SOCIAL MEDIA

Newsletter

PARTNER SITES
Select language

क्या है 3 GHz स्पेक्ट्रम का चक्कर? जानिए 2030 तक भारत को 6G का 'ग्लोबल बॉस' बनाने में क्यों आ रही है बड़ी चुनौती

India Mobile Congress 2026 में GSMA की स्पेक्ट्रम हेड लुसियाना कमरगोस ने बड़ा खुलासा किया है. AI और भारी डेटा डिमांड की वजह से भारत को 6G के लिए 3 GHz स्पेक्ट्रम की जरूरत होगी, जो दुनिया के औसत से ज्यादा है. जानिए 6G और AI का एक्सप्लेनर और भारत के 6G लीडर बनने का पूरा प्लान.

Written By Mohit Chaturvedi
Published: Oct 08, 2026, 10:02 AM IST | Updated: Oct 08, 2026, 10:05 AM IST
Image Credit: 6G
Join

दिल्ली में चल रहे इंडिया मोबाइल कांग्रेस (IMC) 2026 से एक बड़ी खबर निकलकर सामने आई है. ग्लोबल टेलीकॉम बॉडी GSMA की स्पेक्ट्रम हेड लुसियाना कमरगोस का मानना है कि आने वाले दिनों में भारत को 6G सर्विस चलाने के लिए दुनिया के बाकी मुल्कों के मुकाबले कहीं ज्यादा स्पेक्ट्रम की जरूरत पड़ने वाली है. अब सवाल उठता है कि आखिर ये स्पेक्ट्रम है क्या? AI का इससे क्या लेना-देना है और आम आदमी की जेब या मोबाइल एक्सपीरियंस पर इसका क्या फर्क पड़ने वाला है?

क्या होता है स्पेक्ट्रम?
जब भी 4G, 5G या 6G की बात होती है, तो 'स्पेक्ट्रम' शब्द बार-बार सुनने को मिलता है. अगर इसे एकदम देसी अंदाज में समझें, तो स्पेक्ट्रम हवा में बना वो अदृश्य हाईवे है जिस पर आपका सारा इंटरनेट डेटा दौड़ता है. आपके फोन से जाने वाले मैसेज, रील्स, कॉल और वीडियो इस हाईवे की गाड़ियां हैं. अब जाहिर सी बात है कि अगर सड़क पतली होगी और गाड़ियां ज्यादा, तो ट्रैफिक जाम लगेगा ही और आपका इंटरनेट स्लो हो जाएगा. वहीं अगर सड़क चौड़ी होगी, तो गाड़ियां बिना किसी ब्रेक के सरपट दौड़ेंगी. बस इसी सड़क की चौड़ाई को स्पेक्ट्रम कहा जाता है. स्पेक्ट्रम जितना ज्यादा होगा, आपकी इंटरनेट स्पीड और नेटवर्क की ताकत उतनी ही जबरदस्त होगी.

भारत को दुनिया से ज्यादा स्पेक्ट्रम की जरूरत क्यों है?
GSMA की स्पेक्ट्रम हेड लुसियाना कमरगोस ने IMC 2026 में गणित समझाते हुए बताया कि 2030 तक जब दुनिया में 6G पांव पसार रहा होगा, तब ज्यादातर देशों का काम 2 से 2.5 GHz (गीगाहर्ट्ज) मिड-बैंड स्पेक्ट्रम में चल जाएगा. लेकिन भारत की कहानी बिल्कुल अलग है. भारत को 6G के लिए कम से कम 3 GHz स्पेक्ट्रम की सख्त जरूरत होगी.

140 करोड़ की आबादी: हम दुनिया के सबसे बड़े टेलीकॉम मार्केट में से एक हैं.

वाई-फाई नहीं, मोबाइल डेटा पर टिके हम: भारत में ब्रॉडबैंड या वाई-फाई के मुकाबले लोग मोबाइल नेटवर्क पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं. यहां हर दूसरा यूजर रोजाना जीबी के हिसाब से डेटा उड़ाता है.

AI के आने से नेटवर्क पर क्यों बढ़ा भारी दबाव?
बहुत से लोगों को लग रहा था कि AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आने से सब कुछ ऑटोमैटिक हो जाएगा और कम स्पेक्ट्रम में भी नेटवर्क मजे से चलेगा. पर हकीकत इसके बिल्कुल उलट निकली. ChatGPT जैसे AI टूल्स, वॉइस असिस्टेंट, फोटो-वीडियो जनरेटर और लाइव ट्रांसलेशन ऐप्स पलक झपकते ही भारी-भरकम डेटा खींचते हैं. जब देश के करोड़ों लोग एक साथ अपने फोन में AI फीचर्स इस्तेमाल करते हैं, तो मोबाइल टावरों पर अचानक लोड कई गुना बढ़ जाता है. GSMA का साफ कहना है कि AI नेटवर्क को स्मार्ट जरूर बनाएगा, लेकिन इस बढ़ती डेटा की भूख को शांत करने के लिए सरकारों को नया और बड़ा स्पेक्ट्रम देना ही पड़ेगा.

