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किसी पांच साल के बच्चे के हाथ में सफेद छड़ी देखकर शायद आपको पहला ख्याल यही आएगा कि इसकी जिंदगी कितनी मुश्किल होगी. लेकिन ऐनी मिश्रा को करीब से देखेंगे तो कहानी कुछ और नजर आती है. वह अपनी सफेद छड़ी के सहारे रास्ता पहचानती है, चीजों को छूकर समझती है और अपनी उम्र के बाकी बच्चों की तरह नई-नई चीजें सीखने की कोशिश करती रहती है.
सोशल मीडिया पर ऐनी के वीडियो सामने आने के बाद लोग उसके आत्मविश्वास की तारीफ कर रहे हैं. कोई उसके कराटे को देखकर हैरान है, तो कोई उसकी मां के संघर्ष को सलाम कर रहा है. लेकिन आज ऐनी जिस तरह आगे बढ़ रही है, उसके पीछे कई साल की मेहनत और एक मां का लगातार खुद से लड़ना छिपा है.
ऐनी जन्म से ही देख नहीं सकती. जब वह बहुत छोटी थी, तब उसकी मां लोपामुद्रा के सामने भी यह सवाल था कि बेटी की जिंदगी कैसे आसान बनाई जाए. उस समय आसपास के कुछ लोगों ने उन्हें तरह-तरह की बातें सुनाईं. किसी ने इसे पिछले जन्म के कर्मों का फल बताया, तो किसी ने पूजा-पाठ कराने की सलाह दी. लोपामुद्रा ने भी शुरुआत में इन बातों को गंभीरता से लिया. करीब दो साल तक मंदिरों के चक्कर लगाए और पूजा-पाठ करवाया. लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि सवाल यह नहीं है कि उनकी बेटी के साथ ऐसा क्यों हुआ? असली सवाल यह है कि वह अपनी बेटी को ऐसी जिंदगी कैसे दें, जिसमें उसे किसी के सामने दया या हमदर्दी के लिए हाथ न फैलाना पड़े.
यहीं से ऐनी की जिंदगी का रास्ता बदलना शुरू हुआ. ऐनी की मां ने तय किया कि बेटी को बाकी बच्चों से अलग करके नहीं, बल्कि उसे ज्यादा से ज्यादा मौके देकर बड़ा करना है. उन्होंने ऐनी को छोटी-छोटी चीजें खुद करने के लिए प्रेरित किया. रास्ता पहचानना हो या कोई नई चीज सीखनी हो, मां ने हर कदम पर उसका साथ दिया, लेकिन उसकी जगह खुद काम करने की कोशिश नहीं की. मां का मानना था कि अगर ऐनी को हमेशा कोई दूसरा संभालता रहेगा तो वह अपनी आजादी कैसे सीखेगी. इसलिए घर से लेकर बाहर तक उसे धीरे-धीरे खुद चीजों को समझने और करने का मौका दिया गया.
15 schools rejected Aeny because of what she couldn’t see. They failed to see everything she could. Today, she plays the piano, practises karate, speaks three languages and has presented her own science project at an All India STEM exhibition. Her blindness was never the limit.… pic.twitter.com/YLGaUv9yD2
— The Better India (@thebetterindia) September 24, 2026
आज ऐनी सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कर रही, बल्कि कई ऐसी चीजें सीख रही है, जिन्हें देखकर उसकी उम्र और उसकी परेशानी के बीच कोई फर्क नजर नहीं आता. वह ब्रेल लिपि पढ़ती है. एबेकस सीख रही है और कीबोर्ड बजाने की भी कोशिश करती है. वह साइकिल चलाती है और कराटे की ट्रेनिंग भी ले रही है. सबसे खास बात यह है कि साढ़े चार साल की उम्र में ऐनी ने कराटे में ऑरेंज बेल्ट हासिल कर ली. उसके लिए यह सिर्फ एक बेल्ट नहीं है. यह उस सोच का जवाब भी है, जो कभी उसे सिर्फ उसकी आंखों की रोशनी से पहचानना चाहती थी.
