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गणेश चतुर्थी का इंतजार खत्म होने के साथ ही देशभर में इस त्योहार को मनाने की तैयारियां तेज हो गई हैं. घरों में गणपति की स्थापना से लेकर बड़े सार्वजनिक पंडालों तक, हर तरफ लोग बप्पा का स्वागत करते दिखाई दे रहे हैं. ढोल-ताशे, सजावट, रोशनी और तरह-तरह की थीम के बीच शहरों का माहौल पूरी तरह बदल चुका है. वैसे तो भगवान गणेश की पूजा देश के अलग-अलग हिस्सों में होती है, लेकिन सार्वजनिक गणेशोत्सव की सबसे बड़ी पहचान महाराष्ट्र से जुड़ी है. खासकर मुंबई और पुणे में गणपति पंडाल सिर्फ पूजा की जगह नहीं रह जाते, बल्कि कुछ दिनों के लिए पूरे शहर के बड़े आकर्षण बन जाते हैं.
मुंबई में लालबागचा राजा से लेकर गणेश गल्ली, खेतवाड़ी और दूसरे मशहूर मंडलों तक, हर साल लाखों लोग पहुंचते हैं. वहीं पुणे में दगडूशेठ हलवाई गणपति और ऐतिहासिक गणपति मंडलों की अपनी खास पहचान है. दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी गणेश पूजा का उत्साह देखने को मिलता है. 2026 में गणेश चतुर्थी आज 14 सितंबर को मनाई जा रही है और दस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी के दिन होगा. ऐसे में अगर आप भी गणपति उत्सव की भव्यता करीब से देखना चाहते हैं, तो इन चर्चित ठिकानों के बारे में जानना आपके लिए दिलचस्प हो सकता है.
मुंबई के गणपति उत्सव का नाम आते ही सबसे पहले जिस नाम की चर्चा होती है, वह है लालबागचा राजा. गणपति भक्तों के बीच इसे मन्नतों का राजा भी कहा जाता है. हर साल यहां दर्शन के लिए इतनी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं कि आसपास की सड़कों पर भी उत्सव जैसा माहौल बन जाता है. लालबागचा राजा सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की शुरुआत 1934 में हुई थी. इतने लंबे सफर के बाद यह मुंबई के गणेशोत्सव की पहचान बन चुका है. यहां की गणपति प्रतिमा, पंडाल की सजावट और दर्शन के लिए उमड़ती भीड़ हर साल लोगों का ध्यान खींचती है. कई भक्त अपनी मन्नत लेकर यहां पहुंचते हैं और गणपति बप्पा के दर्शन को खास अनुभव मानते हैं. यही वजह है कि मुंबई आने वाले गणपति भक्तों की लिस्ट में लालबागचा राजा सबसे ऊपर रहता है.

मुंबई के लालबाग इलाके में ही गणेश गल्ली का मुंबईचा राजा भी गणेशोत्सव की खास पहचान है. यह मंडल अपनी थीम और पंडाल की सजावट के लिए जाना जाता है. यहां हर साल कुछ नया देखने की उम्मीद लेकर लोग पहुंचते हैं. 2026 में गणेश गल्ली सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल अपने आयोजन के 99वें साल में प्रवेश कर रहा है. इस बार आयोजन में महाराष्ट्र की संत परंपरा से जुड़ी थीम को खास जगह देने की तैयारी की गई है. यहां धार्मिक माहौल के साथ सांस्कृतिक रंग भी देखने को मिलता है. पंडाल की सजावट, कार्यक्रम और थीम मिलकर इसे मुंबई के चर्चित गणपति ठिकानों में शामिल करते हैं.

मुंबई में गणपति उत्सव सिर्फ लालबागचा राजा या गणेश गल्ली तक सीमित नहीं है. शहर के अलग-अलग इलाकों में कई ऐसे मंडल हैं, जिनकी अपनी अलग पहचान है. खेतवाड़ी गणराज, अंधेरीचा राजा, चिंचपोकलीचा चिंतामणि और गिरगांवचा राजा जैसे नाम गणपति भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. इन जगहों पर बड़ी मूर्तियों से लेकर आकर्षक लाइटिंग और थीम बेस्ड सजावट तक देखने को मिलती है. गणेशोत्सव के दौरान मुंबई के कई इलाकों में देर रात तक लोगों की आवाजाही रहती है. ऐसे में पंडालों का यह सफर सिर्फ धार्मिक अनुभव नहीं, बल्कि शहर की संस्कृति और लोगों की भागीदारी को समझने का मौका भी देता है.

अगर महाराष्ट्र में मुंबई के बाद किसी शहर का गणेशोत्सव सबसे ज्यादा चर्चा में रहता है, तो वह पुणे है. यहां श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति का नाम देशभर में जाना जाता है. गणेश चतुर्थी के दौरान दगडूशेठ मंदिर और उसके आसपास का इलाका भक्तों से भर जाता है. यहां गणपति की भव्य प्रतिमा और पूरे परिसर की सजावट उत्सव का खास हिस्सा बनती है. पुणे की खासियत यह भी है कि यहां सिर्फ दगडूशेठ ही नहीं, बल्कि कई पुराने और प्रतिष्ठित गणपति मंडल हैं. कसबा गणपति, तांबडी जोगेश्वरी, तुलसीबाग और दूसरे मंडलों की अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान है.

