न बिजली का तार, न मोबाइल की घंटी... 5 हजार साल पुरानी जिंदगी जी रहा ये गांव! वीडियो देख हैरान रह जाएंगे आप
आज जब मोबाइल, इंटरनेट, 5G और AI हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं, तब आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में एक ऐसी बस्ती की कहानी सामने आई है, जहां जिंदगी का तरीका बिल्कुल अलग बताया जा रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल जानकारी के अनुसार, कुर्मा ग्रामम में 17 परिवार बिना बिजली, स्मार्टफोन और गैस के जीवन जी रहे हैं.
आज सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हमारी जिंदगी मोबाइल के इर्द-गिर्द घूमती है. अलार्म से दिन शुरू होता है, खबरें फोन पर मिलती हैं और बातचीत भी इंटरनेट के जरिए होती है. लेकिन आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले से सामने आई कुर्मा ग्रामम की कहानी इससे बिल्कुल उलट है.
बताया जाता है कि एंथकापल्ली की पहाड़ियों और जंगलों के बीच बसी इस जगह पर रहने वाले लोगों ने आधुनिक सुविधाओं से दूरी बनाकर एक अलग तरह की लाइफस्टाइल अपनाई है. यहां बिजली, मोबाइल और इंटरनेट जैसी चीजें रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा नहीं हैं. यही वजह है कि सोशल मीडिया पर इस गांव की चर्चा हो रही है.
सिर्फ 17 परिवार, करीब 60 एकड़ में बसी दुनिया
सोशल मीडिया पर सामने आई जानकारी के मुताबिक, कुर्मा ग्रामम करीब 60 एकड़ में फैला हुआ है और यहां सिर्फ 17 परिवार रहते हैं. संख्या भले ही छोटी हो, लेकिन इन परिवारों की जिंदगी का तरीका इसे बाकी जगहों से अलग बनाता है. शाम होते ही जब ज्यादातर शहरों और गांवों में बल्ब और स्ट्रीट लाइट जलने लगती हैं, यहां रोशनी का इंतजाम पारंपरिक तरीके से किया जाता है. दावा है कि लोग अरंडी के तेल के दीयों का इस्तेमाल करते हैं. यानी रात का अंधेरा यहां बिजली के बल्ब से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे दीयों की रोशनी से दूर होता है.
घर भी मिट्टी, लकड़ी और पत्थरों से
इस गांव की लाइफस्टाइल का एक और हिस्सा इसके घर बताए जाते हैं. वायरल जानकारी के मुताबिक, यहां रहने वाले लोग अपने घर बनाने के लिए मिट्टी, चूना, लकड़ी और पत्थर जैसी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल करते हैं. घरों के फर्श को गोबर से लीपने की परंपरा भी बताई जाती है. गांव में रहने वाले लोगों का मानना है कि इससे घर साफ रखने में मदद मिलती है और आसपास का माहौल भी प्राकृतिक बना रहता है. यहां मॉडर्न सीमेंट-कंक्रीट के मकानों की जगह ऐसे घर दिखाई देते हैं, जो गांव की पारंपरिक पहचान से जुड़े हुए हैं.
गैस सिलेंडर नहीं, मिट्टी के चूल्हे पर खाना
मॉडर्न किचन में गैस चूल्हा, इंडक्शन और माइक्रोवेव आम बात हैं. लेकिन कुर्मा ग्रामम की इस कहानी में खाना पकाने का तरीका भी पुराना बताया गया है. वायरल जानकारी के मुताबिक, यहां महिलाएं मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी जलाकर खाना बनाती हैं. घरों में गैस सिलेंडर का इस्तेमाल नहीं किया जाता. खाना पकाने के दौरान लकड़ी के धुएं और चूल्हे की गर्मी के बीच भोजन तैयार होता है, जो इस बस्ती की पारंपरिक जिंदगी की तस्वीर पेश करता है.
