नॉर्वे में ड्राइविंग लाइसेंस लेना इतना मुश्किल क्यों? भारतीय ने बताया 2 साल का सफर, 6 लाख खर्च... जानें भारत में कैसे बनता है लाइसेंस?
भारत में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना आमतौर पर एक सामान्य सरकारी प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन नॉर्वे में लाइसेंस पाने के लिए ट्रेनिंग, थ्योरी, सेफ्टी कोर्स और फाइनल ड्राइविंग टेस्ट का लंबा सफर तय करना पड़ता है. भारतीय शख्स विनोद ने अपना अनुभव शेयर करते हुए बताया कि उन्हें लाइसेंस हासिल करने में करीब दो साल लगे और लगभग 6 लाख रुपये खर्च हुए. इसी अनुभव से भारत और नॉर्वे के ड्राइविंग सिस्टम का फर्क समझ आता है.
भारत से नॉर्वे जाने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए वहां की सड़कें और मौसम पहली नजर में ही अलग अनुभव दे सकते हैं. बर्फीली सड़कें, पहाड़ी रास्ते, लंबी सुरंगें और बदलता मौसम ड्राइविंग को सिर्फ स्टीयरिंग घुमाने का काम नहीं रहने देते.
भारतीय शख्स विनोद साल 2011 में नॉर्वे पहुंचे थे. वहां रहने के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि रोजमर्रा की जिंदगी में कार चलाना सीखना काफी जरूरी है. उन्होंने शुरुआत में पड़ोसी की मदद से ड्राइविंग सीखी, लेकिन जल्द ही समझ आ गया कि नॉर्वे में सिर्फ कार चलाना आ जाना लाइसेंस पाने के लिए काफी नहीं है.
पहले सीखना, फिर खुद को साबित करना
नॉर्वे में कार के लिए कैटेगरी B लाइसेंस हासिल करने की प्रक्रिया कई स्टेप्स में बंटी हुई है. आधिकारिक नियमों के मुताबिक शुरुआत बेसिक ट्रैफिक कोर्स से होती है. यह कोर्स 17 घंटे का होता है और इसमें क्लासरूम के साथ प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी शामिल होती है. 25 साल से ज्यादा उम्र वालों को पूरे बेसिक कोर्स से छूट मिलती है, लेकिन नाइट ड्राइविंग और फर्स्ट एड जैसी ट्रेनिंग जरूरी रहती है. इसके बाद ड्राइविंग की प्रैक्टिस धीरे-धीरे आगे बढ़ती है. यहां मकसद सिर्फ गाड़ी चलाना नहीं, बल्कि अलग-अलग ट्रैफिक स्थितियों में सही फैसला लेना सीखना है.
बर्फ से लेकर हाईवे तक, हर जगह की तैयारी
विनोद के अनुभव में सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि नॉर्वे की ड्राइविंग भारत जैसी नहीं है. वहां मौसम और सड़क की स्थिति के हिसाब से ड्राइविंग का तरीका बदलना पड़ता है. आधिकारिक ट्रेनिंग में अलग-अलग तरह के ट्रैफिक, ओवरटेकिंग, सड़क पर दूसरे लोगों के साथ सुरक्षित तरीके से चलना और दुर्घटना का जोखिम कम करना शामिल है. ट्रेनिंग के दौरान सेफ्टी ड्राइविंग रेंज का अनिवार्य कोर्स भी होता है, जो चार घंटे का है. इसके बाद अंतिम चरण में सड़क पर 13 घंटे की सेफ्टी ट्रेनिंग होती है. इसका मतलब लाइसेंस मिलने से पहले सिस्टम यह देखना चाहता है कि ड्राइवर सिर्फ कार संभाल सकता है या मुश्किल हालात में भी सही फैसला ले सकता है.
सिर्फ क्लास नहीं, हजारों किलोमीटर की प्रैक्टिस
नॉर्वे के सिस्टम की एक खास बात यह है कि अनिवार्य ट्रेनिंग पूरी हो जाने के बाद भी प्रैक्टिस पर काफी जोर दिया जाता है. सरकारी गाइडलाइन के मुताबिक फाइनल टेस्ट से पहले कई हजार किलोमीटर तक ड्राइविंग की प्रैक्टिस करना सही माना जाता है. कितनी प्रैक्टिस चाहिए, यह हर व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर करता है. यहीं पर खर्च भी बढ़ता जाता है. ड्राइविंग स्कूल आमतौर पर घंटे के हिसाब से फीस लेते हैं. विनोद ने अपने अनुभव में बताया कि पूरी प्रक्रिया में उन्हें करीब दो साल लगे और उस समय लगभग 6 लाख रुपये खर्च हुए. यह उनकी व्यक्तिगत लागत है, इसलिए इसे नॉर्वे में हर व्यक्ति के लिए तय खर्च नहीं माना जा सकता.
पहली कोशिश में फेल हुए, फिर दो महीने और मेहनत
विनोद का सफर भी पहली कोशिश में पूरा नहीं हुआ. उन्होंने फाइनल ड्राइविंग टेस्ट दिया, लेकिन पहली बार सफल नहीं हो सके. इसके बाद उन्होंने करीब दो महीने और प्रैक्टिस की और दोबारा टेस्ट दिया. नॉर्वे में फाइनल प्रैक्टिकल टेस्ट भी सिर्फ सड़क पर कुछ मिनट कार चलाने तक सीमित नहीं है. आधिकारिक जानकारी के मुताबिक टेस्ट 55 से 75 मिनट तक चल सकता है. इसमें गाड़ी की तैयारी, सेफ्टी चेक और वास्तविक ट्रैफिक में ड्राइविंग शामिल होती है. ड्राइवर को दिए गए टास्क खुद पूरे करने होते हैं.
