अगर कोई आपसे कहे कि जो घटना आपको अपनी आंखों से याद है, वह असल में कभी हुई ही नहीं थी और उसे किसी मशीन ने आपके दिमाग में प्लांट कर दिया है, तो क्या आपको अपनी ही याददाश्त पर शक नहीं होगा. एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसमें रिसर्चर्स ने चेतावनी दी है कि AI द्वारा बनाई गई फेक तस्वीरें, वीडियो और चैटबॉट के मैसेज इंसानों के दिमाग को पूरी तरह से कन्फ्यूज कर रहे हैं. सबसे डरावनी बात यह है कि हमें पहले से पता होता है कि यह चीज मशीन या AI ने बनाई है, फिर भी हमारा दिमाग उस पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेता है. आइए जानते हैं कि यह नया मानसिक खेल कैसे खेला जा रहा है.
MIT की रिसर्च में हुआ खुलासा
एमआईटी की वैज्ञानिक पैटी मेस ने हाल ही में कुछ ऐसे आंकड़े शेयर किए हैं जिन्होंने सबको हैरान कर दिया है. उनकी टीम ने एक स्टडी की, जिसमें लोगों को कुछ आम तस्वीरें दिखाई गईं. कुछ समय के बाद, कुछ लोगों को वही असली तस्वीरें दिखाई गईं जबकि कुछ अन्य लोगों को AI द्वारा एडिट की गई नकली तस्वीरें दिखाई गईं. जब बाद में उन लोगों की याददाश्त की परीक्षा ली गई, तो जिन लोगों ने AI से बदली हुई तस्वीरें देखी थीं, उन्होंने असली तस्वीरों को भी गलत याद रखा. इससे भी बुरा यह रहा कि वे लोग अपनी इन झूठी यादों पर भरोसा कर रहे थे कि वही सच है.
चैटबॉट से बात करने पर क्यों बदल जाती है याददाश्त
एमआईटी मीडिया लैब की एक दूसरी स्टडी से यह बात सामने आई है कि सिर्फ किसी जनरेटिव AI चैटबॉट से बातचीत करना भी आपके दिमाग के साथ खिलवाड़ कर सकता है. जिन लोगों से AI चैटबॉट ने सवाल-जवाब किए, उनके दिमाग में बिना AI से बात करने वाले लोगों के मुकाबले तिगुनी मात्रा में झूठी यादें बन गईं. इसका मतलब यह है कि AI का इंटरफेस इतना प्यारा और कॉन्फिडेंट होता है कि हमारा दिमाग उसकी हर बात को सच मान लेता है, भले ही वह असलियत से कोसों दूर हो.
चेतावनी के बावजूद क्यों काम नहीं करते वार्निंग लेबल्स
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की एक अलग स्टडी में यह देखा गया कि AI द्वारा तैयार किए गए टेक्स्ट समरी इंसानों को कैसे प्रभावित करते हैं. स्टडी में पाया गया कि जब लोगों ने किसी वीडियो का भ्रामक AI समरी पढ़ा, तो ट्रैफिक साइन जैसी साधारण सी बात को याद रखने की उनकी क्षमता 83.6 प्रतिशत से गिरकर सिर्फ 44.8 प्रतिशत रह गई. आप सोच रहे होंगे कि अगर किसी फोटो या टेक्स्ट पर यह चेतावनी लिख दी जाए कि यह AI से बना है, तो हमारा दिमाग सुरक्षित रहेगा. लेकिन रिसर्चर्स ने यह पाया कि चेतावनी साफ-साफ लिखे होने के बावजूद लोगों के दिमाग में झूठी यादें बनने से नहीं रुक पाईं. इसके अलावा दूसरी स्टडीज में यह भी साबित हो चुका है कि AI डीपफेक वीडियो राजनीति से जुड़े झूठे स्कैंडल खड़े कर सकते हैं और लोगों के वोटिंग करने के प्लान तक को बदल सकते हैं.
इंसानी दिमाग की कमजोरी का फायदा उठा रहा है AI
इंसानों की याददाश्त हमेशा से थोड़ी कमजोर और आसानी से प्रभावित होने वाली रही है, इस बात को मनोवैज्ञानिक 19वीं सदी से जानते हैं. लेकिन जनरेटिव AI ने इस समस्या को कई गुना बढ़ा दिया है क्योंकि AI बहुत ही आत्मविश्वास के साथ गलत जानकारियां देता है, जिसे तकनीकी भाषा में 'हैलुसिनेशन' कहा जाता है. आज कल बैंक, अस्पताल और मिलिट्री जैसी बड़ी जगहें तेजी से AI का इस्तेमाल कर रही हैं. वे वादा करती हैं कि सिस्टम में 'ह्यूमन इन द लूप' यानी इंसान हमेशा मौजूद रहेगा जो AI के काम को चेक करेगा. लेकिन रिसर्च बताती है कि AI के सामने इंसान भी सिक्का उछालने जैसी स्थिति में आ जाता है. हमारी कमजोर याददाश्त और भरोसेमंद दिखने वाले AI की वजह से बड़े-बड़े एक्सपर्ट्स भी इसके धोखे में आ जाते हैं.
असल दुनिया में हो चुके हैं खतरनाक हादसे
जब तक वैज्ञानिक इस मानसिक कमजोरी का कोई पक्का इलाज ढूंढ रहे हैं, तब तक टेक कंपनियां बिना इंसानों के पूरी तरह से ऑटोमैटिक AI सिस्टम बनाने की दौड़ में लगी हुई हैं. बिना सवाल किए AI पर भरोसा करने के रिजल्ट पहले ही बहुत भयानक रूप में सामने आ चुके हैं. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, यह हमला इसलिए हुआ क्योंकि वहां के सिस्टम ने पुराने और गलत डेटा का इस्तेमाल करने वाले एक AI टूल पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया था और स्कूल को दुश्मन का ठिकाना मान लिया था.