वित्तीय वर्ष 2026-27 में अब तक 0.2560 हेक्टेयर भूमि का आवंटन भी किया गया है.
गांवों की पहचान रहा कुम्हारों का चाक
सवाल यह है कि क्या सिर्फ इलेक्ट्रिक चाक और जमीन का पट्टा मिलने से कुम्हारी कला को बचाया जा सकता है? कारीगरों को नियमित रूप से मिट्टी मिले, कार्यस्थल पर बिजली की सुविधा हो और उनके उत्पादों को उचित बाजार व कीमत मिले, तभी यह पुश्तैनी कारोबार आगे बढ़ सकेगा वरना कभी गांवों की पहचान रहा कुम्हारों का चाक आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ याद बनकर रह जाएगा.
(अमेठी से राहुल शुक्ला की रिपोर्ट)