यहां खेतों से बरसता है पैसा: महाराष्ट्र के इस गांव में खेती और डेयरी ने बदली किसानों की जिंदगी; कभी पानी के लिए तरसते थे लोग
महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गांव की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. कभी यहां पानी की कमी, गरीबी और बेरोजगारी के चलते लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ता था. लेकिन गांव वालों ने मिलकर हालात बदलने की ठानी. पानी बचाने से लेकर खेती के तरीके बदलने तक, उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जिनका असर आज दिखाई देता है. अब यही गांव खेती और डेयरी के दम पर खुशहाली की मिसाल बन गया है.
महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले में बसा हिवरे बाजार आज अपनी कामयाबी के लिए जाना जाता है. लेकिन कुछ दशक पहले तक यहां की हालत ऐसी नहीं थी कि कोई इसे देखकर खुशहाली का अंदाजा लगा सके. गांव में बारिश कम होती थी. जमीन पथरीली थी और खेती के लिए पानी जुटाना बड़ी चुनौती थी. पीने के पानी तक की परेशानी रहती थी.
खेती से घर चलाना मुश्किल होता, तो कई परिवार रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर चले जाते थे. हालात सिर्फ खेती तक सीमित नहीं थे. गरीबी, बेरोजगारी और आपसी विवाद भी गांव की समस्याओं में शामिल थे. ऐसे में लोगों के सामने सवाल था कि आखिर इस जगह पर जिंदगी को बेहतर कैसे बनाया जाए. अब करोड़पति किसानों वाले इस गांव की कामयाबी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है.
पोपटराव पवार ने बदली गांव की सोच
हिवरे बाजार में बदलाव की कहानी में पोपटराव पवार की भूमिका अहम मानी जाती है. साल 1989 में वह गांव के सरपंच बने. उन्होंने गांव की समस्याओं को समझने के साथ लोगों को उनके समाधान में शामिल करने पर जोर दिया. 26 जनवरी 1990 को हुई ग्राम सभा को इस बदलाव की दिशा में अहम कदम माना जाता है. गांव वालों ने तय किया कि वे अपनी परेशानियों का हल मिलकर निकालेंगे. किसी दूसरे के भरोसे बैठे रहने के बजाय अपने संसाधनों को बचाने और गांव को बेहतर बनाने की कोशिश की जाएगी. यह फैसला सुनने में भले ही आसान लगे, लेकिन इसे जमीन पर उतारने के लिए लोगों को अपनी आदतें बदलनी थीं. सबसे पहले ध्यान पानी पर दिया गया, क्योंकि खेती और गांव की दूसरी जरूरतों का भविष्य इसी से जुड़ा था.
पानी बचाने के लिए बनाए सख्त नियम
हिवरे बाजार में पानी को जितना जरूरी संसाधन माना गया, उतनी ही गंभीरता से उसके इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया गया. गांव में पानी का हिसाब रखने की व्यवस्था अपनाई गई. मतलब, उपलब्ध पानी कितना है और उसका इस्तेमाल कहां किया जाना चाहिए, इस पर सोच-समझकर फैसले लिए जाने लगे. इसके साथ पेड़ों की कटाई रोकने, खुले में पशुओं की चराई पर नियंत्रण लगाने और गांव के विकास के लिए श्रमदान जैसे कदम उठाए गए. लोगों को समझाया गया कि जंगल और जमीन सुरक्षित रहेंगे, तभी बारिश के पानी को रोकना और भूजल स्तर को बेहतर बनाना संभव होगा. गहरे बोरवेल पर रोक और फसल चुनने में सावधानी जैसे फैसलों का मकसद भी पानी की बर्बादी रोकना था. गांव में गन्ने और केले जैसी ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों के बजाय उपलब्ध पानी के हिसाब से खेती करने पर जोर दिया गया.
बंजर जमीन पर फिर लहलहाने लगी खेती
जब पानी को रोकने और जमीन को बचाने की कोशिशों का असर दिखने लगा, तो खेती की तस्वीर भी बदलने लगी. जिन खेतों में पहले पैदावार मुश्किल थी, वहां धीरे-धीरे खेती के बेहतर मौके बनने लगे. आज गांव में अनाज और दूसरी पारंपरिक फसलों के साथ प्याज, अमरूद, संतरा, अंजीर और ड्रैगन फ्रूट जैसी फसलें भी उगाई जाती हैं. किसान अपनी जमीन और वहां मिलने वाले पानी के हिसाब से फसल चुनते हैं. गांव की कामयाबी की वजह केवल महंगी फसलें उगाना नहीं है. असली बदलाव यह है कि पानी को ध्यान में रखकर खेती करने की सोच विकसित हुई. इससे किसानों को अपने संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने का मौका मिला.
डेयरी से भी होती है अच्छी कमाई
खेती के साथ पशुपालन और दूध का कारोबार भी हिवरे बाजार की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन गया है. गांव में डेयरी के जरिए नियमित कमाई का रास्ता तैयार हुआ है. खेती पर मौसम का असर पड़ सकता है. कभी बारिश कम होती है, तो कभी फसल की कीमत उम्मीद के मुताबिक नहीं मिलती. ऐसे समय में दूध बेचकर होने वाली आमदनी परिवारों को सहारा देती है. यही वजह है कि गांव की तरक्की को केवल खेतों की पैदावार से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. खेती और डेयरी को साथ लेकर चलने से ग्रामीण परिवारों के पास कमाई के अलग-अलग साधन बने हैं.
पक्के मकान, बेहतर सुविधाएं और साफ-सफाई
हिवरे बाजार की चर्चा सिर्फ खेती और कमाई के कारण नहीं होती. गांव में साफ-सफाई, शिक्षा और सामुदायिक सुविधाओं पर भी ध्यान दिया गया है. पक्के मकान, सड़कें और सार्वजनिक सुविधाएं गांव की बदली हुई तस्वीर दिखाती हैं. स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई के साथ पर्यावरण और बारिश से जुड़ी जानकारी पर भी जोर दिया जाता है. गांव के विकास में लोगों की भागीदारी को खास महत्व दिया गया है. यही भागीदारी पानी बचाने से लेकर साफ-सफाई तक के कामों में दिखाई देती है. गांव की पहचान इस बात से भी बनी कि यहां विकास को सिर्फ ज्यादा कमाई तक सीमित नहीं रखा गया. संसाधनों को बचाने और अगली पीढ़ी के लिए बेहतर माहौल तैयार करने की कोशिश भी की गई.
प्रति व्यक्ति आय में बड़ा बदलाव
हिवरे बाजार की कामयाबी से जुड़ी रिपोर्टों और वीडियो में गांव की प्रति व्यक्ति सालाना आय करीब नौ लाख रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है. बताया जाता है कि शुरुआती दौर में यहां आमदनी बेहद कम थी और लोगों के सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल था. हालांकि, प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा गांव के हर परिवार की वास्तविक कमाई नहीं बताता. अलग-अलग परिवारों की जमीन, खेती, पशुपालन और दूसरे संसाधनों के हिसाब से उनकी आमदनी में अंतर हो सकता है. फिर भी गांव की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव को उसकी विकास यात्रा का अहम हिस्सा माना जाता है. आज हिवरे बाजार की चर्चा इसलिए होती है, क्योंकि इस गांव ने अपनी परिस्थितियों के हिसाब से रास्ता चुना. इसकी कहानी दूसरे गांवों के लिए भी एक सीख है.