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साउथ कोरिया का नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग में आता है उनका धमाकेदार K-Pop, गजब के K-Dramas और उनकी सख्त मिलिट्री सर्विस rule. यहां के हर नौजवान को अपनी लाइफ के कुछ महीने आर्मी में बिताने ही पड़ते हैं. लेकिन जरा सोचिए अगर किसी यूथ को बॉर्डर पर जाने की जगह सैमसंग या एलजी जैसी टेक कंपनियों की AI लैब में बैठकर कोडिंग करने का मौका मिले और वही उसकी आर्मी ड्यूटी मान ली जाए? जी हां, पूरे 14 साल के लंबे इंतजार के बाद साउथ कोरिया की सरकार ने ऐसा ही एक धमाकेदार फैसला लिया है. लेकिन इस फैसले के साथ ही एक नई बहस भी छिड़ गई है कि क्या वाकई में ये स्कीम देश के युवाओं के काम आएगी या फिर कड़े नियमों के जाल में फंसकर रह जाएगी.
14 साल बाद क्या बदला है कोरिया का नियम?
साउथ कोरिया में कानून के मुताबिक हर काबिल इंसान को सेना में अपनी अनिवार्य सेवा देनी होती है. लेकिन साल 2013 में सरकार ने बड़ी प्राइवेट कंपनियों की रिसर्च लैब्स में इस सेवा को पूरा करने वाले रास्ते को पूरी तरह बंद कर दिया था. अब 14 साल बाद सरकार ने फैसला किया है कि 2027 से मास्टर और पीएचडी डिग्री वाले टेक रिसर्चर्स अपनी मिलिट्री ड्यूटी को सेना के कैंप में जाने के बजाय बड़ी कंपनियों की AI लैब्स में 3 साल काम करके पूरा कर सकते हैं. सरकार का सीधा मकसद यह है कि देश का बेस्ट AI टैलेंट विदेश न भागे और देश के अंदर ही रिसर्च मजबूत हो सके.
कितनी सीटें मिलेंगी और किसको मिलेगा फायदा?
इस नए अल्टरनेटिव सर्विस प्रोग्राम के तहत साल 2027 के लिए कुल 240 सीटें तय की गई हैं. इनमें से 120 सीटें सरकारी संस्थानों और डिफेंस से जुड़ी रिसर्च लैब्स के लिए रखी गई हैं. बाकी बची 120 सीटें देश की बड़ी-बड़ी प्राइवेट कंपनियों की AI लैब्स के लिए रिजर्व की गई हैं. यह प्रोग्राम 2027 से 2029 तक 3 साल के लिए लागू रहेगा. यानी टेक की पढ़ाई करने वाले यंग रिसर्चर्स के पास देश के सबसे बेहतरीन रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करते हुए अपनी मिलिट्री ड्यूटी पूरी करने का बहुत बड़ा मौका होगा.
क्यों उठ रहे हैं इस प्रोग्राम पर सवाल?
खबर तो बहुत बढ़िया लगती है लेकिन असली पेंच यहां की जमीनी हकीकत में फंसा हुआ है. हाल ही में आई कोरिया हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक जब कंपनियों से इस स्कीम के लिए आवेदन मांगे गए तो उम्मीद से बहुत कम रिस्पॉन्स मिला. 120 सीटों के मुकाबले सिर्फ 81 सीटों के लिए ही कंपनियों ने अपनी सिफारिश भेजी. यानी शुरुआत में ही 39 सीटें खाली रह गईं. जब 14 साल बाद यह मौका मिला था तो आखिर कंपनियों ने पूरी सीटों पर दावा क्यों नहीं ठोका? यही सवाल अब देश के एक्सपर्ट्स और यूथ को परेशान कर रहा है.
सरकारी नियमों की सख्त दीवार
इस पूरी कमी की सबसे बड़ी वजह सरकार के सख्त और कड़े नियम बताए जा रहे हैं. सरकार ने बड़ी प्राइवेट कंपनियों के सामने तीन बहुत मुश्किल शर्तें रख दी हैं. पहली शर्त यह है कि कंपनी को अपनी कुल कमाई का कम से कम 5 परसेंट हिस्सा रिसर्च और डेवलपमेंट यानी R&D पर खर्च करना होगा. दूसरी शर्त यह है कि कंपनी का काम किसी भी तरह से छोटी कंपनियों के बिजनेस से टकराना नहीं चाहिए. तीसरी शर्त यह है कि कंपनी को अपने रिसर्च वर्क के पक्के और साबित रिकॉर्ड देने होंगे. इन कड़े नियमों की वजह से कई दिग्गज टेक कंपनियां चाहकर भी इस स्कीम का फायदा नहीं उठा पा रही हैं.
कौन-सी बड़ी कंपनियां आईं आगे?
साइंस और ICT मिनिस्ट्री के डेटा के मुताबिक फिलहाल केवल चार बड़ी कंपनियों को ही इस प्रोग्राम के लिए रिकमेंड किया गया है. इनमें एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स, सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स, सैमसंग मेडिसन और एचडी हुंडई रोबोटिक्स जैसी बड़ी टेक जायंट्स शामिल हैं. इन चार कंपनियों ने अपनी 9 रिसर्च लैब्स के लिए कुल 81 रिसर्चर्स की मांग की है. हालांकि इन 81 सीटों पर भी अंतिम मुहर वहां का मिलिट्री मैनपावर एडमिनिस्ट्रेशन ही लगाएगा. यानी अभी यह भी तय नहीं है कि ये 81 यूथ भी लैब्स में पहुंच पाएंगे या नहीं.
क्या कहते हैं देश के नेता और एक्सपर्ट्स?
साउथ कोरिया की सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद ह्वांग जंग-आ ने इस मुद्दे पर यूथ की आवाज उठाई है. उनका कहना है कि 14 साल बाद देश के युवाओं को यह मौका मिला है जो कि एक बहुत अच्छी शुरुआत है. लेकिन सरकार के बनाए नियम इतने ज्यादा कठोर हैं कि इसका फायदा ज्यादातर युवाओं और कंपनियों को मिल ही नहीं पा रहा है. उन्होंने सरकार से मांग की है कि अगर देश को AI रेस में आगे रखना है और अपने टैलेंट को देश में ही रोककर रखना है तो इन नियमों में ढील देनी होगी ताकि ज्यादा से ज्यादा टेक यूथ इसका फायदा उठा सकें.
यूथ के फ्यूचर के लिए आगे क्या होगा?
साल 2027 में यह प्रोग्राम आधिकारिक तौर पर चालू होने वाला है. उससे पहले सरकार सभी चुनिंदा लैब्स और सीटों का फाइनल लिस्ट तैयार कर लेगी. लेकिन मौजूदा हालात को देखकर लगता है कि अगर सरकार ने अपने कड़े नियमों में थोड़ी ढील नहीं दी तो तय की गई 120 सीटें खाली ही रह जाएंगी. साउथ कोरिया का यूथ उम्मीद कर रहा है कि सरकार जल्द ही इस पेंच को सुलझाएगी ताकि AI रिसर्चर्स बिना किसी रुकावट के देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें और अपनी मिलिट्री सर्विस भी पूरी कर सकें.