इस सफर में ऐनी के नानाजी भी उसके बहुत करीब रहे हैं. वह उसे पार्क लेकर जाते हैं और उसके साथ समय बिताते हैं. ऐनी को दुनिया समझने में मदद करने के लिए वह उसे चीजों को छूकर महसूस करने देते हैं. बच्चे के लिए बाहर की दुनिया को बिना देखे समझना आसान नहीं होता. ऐसे में नानाजी का साथ ऐनी के लिए किसी दोस्त जैसा है. उनके साथ वह खेलती है, घूमती है और नई चीजों को अपने तरीके से जानने की कोशिश करती है.
ऐनी की कहानी का सबसे मुश्किल हिस्सा शायद यही है. उसकी मां ने बेंगलुरु के करीब 15 नामी स्कूलों में एडमिशन के लिए कोशिश की, लेकिन उन्हें एक के बाद एक निराशा मिली. कहीं कहा गया कि ऐनी के लिए अलग टीचर रखना पड़ेगा. कहीं फीस से जुड़ी शर्तें सामने आईं. इसमें समस्या सिर्फ यह नहीं थी कि ऐनी देख नहीं सकती. असली दिक्कत यह थी कि कई स्कूल उसके लिए अपने सिस्टम में जरूरी बदलाव करने को तैयार नहीं थे. ऐनी की मां के लिए यह अनुभव बेहद परेशान करने वाला था. जिस शहर में बड़े-बड़े स्कूल और आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं, वहां एक बच्ची को सिर्फ इसलिए जगह न मिलना कि उसे पढ़ाने के लिए थोड़ी अतिरिक्त तैयारी चाहिए, उनके लिए बड़ा सवाल था.
भारत में दिव्यांग बच्चों की शिक्षा को लेकर अधिकार और नियम मौजूद हैं. 2016 का RPWD Act भी समान अवसर और शिक्षा के अधिकार की बात करता है. लेकिन कागज पर मौजूद अधिकार और जमीन पर मिलने वाली सुविधा के बीच अभी भी बड़ा अंतर दिखाई देता है. स्कूल में सिर्फ एडमिशन दे देना काफी नहीं है. ऐसे बच्चों के लिए प्रशिक्षित स्टाफ, सही पढ़ाई का तरीका, जरूरी उपकरण और ऐसा माहौल चाहिए, जहां उन्हें हर कदम पर दूसरों से कम महसूस न कराया जाए.
लोपामुद्रा की सोच साफ है. वह नहीं चाहतीं कि लोग उनकी बेटी को देखकर सिर्फ भावुक हों या उस पर दया करें. वह चाहती हैं कि ऐनी को वही मौका मिले, जो किसी दूसरे बच्चे को मिलता है. उनका कहना है कि ऐसे बच्चों को सहानुभूति से ज्यादा स्वीकार्यता और बराबर का मौका चाहिए. जब किसी बच्चे को उसकी क्षमता दिखाने की आजादी मिलती है, तभी वह अपनी असली पहचान बना पाता है.
आज ऐनी जब सफेद छड़ी लेकर चलती है तो वह सिर्फ रास्ता तलाश नहीं रही होती. वह धीरे-धीरे अपनी आजादी सीख रही होती है. कराटे की हर नई बेल्ट, ब्रेल का हर नया शब्द और साइकिल का हर चक्कर उसके आत्मविश्वास को थोड़ा और मजबूत करता है. शायद यही वजह है कि ऐनी का वीडियो देखने वाले लोग सिर्फ उसकी तारीफ नहीं कर रहे, बल्कि उसकी मां के बारे में भी बात कर रहे हैं. क्योंकि बच्चे का हौसला कई बार घर के किसी एक इंसान के भरोसे से बनता है. ऐनी की कहानी में कोई चमत्कार नहीं है. इसमें एक मां की कोशिश है, एक बच्ची की जिद है और उन दरवाजों के सामने खड़े रहने का साहस है, जो उसके लिए बंद कर दिए गए थे. आज वही बच्ची अपनी सफेद छड़ी के सहारे आगे बढ़ रही है और बता रही है कि किसी की जिंदगी की सीमा उसकी कमजोरी तय नहीं करती, बल्कि उसे मिले मौके और उसका हौसला बहुत कुछ बदल सकते हैं.