)
पिछले लगभग 50 सालों से हम अपनी डिजिटल और कलाई घड़ियों को धरती की चाल से मिलाने के लिए जिस 'लीप सेकंड' (Leap Second) का सहारा ले रहे थे, अब उसे हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कहने की तैयारी चल रही है. फ्रांस की राजधानी पेरिस के पास वर्साय में 'इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ वेट्स एंड मेजर्स' (BIPM) की एक मीटिंग होने जा रही है. यहां दुनिया भर के 69 देशों के प्रतिनिधि इस बात पर वोट करेंगे कि क्या इस लीप सेकंड के झंझट को मई 2027 से पूरी तरह ख़त्म कर दिया जाए? अगर यह फैसला पास हो गया, तो हमारी घड़ियों का सीधा कनेक्शन सूरज की रोजाना की चाल से थोड़ा ढीला हो जाएगा. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि आखिर सिर्फ 1 सेकंड के पीछे इतना बड़ा हंगामा क्यों है? गूगल, मेटा जैसी दिग्गज टेक कंपनियों और दुनिया भर की सरकारों की सांसें इस 1 सेकंड का नाम सुनते ही क्यों अटक जाती हैं?
आखिर क्या है यह लीप सेकंड और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
हम सब बचपन से किताबों में पढ़ते आए हैं कि धरती अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करने में पूरे 24 घंटे लेती है. लेकिन हकीकत यह है कि हमारी धरती कोई परफेक्ट डिजिटल घड़ी नहीं है. इसकी घूमने की स्पीड कभी थोड़ी तेज हो जाती है, तो कभी सुस्त समंदर में आने वाले ज्वार-भाटा, चांद का खिंचाव, पृथ्वी के अंदर पिघले हुए लोहे की हलचल और यहां तक कि ग्लेशियरों का पिघलना- ये सब धरती की चाल को प्रभावित करते हैं.
दूसरी तरफ, इंसानों ने 1950 के दशक में 'एटॉमिक क्लॉक' बना ली. यह प्रयोगशाला में बनी एक ऐसी सुपर-सटीक घड़ी है, जो सीजियम एटम के वाइब्रेशन पर चलती है. यह लाखों-करोड़ों साल में भी 1 सेकंड का फर्क नहीं आने देती. अब समस्या यह खड़ी हुई कि धरती की चाल और एटॉमिक क्लॉक का टाइम आपस में मैच नहीं कर रहा था. धरती अपनी सुस्ती के कारण एटॉमिक क्लॉक से थोड़ी पीछे छूटने लगी.
इस गैप को भरने के लिए 1972 में 'लीप सेकंड' का सिस्टम शुरू किया गया. नियम यह बना कि जब भी दोनों घड़ियों में 0.9 सेकंड से ज्यादा का अंतर आएगा, तो दुनिया की मेन एटॉमिक घड़ी में 1 सेकंड एक्स्ट्रा जोड़ दिया जाएगा. 1972 से लेकर अब तक ऐसा 27 बार किया जा चुका है.
सिर्फ 1 सेकंड से इंटरनेट पर हाहाकार क्यों?
आप सोच रहे होंगे कि घड़ी में बस 1 सेकंड ही तो जोड़ा जाता है, इससे किसी का क्या बिगड़ता है? हम इंसानों के लिए 1 सेकंड का मतलब पलक झपकाने से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन आज की डिजिटल दुनिया के लिए यह 1 सेकंड किसी बड़े भूचाल से कम नहीं है.
आज का पूरा इंटरनेट, शेयर मार्केट, ऑनलाइन बैंकिंग, पावर ग्रिड, उड़ानों का बुकिंग सिस्टम और GPS- सब कुछ माइक्रो-सेकंड की सटीकता पर चलते हैं. जब भी घड़ियों में अचानक 1 सेकंड जोड़ा जाता है, तो कंप्यूटर सर्वर कन्फ्यूज हो जाते हैं. उन्हें समझ ही नहीं आता कि इस अचानक आए 1 सेकंड का क्या करें.
