65 लाख का पैकेज, फिर भी खाली जेब: जर्मनी में इंडियन ने बताया टैक्स और किराए का 'रियलिटी चेक', पोस्ट देख चौंके भारतीय
भारत में 65-70 लाख रुपये सालाना सैलरी सुनकर किसी को भी लगेगा कि इतनी कमाई में तो जिंदगी आराम से कट जाएगी. लेकिन यही कमाई अगर जर्मनी में की जा रही हो तो हिसाब काफी अलग हो सकता है. एक भारतीय ने करीब 6 साल जर्मनी में रहने के अपने अनुभव का हवाला देते हुए बताया कि ग्रॉस सैलरी सुनने में बड़ी लगती है, लेकिन टैक्स, सोशल कॉन्ट्रिब्यूशन, किराया, इंश्योरेंस और रोजमर्रा के खर्च के बाद हाथ लगभग खाली रह जाता है.
विदेश में नौकरी और लाखों की सैलरी का सपना भारत में बहुत से युवाओं को आकर्षित करता है. सोशल मीडिया पर जब किसी की कमाई हजारों पाउंड या यूरो में दिखाई देती है तो उसे भारतीय रुपये में बदलकर देखना सबसे आसान लगता है.
मिसाल के तौर पर 70 हजार पाउंड की सालाना सैलरी भारतीय रुपये में करीब 65-70 लाख रुपये के आसपास नजर आ सकती है. लेकिन सिर्फ करेंसी कन्वर्जन देखकर यह समझ लेना कि व्यक्ति के पास हर साल इतने रुपये बचने वाले हैं, सही तस्वीर नहीं देता. असल कहानी तब शुरू होती है जब ग्रॉस सैलरी में से टैक्स और दूसरे जरूरी भुगतान निकलते हैं.
70 हजार पाउंड की पूरी रकम हाथ में नहीं
सोशल मीडिया पर तनुज नाम के एक यूजर की पोस्ट इसी वजह से चर्चा में आई. उन्होंने दावा किया कि वह करीब 6 साल जर्मनी में रह चुके हैं और वहां 70 हजार पाउंड की सालाना सैलरी को भारतीय नजरिए से समझने की कोशिश की. उनके मुताबिक, सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि कंपनी की ओर से बताई गई सैलरी और बैंक अकाउंट में पहुंचने वाली रकम एक जैसी नहीं होती. ग्रॉस सैलरी में से इनकम टैक्स और सोशल कॉन्ट्रिब्यूशन जैसे पेमेंट काटे जाते हैं. इसका मतलब नौकरी का पैकेज देखकर जो रकम बहुत बड़ी दिखाई देती है, उसका पूरा हिस्सा कर्मचारी के खर्च करने के लिए उपलब्ध नहीं होता.
टैक्स के बाद शुरू होता है असली खर्च
सैलरी से टैक्स और दूसरे जरूरी पेमेंट निकलने के बाद अगली बड़ी चुनौती रोजमर्रा की जिंदगी का खर्च है. जर्मनी के बड़े शहरों में घर का किराया काफी महंगा हो सकता है. तनुज के मुताबिक, बड़े शहरों में घर का किराया करीब 1,500 पाउंड या उससे ज्यादा भी पहुंच सकता है. हालांकि, यह रकम शहर, घर के आकार और लोकेशन के हिसाब से काफी बदल सकती है. इसके अलावा बिजली, इंटरनेट, खाना, ट्रांसपोर्ट, इंश्योरेंस और दूसरी जरूरतों पर भी हर महीने पैसा खर्च होता है. अकेले रहने वाले और परिवार के साथ रहने वाले व्यक्ति की बचत का हिसाब भी एक जैसा नहीं होगा.
