यहां औरतें नहीं, साड़ी पहनकर गरबा करते हैं मर्द: गांव में सदियों से निभाई जा रही यह अनोखी परंपरा; VIDEO वायरल
गुजरात में नवरात्रि के दौरान आपने महिलाओं को साड़ी या चनिया-चोली में गरबा करते खूब देखा होगा. लेकिन अहमदाबाद की एक पुरानी गली में पुरुष भी रंग-बिरंगी साड़ियां पहनकर गरबा करते हैं. यह कोई फैशन या मनोरंजन नहीं, बल्कि बरोट समुदाय की करीब 200 साल पुरानी परंपरा है. इसके पीछे साडू माता की कहानी है, जो उनकी रक्षा न कर पाने का पछतावा और माफी मांगने से जुड़ी मान्यता है.
गुजरात में नवरात्रि आते ही गरबा की धूम शुरू हो जाती है. कहीं बड़े मैदानों में हजारों लोग एक साथ नाचते हैं, तो कहीं गलियों और मोहल्लों में पारंपरिक गरबा होता है. लेकिन अहमदाबाद के शाहपुर इलाके में होने वाला गरबा अपने अलग अंदाज के लिए जाना जाता है.
यहां नवरात्रि की आठवीं रात बरोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर गरबा करते हैं. उनके माथे पर लाल सिंदूर की बिंदी होती है और आसपास साडू माता के जयकारे सुनाई देते हैं. इस रस्म में शामिल होने के लिए सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं, दूसरे इलाकों से भी लोग पहुंचते हैं. पहली बार इस परंपरा के बारे में सुनने वालों के मन में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर पुरुष साड़ी पहनकर गरबा क्यों करते हैं? इसकी वजह एक ऐसी कहानी है, जिसे समुदाय के लोग पीढ़ियों से याद करते आ रहे हैं. इसके वीडियो हर साल सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं. इस बार भी इंस्टाग्राम पर इसका वीडियो खूब वायरल हो रहा है.
साडू माता के सम्मान में निभाई जाती है रस्म
अहमदाबाद के शाहपुर इलाके में स्थित साडू माता नी पोल में हर साल यह आयोजन होता है. पोल गुजरात में पुराने घरों और आसपास की गलियों वाले पारंपरिक मोहल्लों को कहा जाता है. यहां साडू माता को समर्पित एक छोटा मंदिर भी है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस परंपरा में हर साल कम से कम 40 पुरुष और दूसरे श्रद्धालु शामिल होते हैं. इस बार दूसरे समुदायों के करीब 25 से 30 पुरुषों ने भी गरबा किया था. इनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी शामिल थे. 60 साल के सतीश बरोट ने इसको लेकर बताया कि वह 40 साल से भी ज्यादा समय से इस रस्म का हिस्सा बन रहे हैं. उनके लिए यह सिर्फ गरबा नहीं, बल्कि अपने समुदाय की परंपरा और साडू माता के प्रति आस्था जताने का तरीका है.
पत्नी ने पहनाई साड़ी, बेटा भी पहली बार हुआ शामिल
समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस आयोजन में शामिल होने के लिए सुरेंद्रनगर से पिंटू बरोट भी अपने परिवार के साथ अहमदाबाद पहुंचे थे. उन्होंने बताया कि इस बार उनका 10 साल का बेटा, उनका भाई और भतीजा पहली बार साडू माता के गरबा में हिस्सा ले रहे हैं. पिंटू जब गरबा के लिए साड़ी पहन रहे थे, तब उनकी पत्नी भी उन्हें तैयार होने में मदद कर रही थीं. यह नजारा बताता है कि समुदाय के लिए यह परंपरा कितनी खास है. परिवार के बड़े हों या बच्चे, कई लोग इस रस्म को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते हैं. समुदाय के लोगों का मानना है कि इस आयोजन के जरिए वे साडू माता को याद करते हैं, उनसे माफी मांगते हैं और अपने परिवारों की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं.
करीब 200 साल पहले क्या हुआ था?