साल 2012: जब लीप सेकंड जोड़ा गया, तो रेडिट, लिंक्डइन और क्वांटास एयरलाइंस जैसे बड़े सिस्टम क्रैश हो गए थे.
साल 2016: जब आखिरी बार इसे जोड़ा गया, तब क्लाउडफ्लेयर के सर्वर्स में बड़ी तकनीकी ख़राबी आ गई थी.
जब इस तरह सर्वर्स डाउन होते हैं, तो बड़ी टेक कंपनियों से लेकर सरकारों के हाथ-पांव फूल जाते हैं. यही वजह है कि गूगल और मेटा जैसी कंपनियां सालों से इस लीप सेकंड को ख़त्म करने की मांग कर रही हैं.
'नेगेटिव लीप सेकंड' का नया खौफ
हाल के कुछ सालों में वैज्ञानिकों के सामने एक और अजीब चुनौती आ खड़ी हुई है. डेटा दिखाता है कि भले ही लंबे समय में धरती सुस्त हो रही हो, लेकिन पिछले कुछ सालों में इसकी घूमने की रफ्तार अचानक थोड़ी तेज हो गई है.
इसका मतलब यह हुआ कि इस बार घड़ियों में 1 सेकंड जोड़ने के बजाय 1 सेकंड घटाना पड़ सकता है! साइंस में इसे 'नेगेटिव लीप सेकंड' कहा जाता है.
इंसानी इतिहास में आज तक कभी घड़ियों से 1 सेकंड घटाया नहीं गया है. जानकारों का मानना है कि अगर ऐसा किया गया, तो आज का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इसे बर्दाश्त नहीं कर पाएगा. यह ख़तरा कुछ-कुछ वैसा ही हो सकता है जैसा साल 2000 की शुरुआत में 'Y2K बग' के समय देखा गया था. बैंक ट्रांसफर अटक सकते हैं, नेविगेशन सिस्टम फेल हो सकते हैं और पावर ग्रिड ठप हो सकते हैं. इसी डर ने वैज्ञानिकों को लीप सेकंड की प्रथा ख़त्म करने पर मजबूर कर दिया है.
पेरिस मीटिंग और भविष्य का 'लीप आवर'
पेरिस में जुटने जा रहे 69 देशों के सामने यही प्रस्ताव है कि लीप सेकंड को हमेशा के लिए बाय-बाय कह दिया जाए. मई 2027 से इसकी शुरुआत करने और 2035 तक इसे पूरी तरह लागू करने की योजना है. इसके बाद दुनिया की घड़ियां धरती की अनिश्चित चाल के बजाय केवल एटॉमिक क्लॉक के हिसाब से एक समान रफ्तार से चलेंगी.
रूस और ब्रिटेन जैसे देश पहले इसका विरोध कर रहे थे. रूस का नेविगेशन सिस्टम (GLONASS) लीप सेकंड पर आधारित है, और ब्रिटेन को अपने ऐतिहासिक 'ग्रीनिच मीन टाइम' (GMT) की साख की चिंता थी. लेकिन अब ज्यादातर देश इस बात पर सहमत हैं कि डिजिटल वर्ल्ड की स्थिरता ज्यादा जरूरी है.
क्या दोपहर में अंधेरा हो जाएगा?
कई लोगों के मन में सवाल आता है कि अगर हम अपनी घड़ियों को धरती की चाल से नहीं मिलाएंगे, तो क्या एक दिन ऐसा आएगा जब दोपहर के 12 बजे आसमान में अंधेरा होगा? वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा होने में हजारों साल लग जाएंगे.
एटॉमिक समय और धरती के समय में 1 घंटे (3600 सेकंड) का फर्क आने में कम से कम 3,000 साल लगेंगे. वैज्ञानिकों का मानना है कि हर कुछ सालों में 1 सेकंड का रिस्क लेने से बेहतर है कि इस समस्या को भविष्य की पीढ़ियों के लिए छोड़ दिया जाए. आज से 3,000 साल बाद के लोग चाहें तो अपनी घड़ियों में एक साथ 1 घंटा बढ़ा लेंगे, जिसे 'लीप आवर' कहा जाएगा.