65 लाख रुपये सुनकर सबसे बड़ी गलती
जर्मनी की सैलरी को भारतीय रुपये में बदलकर देखना आसान है, लेकिन इससे वहां की असली आर्थिक स्थिति समझना मुश्किल है. इसकी वजह यह है कि करेंसी कन्वर्जन और परचेजिंग पावर अलग-अलग चीजें हैं. अगर 70 हजार पाउंड को भारतीय रुपये में बदलेंगे तो एक बड़ी रकम सामने आएगी. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में 65-70 लाख रुपये कमाने वाले व्यक्ति और जर्मनी में 70 हजार पाउंड कमाने वाले व्यक्ति की जिंदगी और बचत बिल्कुल एक जैसी होगी. दोनों देशों में घर, खाना, ट्रांसपोर्ट, इंश्योरेंस और दूसरी सर्विस की कीमतें अलग हैं.
PPP का हिसाब भी समझना जरूरी
तनुज की पोस्ट में 70 हजार पाउंड की सैलरी को परचेजिंग पावर पैरिटी यानी PPP के नजरिए से भी समझाया गया. PPP का इस्तेमाल अलग-अलग देशों में लोगों की खरीदने की क्षमता की तुलना करने के लिए किया जाता है. सरल भाषा में समझें तो 1 रुपये की कीमत हर देश में एक जैसी नहीं होती. जिस सामान या सर्विस के लिए भारत में कम पैसे खर्च हो सकते हैं, उसके लिए जर्मनी में ज्यादा रकम देनी पड़ सकती है. इसीलिए विदेशी सैलरी को सिर्फ रुपये में बदलकर देखना पूरी तस्वीर नहीं देता. असली सवाल यह होना चाहिए कि टैक्स और जरूरी खर्च निकालने के बाद हर महीने कितनी रकम बच रही है.
शहर बदलते ही बदल सकता है पूरा हिसाब
जर्मनी में रहने का खर्च हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं है. कोई बर्लिन, म्यूनिख या किसी दूसरे बड़े शहर में रहता है तो उसका किराया ज्यादा हो सकता है. वहीं छोटे शहर में रहने वाले व्यक्ति के खर्च अलग हो सकते हैं. इसी तरह अकेले रहने वाला कर्मचारी और पति-पत्नी या बच्चों के साथ रहने वाला परिवार भी अपनी कमाई का अलग हिस्सा खर्च करेगा. घर का किराया, बाहर खाना, घूमना, कार रखना और लाइफस्टाइल जैसी चीजें बचत को काफी प्रभावित कर सकती हैं. इसलिए 70 हजार पाउंड की सैलरी को किसी एक व्यक्ति के लिए बचत की तय रकम मानना सही नहीं होगा.
विदेश जाने से पहले पूरा हिसाब लगाएं
जर्मनी या किसी दूसरे देश में नौकरी का ऑफर मिले तो सबसे पहले सिर्फ पैकेज देखकर उत्साहित होने के बजाय नेट सैलरी का हिसाब समझना जरूरी है. कंपनी कितना ग्रॉस दे रही है और टैक्स व दूसरे जरूरी भुगतान के बाद कितना पैसा हाथ में आएगा, यह ज्यादा अहम है. इसके बाद उस शहर का किराया, हेल्थ इंश्योरेंस, बिजली, इंटरनेट, खाना, ट्रांसपोर्ट और महीने के दूसरे खर्च जोड़ने चाहिए. तभी पता चलेगा कि हर महीने वास्तव में कितनी बचत हो सकती है.
सिर्फ लाखों की सैलरी ही पूरी कहानी नहीं
विदेश में नौकरी का मतलब सिर्फ बड़ी रकम कमाना नहीं है. वहां मिलने वाली सैलरी के साथ रहने का खर्च और टैक्स सिस्टम भी समझना जरूरी है. भारत से देखने पर 70 हजार पाउंड बहुत बड़ी रकम लग सकती है, लेकिन जर्मनी में रहने वाले व्यक्ति के लिए इसका बड़ा हिस्सा जरूरी खर्चों में चला सकता है. तनुज की सोशल मीडिया पोस्ट इसी अंतर की ओर ध्यान खींचती है. हालांकि, उनका अनुभव व्यक्तिगत है और हर व्यक्ति की स्थिति अलग हो सकती है. जर्मनी में सैलरी, टैक्स और बचत का वास्तविक हिसाब नौकरी, शहर, टैक्स स्थिति, परिवार और लाइफस्टाइल के हिसाब से बदलता है.