6G और AI का कनेक्शन
GSMA एक्सपर्ट्स के मुताबिक 6G और AI का रिश्ता 'गिव एंड टेक' वाला है. यानी दोनों एक-दूसरे पर पूरी तरह निर्भर हैं.

AI संभालेगा 6G का नेटवर्क: AI यह तय करेगा कि किस यूजर को कितना डेटा मिले, ट्रैफिक कहां ज्यादा है और स्पेक्ट्रम का सही बंटवारा कैसे हो.

6G देगा AI को सुपरस्पीड: फ्यूचर के गैजेट्स जैसे AI स्मार्ट ग्लासेस, बिना ड्राइवर वाली कारें और रोबोट्स बिना रुके तभी काम कर पाएंगे, जब उन्हें 6G जैसी रॉकेट स्पीड मिलेगी.

सरकार और TRAI के सामने क्या है सबसे बड़ी चुनौती?
3 GHz स्पेक्ट्रम का इंतजाम करना चुटकी बजाने जितना आसान नहीं है. 6G के लिए 1 GHz से 8 GHz के बीच की फ्रीक्वेंसी सबसे परफेक्ट मानी जा रही है. लेकिन असली पेंच यह है कि यह स्पेक्ट्रम खाली नहीं पड़ा है; इस पर पहले से ही डिफेंस (सेना), सैटेलाइट और टीवी चैनल अपनी सेवाएं चला रहे हैं.

अब भारतीय रेगुलेटर्स (TRAI और DoT) के सामने सबसे बड़ा टास्क यह है कि पुरानी सेवाओं को डिस्टर्ब किए बिना 6G के लिए स्पेक्ट्रम कैसे खाली कराया जाए. 2027 में होने वाली वर्ल्ड रेडियोकम्यूनिकेशन कॉन्फ्रेंस (WRC-27) में 4.5 GHz और 6-7 GHz जैसे मुख्य बैंड्स पर ग्लोबल लेवल पर बड़ा फैसला लिया जाएगा.

टेलिकॉम कंपनियों को चाहिए साफ रोडमैप
GSMA ने सभी सरकारों से कहा है कि वे स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट को लेकर एक क्लियर टाइमलाइन जारी करें. रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया जैसी टेलिकॉम कंपनियों को पहले से पता होना चाहिए कि उन्हें स्पेक्ट्रम कब, कैसे और किस कीमत पर मिलने वाला है. अगर रोडमैप साफ होगा, तो कंपनियां अपने नए टावर, AI इक्विपमेंट्स और 6G इंफ्रास्ट्रक्चर में सही वक्त पर पैसा इन्वेस्ट कर पाएंगी. इससे जब 6G आधिकारिक तौर पर लॉन्च होगा, तो यूजर्स को पहले ही दिन से बिना किसी रुकावट के मक्खन जैसी स्पीड मिल सकेगी.

भारत कब बनेगा 6G का ग्लोबल लीडर?
दुनिया भर के प्रमुख देशों में 6G नेटवर्क की शुरुआत 2030 के आसपास होने की उम्मीद है. अगर भारत को 6G में दुनिया का लीडर बनना है, तो भारत को भी इसी टाइमलाइन पर आगे बढ़ना होगा. GSMA के मुताबिक भारत का 'मोबाइल-फर्स्ट' माहौल बहुत मजबूत है. भारत का यूथ नई टेक्नोलॉजी को बहुत तेजी से अपनाता है. 2035 से 2040 के बीच भारत में 6G स्पेक्ट्रम की मांग अपने चरम (Peak) पर होगी. अगर भारत समय रहते 3 GHz स्पेक्ट्रम उपलब्ध करा देता है, तो भारत को दुनिया की टेक सुपरपावर बनने से कोई नहीं रोक सकता.

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

मोहित चतुर्वेदी डिजिटल न्यूज मीडिया में 16 से अधिक वर्षों का एक्सपीरियंस रखने वाले एक वरिष्ठ टेक जर्नलिस्ट हैं, जो वर्तमान में Zee News में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के रूप में टेक्नोलॉजी सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं. स्मार्टफोन रिव्यू, गैजेट एनालिसिस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा में गहरी विशेषज्ञता रखने वाले मोहित ने Apple, Samsung, OnePlus, Vivo और Xiaomi जैसे टॉप ब्रांड्स के फ्लैगशिप डिवाइसों का गहन और निष्पक्ष इन-डेप्थ रिव्यू किया है. अंतरराष्ट्रीय टेक इवेंट्स की ऑन-ग्राउंड रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव रखने वाले मोहित ने लंदन में 'Nothing Phone' और आयरलैंड के बेलफास्ट में 'Realme' के ग्लोबल लॉन्च इवेंट्स को कवर किया है, और इससे पहले वे NDTV, आजतक और दैनिक भास्कर जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में टेक जर्नलिज्म और डिजिटल कंटेंट स्ट्रेटेजी में अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं. जटिल तकनीकी बारीकियों को बेहद आसान भाषा में डिकोड करने के लिए पहचाने जाने वाले मोहित से सीधे Mohit.chaturvedi@zeemedia.com पर ईमेल के जरिए या उनके एक्स और इंस्टाग्राम हैंडल्स पर कनेक्ट किया जा सकता है.
Read More

ZEENEWS TRENDING STORIES