इस परंपरा के पीछे की कहानी बताते हुए स्थानीय निवासी तुषार बरोट ने बताया कि साडू माता अपनी खूबसूरती के लिए जानी जाती थीं. समुदाय की मान्यता के अनुसार, उस समय के शासक ने उन्हें शाही दरबार में पेश करने का आदेश दिया था. इसके लिए सैनिकों को भेजा गया. लेकिन बरोट समुदाय के लोगों ने साडू माता की इच्छा के खिलाफ उन्हें दरबार में ले जाने का विरोध किया. इस बात को लेकर समुदाय के लोगों और सैनिकों के बीच टकराव हो गया. हालात बिगड़ने लगे, तो साडू माता ने ऐसा फैसला लिया, जिसकी याद आज भी समुदाय के लोगों को भावुक कर देती है. तुषार बरोट ने आगे मीडिया को बताया कि साडू माता ने पहले अपनी बेटी अजूबा की जान ले ली. इसके बाद उन्होंने अपने पति हथीसिंह बरोट से कहा कि वे तलवार के एक ही वार में उनकी जान ले लें. वह जबरन शाही दरबार में ले जाए जाने से बचना चाहती थीं. यह घटना समुदाय की मौखिक परंपरा में आज भी याद की जाती है. इसी कहानी को इस रस्म की मुख्य वजह माना जाता है.
साडू माता को बचा नहीं पाए, इसलिए हुआ पछतावा
समुदाय के लोगों के अनुसार, साडू माता की मौत के बाद बरोट समाज के लोगों के मन में गहरा पछतावा था. उन्हें लगता था कि वे उनकी रक्षा नहीं कर पाए. समय बीतने के साथ इस घटना से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं भी मजबूत होती गईं. स्थानीय लोगों का कहना है कि बाद के वर्षों में परिवारों में पुरुषों की मौत और अगली पीढ़ियों के कम होने जैसी घटनाओं को समुदाय के कुछ लोग साडू माता के श्राप से जोड़ने लगे. हालांकि, यह समुदाय की धार्मिक मान्यता है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं है. इसके बाद लोग उस जगह इकट्ठा होने लगे, जहां साडू माता के सम्मान में मंदिर बनाया गया था. उन्होंने उनसे माफी मांगी और अपने परिवारों की खुशहाली के लिए प्रार्थना की.
साड़ी पहनने का वादा कैसे बना परंपरा?
साडू माता से माफी मांगने और अपनी गलती का प्रायश्चित करने के लिए समुदाय के पुरुषों ने उनसे जुड़े कपड़े पहनने का वादा किया था. समुदाय के लोग साड़ी पहनकर गरबा करने को उसी वादे से जोड़ते हैं. उनकी मान्यता है कि प्रार्थना के बाद परिवारों में खुशहाली लौटी और अगली पीढ़ियां आगे बढ़ने लगीं. इससे साडू माता के प्रति उनकी आस्था और मजबूत हुई. धीरे-धीरे यह रस्म हर साल नवरात्रि की आठवीं रात निभाई जाने लगी. आज इस परंपरा में अलग-अलग उम्र के पुरुष शामिल होते हैं. उनके लिए साड़ी पहनना किसी का मजाक उड़ाना या केवल लोगों का ध्यान खींचना नहीं है, बल्कि अपने समुदाय की आस्था को निभाना है.
दूसरे समुदायों के लोग भी लेते हैं हिस्सा
इस गरबा की एक खास बात यह भी है कि इसमें दूसरे समुदायों के लोग भी शामिल होते हैं. उनके लिए यह आयोजन स्थानीय परंपरा को करीब से देखने और लोगों के साथ जुड़ने का मौका है. साड़ी पहने पुरुष जब मंदिर के छोटे से आंगन में गरबा करते हैं, तो वहां मौजूद लोग भी इस रस्म का हिस्सा बनते हैं. यहां गरबा सिर्फ नाचने-गाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक पुरानी कहानी और उससे जुड़ी यादों को जिंदा रखने का जरिया बन जाता है.
आज भी जिंदा है 200 साल पुरानी कहानी
अहमदाबाद की इस परंपरा को समझने के लिए सिर्फ पुरुषों को साड़ी पहनकर गरबा करते देखना काफी नहीं है. इसके पीछे बरोट समुदाय की वह कहानी है, जिसमें साडू माता की रक्षा न कर पाने का दुख और उनसे माफी मांगने की मान्यता जुड़ी है. करीब 200 साल से चली आ रही इस रस्म में आज भी समुदाय के लोग पूरे विश्वास के साथ शामिल होते हैं. उनके लिए यह साडू माता के प्रति सम्मान जताने और पुरखों से मिली परंपरा को आगे बढ़ाने का तरीका है. यही वजह है कि नवरात्रि की आठवीं रात अहमदाबाद की इस पुरानी गली में होने वाला गरबा बाकी आयोजनों से अलग नजर आता है.
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