थ्योरी टेस्ट भी आसान नहीं
प्रैक्टिकल टेस्ट से पहले थ्योरी टेस्ट पास करना जरूरी है. इसके लिए पहले ड्राइविंग लाइसेंस का आवेदन करना पड़ता है और जरूरी ट्रेनिंग पूरी होनी चाहिए. नॉर्वे के नियमों में थ्योरी टेस्ट पास करने के लिए 85 फीसदी सवालों का सही जवाब देना जरूरी है. अगर कोई उम्मीदवार टेस्ट में फेल हो जाता है तो दोबारा टेस्ट देने से पहले इंतजार करना पड़ता है. मतलब वहां लाइसेंस की पूरी प्रक्रिया का फोकस इस बात पर है कि ड्राइवर सड़क पर खुद के साथ-साथ दूसरे लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी समझता है.
अब समझिए भारत में कैसे बनता है Driving Licence
भारत में ड्राइविंग लाइसेंस की प्रक्रिया नॉर्वे के मुकाबले काफी अलग और आम तौर पर ज्यादा सीधी है. सबसे पहले आवेदक को लर्नर लाइसेंस के लिए आवेदन करना होता है. इसके लिए सरकार के सारथी पोर्टल पर जाकर संबंधित राज्य चुनना होता है और लर्नर लाइसेंस का आवेदन भरना होता है. राज्य के हिसाब से आगे की प्रक्रिया में कुछ अंतर हो सकता है. लर्नर लाइसेंस के लिए ट्रैफिक नियमों और सड़क सुरक्षा से जुड़ा टेस्ट भी होता है. कुछ राज्यों में यह ऑनलाइन भी उपलब्ध है.
लर्नर लाइसेंस के बाद कितने दिन में Permanent Licence?
लर्नर लाइसेंस मिलने के बाद तुरंत स्थायी लाइसेंस नहीं मिलता. उदाहरण के तौर पर दिल्ली ट्रांसपोर्ट विभाग के मुताबिक लर्नर लाइसेंस की वैधता छह महीने तक होती है और स्थायी लाइसेंस के लिए कम से कम 30 दिन बाद आवेदन किया जा सकता है. आवेदन छह महीने की अवधि के भीतर करना होता है. इसके बाद आवेदक को ड्राइविंग टेस्ट देना होता है. टेस्ट में यह देखा जाता है कि वह वाहन को सही तरीके से चला पा रहा है या नहीं और ट्रैफिक नियमों का पालन कर रहा है या नहीं.
भारत में आवेदन कैसे करें?
परमानेंट ड्राइविंग लाइसेंस के लिए सारथी पोर्टल पर 'New Driving Licence' ऑप्शन चुनना होता है. इसके बाद लर्नर लाइसेंस नंबर और जन्मतिथि के जरिए आवेदन आगे बढ़ाया जाता है. फॉर्म भरने के बाद तय तारीख पर जरूरी दस्तावेज और फीस से जुड़ी जानकारी के साथ संबंधित कार्यालय जाना पड़ सकता है. मतलब भारत में भी लाइसेंस सिर्फ कागज जमा करके नहीं मिलना चाहिए. लर्नर लाइसेंस, नियमों की जानकारी और आखिर में ड्राइविंग टेस्ट इसकी अहम कड़ियां हैं. हालांकि, राज्य के हिसाब से प्रक्रिया और कुछ जरूरी शर्तें अलग हो सकती हैं.
असली फर्क आखिर है क्या?
विनोद के अनुभव से नॉर्वे और भारत के सिस्टम में एक बड़ा फर्क नजर आता है. भारत में प्रक्रिया अपेक्षाकृत छोटी और आसान हो सकती है, जबकि नॉर्वे में ट्रेनिंग और सेफ्टी पर ज्यादा जोर दिया जाता है. विनोद का कहना है कि नॉर्वे में ड्राइविंग टेस्ट का मकसद सिर्फ यह देखना नहीं है कि व्यक्ति कार चला सकता है या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या वह सड़क पर दूसरे लोगों की जिंदगी को खतरे में डाले बिना जिम्मेदारी से गाड़ी चला सकता है.
लाइसेंस सिर्फ कार्ड नहीं, जिम्मेदारी भी है
विनोद की कहानी भले ही नॉर्वे की ड्राइविंग व्यवस्था से जुड़ी हो, लेकिन इसका सवाल भारत के लिए भी अहम है. लाइसेंस हाथ में आ जाना ड्राइविंग सीखने का आखिरी पड़ाव नहीं होना चाहिए. सड़क पर हर दिन हजारों लोग एक-दूसरे के भरोसे चलते हैं. ऐसे में बेहतर ड्राइविंग सिर्फ कार कंट्रोल करने से नहीं आती, बल्कि खतरे को पहले पहचानने, सही फैसला लेने और दूसरे इंसान की जिंदगी की कीमत समझने से आती है. शायद यही वजह है कि नॉर्वे का सख्त सिस्टम लोगों को ज्यादा ट्रेनिंग और ज्यादा जिम्मेदारी के साथ सड़क पर उतारने की कोशिश करता है.