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मुंबई के भांडुप इलाके में रहने वाले शक्ति यादव ने बचपन से ही अपने आसपास प्लास्टिक कचरे का असर देखा था. वह जिस इलाके में बड़े हुए, वहां बारिश का मौसम आते ही लोगों की मुश्किलें बढ़ जाती थीं. नालियां कचरे से भर जाती थीं और गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता था. लोगों को उसी पानी से होकर गुजरना पड़ता था.
प्लास्टिक की बोतलें और दूसरी बेकार चीजें नालियों में फंस जाती थीं. इससे पानी निकलने का रास्ता बंद हो जाता था. गंदगी के बीच रहने वाले लोगों को डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का डर भी सताता था. बचपन में देखे ये हालात शक्ति के मन में रह गए.
शक्ति पढ़ाई में आगे बढ़े और MBA की डिग्री हासिल की. वह अपने परिवार के पहले ऐसे सदस्य बने, जिन्होंने हायर एजुकेशन तक पढ़ाई की. उनके पास मौका था कि वह किसी बड़ी कंपनी में नौकरी करें और एक अच्छी कॉर्पोरेट जिंदगी बिताएं. शुरुआत में उन्होंने नौकरी भी की, लेकिन अपने आसपास की समस्याएं उन्हें लगातार परेशान करती रहीं. उन्हें लगता था कि जिस इलाके में उनका बचपन बीता, वहां के लोगों के लिए कुछ करना चाहिए. इसी सोच के साथ उन्होंने एक ऐसा आइडिया तलाशना शुरू किया, जिससे कचरे की समस्या भी कम हो और जरूरतमंद लोगों को खाना भी मिल सके.
शक्ति यादव ने 'बाय फूड विद प्लास्टिक' नाम से एक पहल शुरू की. इस आइडिया के पीछे सोच काफी सीधी है. अगर कोई व्यक्ति 20 इस्तेमाल की हुई प्लास्टिक बोतलें लेकर आता है तो उसे बदले में एक ताजा और पौष्टिक खाना दिया जाता है. यह पहल मुंबई के भांडुप इलाके में शुरू की गई. शक्ति ने साल 2020 में इस पर काम करना शुरू किया था. उस समय वह अपनी नौकरी के साथ इस प्रोजेक्ट को भी आगे बढ़ा रहे थे. धीरे-धीरे उन्हें लगा कि इस काम को ज्यादा समय देने की जरूरत है. अंत में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपना पूरा ध्यान इसी पहल पर लगा दिया.
शक्ति के लिए इस पहल का मकसद केवल लोगों को खाना खिलाना नहीं है. वह चाहते हैं कि जरूरतमंद लोगों को मदद लेते समय किसी तरह की शर्मिंदगी महसूस न हो. इसलिए यहां खाना मुफ्त बांटने के बजाय बोतलों के बदले दिया जाता है. इस तरीके में लोग खुद भी अपनी तरफ से योगदान करते हैं. वे अपने घर, आसपास की गलियों और दूसरी जगहों से प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठा करके लाते हैं. बदले में उन्हें खाना मिलता है. इससे लोगों को भोजन भी मिल जाता है और आसपास फैला प्लास्टिक कचरा भी कम होता है.
इस पहल में इकट्ठा की गई बोतलों को सीधे फेंक नहीं दिया जाता. उन्हें रीसाइक्लिंग के लिए भेजा जाता है, जहां प्लास्टिक को दोबारा इस्तेमाल करने लायक बनाया जाता है. इससे फूलदान और कोस्टर जैसी चीजें तैयार की जाती हैं. इन सामानों को कंपनियों और दूसरे खरीदारों को बेचा जाता है. कुछ खरीदार विदेशों में भी हैं. इस तरह सड़क या नाली में पड़ी एक बेकार बोतल एक नए प्रोडक्ट का हिस्सा बन जाती है. इस काम में स्थानीय लोगों को भी जोड़ा जाता है. उन्हें प्लास्टिक इकट्ठा करने और उसे संभालने जैसे कामों में मौका मिलता है. यानी यह पहल सिर्फ कचरा हटाने और खाना देने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों के लिए कमाई के रास्ते भी तैयार कर रही है.
शक्ति के इस फैसले से उनका परिवार शुरुआत में पूरी तरह सहमत नहीं था. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उनकी मां को चिंता थी कि सामाजिक काम में लगकर वह अपना करियर कैसे बनाएंगे. उन्हें लगता था कि ऐसे कामों में वही लोग उतर सकते हैं, जिनके पास पहले से आर्थिक सुरक्षा हो. लेकिन शक्ति अपने फैसले पर टिके रहे. जैसे-जैसे उनकी पहल का असर दिखने लगा, परिवार को भी समझ आने लगा कि वह किस दिशा में काम कर रहे हैं. उनके लिए यह सिर्फ एक बिजनेस आइडिया नहीं, बल्कि बचपन में देखी परेशानियों को कम करने की कोशिश थी.
शक्ति और उनकी टीम का मानना है कि प्लास्टिक कचरे की समस्या को कम करने के लिए बच्चों को शुरुआत से ही जागरूक करना जरूरी है. इसी मकसद से टीम स्कूलों और रिहायशी सोसायटियों में जाकर लोगों को रीसाइक्लिंग और कचरे को सही तरीके से फेंकने के बारे में बताती है. कुछ स्कूलों में प्लास्टिक जमा करने के लिए खास जगह भी बनाई गई है. बच्चे अपने घरों से इस्तेमाल की हुई बोतलें लाकर वहां जमा करते हैं. बाद में इस प्लास्टिक को रीसाइक्लिंग के लिए भेज दिया जाता है. इससे बच्चों को सिर्फ किताबों में पर्यावरण के बारे में पढ़ने के बजाय अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में भी उसका महत्व समझने का मौका मिलता है.
TOI की रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, इस पहल के जरिए अब तक 42 हजार से ज्यादा लोगों को खाना दिया जा चुका है. करीब 4,500 लोगों को इसका फायदा मिला है, जबकि 1,000 से अधिक बच्चों को पर्यावरण और रीसाइक्लिंग के बारे में जागरूक किया गया है. शक्ति के काम को भारत के बाहर भी पहचान मिली है. वह सस्टेनेबिलिटी और क्लाइमेट चेंज से जुड़े रिसर्च के लिए जर्मनी गए थे. उन्हें साल 2023 में क्रॉस-कल्चरल प्रोग्राम फेलोशिप भी मिली.
फिलहाल यह पहल मुंबई के कुछ इलाकों में काम कर रही है, लेकिन शक्ति इसे शहर के दूसरे हिस्सों तक ले जाना चाहते हैं. 'बाय फूड विद प्लास्टिक' जैसी पहल निकारागुआ और घाना जैसे देशों में भी अलग-अलग तरीके से चलाई जा रही है. वहां भी प्लास्टिक कचरे के बदले लोगों को खाना देने और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने पर काम हो रहा है. भारत में भी कई जगह इस तरह के प्रयोग किए गए हैं. छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में 'गार्बेज कैफे' के जरिए प्लास्टिक कचरा देने पर खाना मिलता है. पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी और कर्नाटक के मैसूर में भी प्लास्टिक के बदले भोजन देने जैसी पहल सामने आ चुकी हैं.