पुणे का गणेशोत्सव सिर्फ भव्यता के लिए नहीं, बल्कि अपनी पुरानी परंपराओं के लिए भी जाना जाता है. यहां कई गणपति मंडल वर्षों से लोगों की आस्था का हिस्सा बने हुए हैं. कसबा गणपति को पुणे के प्रमुख गणपति मंडलों में गिना जाता है. वहीं तांबडी जोगेश्वरी और तुलसीबाग गणपति भी भक्तों के बीच खास लोकप्रिय हैं. गणेशोत्सव के दिनों में इन इलाकों में पूजा के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सजावट की रौनक भी देखने को मिलती है. यही परंपरा पुणे के गणेशोत्सव को मुंबई से थोड़ा अलग अंदाज देती है. यहां उत्सव में इतिहास, लोक परंपरा और सार्वजनिक भागीदारी का मेल नजर आता है.

पश्चिम बंगाल की पहचान भले ही दुर्गा पूजा की भव्यता से होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यहां गणेश चतुर्थी का उत्साह नहीं दिखता. कोलकाता और राज्य के दूसरे शहरी इलाकों में घरों और कुछ सार्वजनिक आयोजनों में भगवान गणेश की पूजा की जाती है. महाराष्ट्र की तरह यहां गणेशोत्सव की विशाल सार्वजनिक परंपरा हर जगह नहीं दिखाई देती, लेकिन समय के साथ गणपति पूजा का उत्साह बढ़ता नजर आता है. खासकर शहरों में रहने वाले अलग-अलग समुदायों के लोग इस मौके पर गणपति स्थापना और पूजा करते हैं. 2026 में कोलकाता समेत पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में गणेश चतुर्थी को लेकर धार्मिक तैयारियां की जा रही हैं. यहां का उत्सव महाराष्ट्र की तुलना में अलग रंग लिए होता है, लेकिन बप्पा के प्रति आस्था वही नजर आती है.

आज के गणपति पंडालों की सबसे खास बात उनकी थीम होती है. कई मंडल पौराणिक कहानियों को पंडाल के जरिए दिखाते हैं, तो कुछ सामाजिक मुद्दों को सजावट का हिस्सा बनाते हैं. कहीं पर्यावरण बचाने का संदेश दिया जाता है, तो कहीं भारतीय संस्कृति और इतिहास की झलक दिखाई जाती है. इसी वजह से गणपति पंडाल अब सिर्फ धार्मिक आयोजन की जगह नहीं रह गए हैं. लोग इन्हें देखने, तस्वीरें लेने और अलग-अलग थीम को समझने के लिए भी पहुंचते हैं. कई मंडल कोशिश करते हैं कि उनकी सजावट हर साल पिछले साल से अलग हो. यही क्रिएटिविटी गणेशोत्सव को लोगों के बीच और ज्यादा लोकप्रिय बनाती है.
गणेशोत्सव की सबसे खूबसूरत बात यही है कि यह सिर्फ भगवान गणेश की पूजा तक सीमित नहीं रहता. बड़े पंडालों के आसपास स्थानीय दुकानदारों, कलाकारों, वॉलंटियर्स और आम लोगों की बड़ी भागीदारी दिखाई देती है. मुंबई और पुणे जैसे शहरों में गणेशोत्सव स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बन चुका है. पंडालों की सजावट से लेकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक, लोगों की मेहनत साफ दिखाई देती है. यही वजह है कि दूसरे शहरों और राज्यों से आने वाले लोग भी इन आयोजनों का हिस्सा बनना पसंद करते हैं.
अगर आप 2026 में गणेशोत्सव की भव्यता देखना चाहते हैं, तो मुंबई का लालबागचा राजा, गणेश गल्ली का मुंबईचा राजा और खेतवाड़ी जैसे पंडाल खास आकर्षण हो सकते हैं. पुणे में दगडूशेठ हलवाई गणपति के साथ कसबा गणपति, तांबडी जोगेश्वरी और तुलसीबाग जैसे पुराने मंडल देखे जा सकते हैं. वहीं पश्चिम बंगाल में गणपति पूजा का अनुभव महाराष्ट्र से अलग हो सकता है. यहां आपको बड़े पंडालों की जगह स्थानीय स्तर पर होने वाली पूजा और शहरी इलाकों की गणेश चतुर्थी की अलग झलक देखने को मिलेगी.
गणेश चतुर्थी 2026 में देश के अलग-अलग हिस्सों में भले ही अलग अंदाज में मनाई जा रही हो, लेकिन बप्पा के स्वागत का उत्साह हर जगह दिखाई देता है. मुंबई की जबरदस्त भीड़ और मशहूर पंडाल हों, पुणे की पुरानी परंपराएं हों या बंगाल में बढ़ता गणपति उत्सव, हर जगह इसकी अपनी खास कहानी है. यही वजह है कि गणेशोत्सव अब सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं रह गया है. यह कला, संस्कृति, लोक भागीदारी और सामाजिक संदेशों को साथ लेकर चलने वाला बड़ा उत्सव बन चुका है.