साइंटिफिक मैगजीन 'द लांसेट' की एक बहुत ही डराने वाली रिपोर्ट सामने आई है. इस रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि अगर हमने वक्त रहते हालात नहीं संभाले, तो आने वाले कुछ दशकों में यानी साल 2100 तक इस धरती से इंसानियत का नामोनिशान मिट सकता है.
साल 2100 तक खत्म हो जाएगी इंसानियत?
द गार्जियन की खबर के मुताबिक, प्रसिद्ध मेडिकल और साइंटिफिक जर्नल 'द लांसेट' (The Lancet) के एक कमीशन ने ग्लोबल खतरों को लेकर अपनी लेटेस्ट स्टडी पब्लिश की है. इस पूरी रिपोर्ट में दुनिया भर के 35 जाने-माने एक्सपर्ट्स ने मिलकर अगले 75 सालों में इंसानों के सामने आने वाले 17 सबसे बड़े खतरों की एक लंबी लिस्ट बनाई है. वैज्ञानिकों का साफ कहना है कि आज दुनिया के नेता जो फैसले लेंगे, वही तय करेंगे कि आने वाली पीढ़ियों की सेहत और जिंदगी कैसी होगी. इस गंभीर रिपोर्ट को जर्मनी के बर्लिन में होने वाले वर्ल्ड हेल्थ समिट में भी दुनिया के सामने रखा जा रहा है.

खतरनाक AI और परमाणु युद्ध का साया
वैज्ञानिकों ने इस लिस्ट की शुरुआत में दो ऐसे खतरों को रखा है जो पलक झपकते ही पूरी दुनिया को राख बना सकते हैं. पहला खतरा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का गलत इस्तेमाल, जिसके जरिए खतरनाक बायोवेपन्स यानी जैविक हथियार बनाए जा सकते हैं. वहीं दूसरा सबसे बड़ा खतरा परमाणु युद्ध का है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि भले ही आज के समय में इन दोनों की आशंका कम लगती है, लेकिन अगर कभी परमाणु युद्ध हुआ तो उससे निकलने वाला ज़हरीला धुआं और धूल आसमान में सूरज की रोशनी को पूरी तरह ढंक लेंगे. इससे धरती पर भयंकर 'परमाणु अकाल' आ जाएगा. इसी तरह, बेलगाम AI से तैयार किए गए खतरनाक वायरस या हथियार पूरी मानव जाति को एक झटके में खत्म करने की ताकत रखते हैं. लांसेट की टीम ने चेतावनी दी है कि अगर ये खतरे सच साबित हुए, तो यह किसी महाप्रलय से बिल्कुल कम नहीं होगा.
17 बड़े खतरे और उनके गंभीर परिणाम
इन सभी खतरों का गहराई से आंकलन करने के लिए वैज्ञानिकों ने 'Dalys' (यानी बीमारी, विकलांगता या समय से पहले मौत की वजह से गंवाए गए स्वस्थ साल) का हिसाब लगाया है. परमाणु और AI के अलावा जिन अन्य बड़े विनाशकारी खतरों को इस लिस्ट में जगह मिली है, उनमें वायु प्रदूषण, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (यानी शरीर पर दवाइयों का असर बंद होना), बच्चों में कुपोषण, जलवायु परिवर्तन, पारंपरिक युद्ध, अंतरराष्ट्रीय हेल्थ फंड में कटौती, ज्यादा शराब पीना, हाई ब्लड प्रेशर, आर्थिक असमानता, कम शिक्षा, प्राकृतिक महामारियां, मोटापा, मानसिक तनाव, स्मोकिंग और उम्र से जुड़ी अनहेल्दी दिक्कतें शामिल हैं.

अमीर और गरीब देशों पर अलग-अलग असर
इस रिपोर्ट में बहुत दिलचस्प बात सामने आई है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में खतरे भी अलग किस्म के हैं. जैसे, अमीर देशों में मोटापा और खराब मेंटल हेल्थ जैसी बीमारियां सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुकी हैं, जबकि गरीब और विकासशील देशों में शिक्षा की कमी और बच्चों का कुपोषण मुख्य समस्याएं हैं. इसके अलावा, पिछले एक साल में अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कई अमीर देशों ने दूसरे देशों को दी जाने वाली मेडिकल और आर्थिक मदद में भारी कटौती की है. रिपोर्ट बताती है कि इस तरह की कटौती से साल 2100 तक करीब 1.5 अरब स्वस्थ साल बर्बाद हो जाएंगे, और इसका सबसे भयंकर असर सब-सहारा अफ्रीका पर पड़ेगा.
क्या अभी भी बचने का कोई रास्ता है?
सबसे अच्छी बात यह है कि वैज्ञानिक सिर्फ लोगों को डरा नहीं रहे हैं, बल्कि उनका कहना है कि इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए हमारे पास रास्ते मौजूद हैं. उदाहरण के लिए, अगर दुनिया मिलकर ग्लोबल वार्मिंग को बहुत ज्यादा बढ़ने से रोक ले और तापमान को तय सीमा में रखे, तो अरबों स्वस्थ सालों को बचाया जा सकता है. यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के प्रोफेसर क्रिस्टोफर मरे का कहना है कि हमारा मकसद किसी को डराना नहीं है, बल्कि दुनिया के नेताओं को यह समझाना है कि अगर वे आज सही कदम उठाएंगे, तो आने वाले कल को पूरी तरह बदला जा सकता है.
सरकारों को उठानी होगी बड़ी जिम्मेदारी
स्टडी लिखने वाले एक्सपर्ट्स ने दुनिया भर के हुक्मरानों से अपील की है कि वे किसी बड़ी आफत के आने का इंतजार न करें. सरकारों को चाहिए कि वे समय रहते नई टेक्नोलॉजी में समझदारी से निवेश करें और अपनी हेल्थ सिस्टम को मजबूत बनाएं. शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगता था कि दुनिया के सामने सिर्फ तीन ही बड़े खतरे हैं- युद्ध, जलवायु और महामारियां. लेकिन अब इनका दायरा बहुत बड़ा हो चुका है. इसलिए सरकारों को चाहिए कि वे इन तमाम खतरों से निपटने के लिए पहले से ही पूरी तैयारी रखें और अपनी तिजोरी का एक हिस्सा इनकी रोकथाम के लिए समर्पित करें.