साबुन की जगह प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल
सिर्फ घर और खाना ही नहीं, रोजमर्रा की दूसरी जरूरतों में भी यहां प्राकृतिक चीजों को प्राथमिकता देने का दावा किया जाता है. बताया जाता है कि लोग साबुन और दूसरे केमिकल प्रोडक्ट्स की जगह रीठा जैसी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, इन सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी के आधार पर नहीं हुई है. इसलिए सोशल मीडिया पर बताए गए इन तरीकों को गांव की पूरी तस्वीर मानने के बजाय वायरल दावे के तौर पर देखना जरूरी है.
सुबह साढ़े तीन बजे शुरू हो जाता है दिन
इस गांव की सबसे दिलचस्प बात इसका सुबह का रूटीन बताया जाता है. सोशल मीडिया पर वायरल जानकारी के मुताबिक, यहां लोग सुबह करीब साढ़े तीन बजे उठ जाते हैं. नहाने-धोने के बाद ग्रामीण एक जगह इकट्ठा होते हैं. इसके बाद दीए की रोशनी में भजन, ध्यान और दूसरी आध्यात्मिक गतिविधियां की जाती हैं. जब ज्यादातर लोग उस वक्त गहरी नींद में होते हैं, तब इस बस्ती में दिन की शुरुआत हो चुकी होती है. यह रूटीन आधुनिक जिंदगी की उस आदत से बिल्कुल अलग है, जिसमें लोग अक्सर देर रात तक मोबाइल चलाने के बाद सुबह उठने के लिए अलार्म पर निर्भर रहते हैं.
बच्चों की पढ़ाई भी अलग तरीके से
किसी भी गांव या बस्ती की असली तस्वीर वहां के बच्चों की पढ़ाई से सामने आती है. कुर्मा ग्रामम को लेकर वायरल जानकारी में दावा किया गया है कि यहां बच्चों की शिक्षा के लिए गुरुकुल जैसा माहौल बनाया गया है. बताया जाता है कि बच्चों को वेद, रामायण और भगवद्गीता जैसी पारंपरिक शिक्षाओं के साथ बेसिक अंग्रेजी और गणित भी पढ़ाया जाता है. दावा है कि इस पहल की शुरुआत 2018 में हुई थी और इसका मकसद बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ते हुए शिक्षा देना है.
आखिर क्यों चुनी ऐसी जिंदगी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब दुनिया लगातार नई टेक्नॉलजी और सुविधाओं की तरफ बढ़ रही है, तब कोई खुद इन चीजों से दूरी क्यों बनाएगा? वायरल कहानी के मुताबिक, इस बस्ती के पीछे सोच प्रकृति के करीब रहना और तनाव कम करना है. मोबाइल और इंटरनेट से दूरी, प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल, जल्दी उठना और ध्यान जैसी गतिविधियों को इसी जीवनशैली का हिस्सा बताया गया है. हालांकि, ऐसी जिंदगी हर किसी के लिए आसान नहीं हो सकती. बिजली, इंटरनेट और दूसरी आधुनिक सुविधाएं आज पढ़ाई, इलाज, रोजगार और संपर्क के लिए बेहद जरूरी हो चुकी हैं. इसलिए इस मॉडल को देखकर तुरंत इसे बेहतर या खराब बताने के बजाय यह समझना जरूरी है कि वहां के लोगों ने इसे अपनी जरूरत और सोच के हिसाब से चुना है या नहीं.
5G और AI के दौर में क्यों चर्चा में आया गांव?
कुर्मा ग्रामम की कहानी इसलिए लोगों का ध्यान खींच रही है क्योंकि यह आज की आम जिंदगी से बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाती है. एक तरफ दुनिया 5G, AI और स्मार्ट डिवाइस की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ इस बस्ती की कहानी में दीया, मिट्टी का चूल्हा, प्राकृतिक घर और सुबह का ध्यान नजर आता है. फिलहाल सोशल मीडिया पर वायरल दावों में इस गांव को लेकर कई बातें कही जा रही हैं, लेकिन सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. इसके बावजूद यह कहानी एक सवाल जरूर छोड़ती है. क्या ज्यादा सुविधाएं ही खुश रहने का रास्ता हैं, या कभी-कभी कम चीजों के साथ जीना भी इंसान को सुकून दे सकता है? शायद कुर्मा ग्रामम की वायरल कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है.