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टेक वर्ल्ड में 15 सालों तक राज करने के बाद Tim Cook ने आखिरकार Apple की कमान नए हाथों में सौंप दी है. जॉन टर्नस (John Ternus) अब दुनिया की सबसे कीमती और बड़ी टेक कंपनी Apple के नए कप्तान यानी CEO बन चुके हैं. लेकिन बॉस की कुर्सी पर बैठते ही उन्हें गिफ्ट में मिली है एक बहुत बड़ी टेंशन, जिसने Apple के हेडक्वार्टर में सबकी नींद उड़ा रखी है.
पिछले 3 सालों से Siri को स्मार्ट बनाने के चक्कर में Apple बुरी तरह पिछड़ गया है. इस AI की रेस में Google, Samsung और ChatGPT बनाने वाली OpenAI काफी आगे निकल चुके हैं. Apple ने जब अपना "Apple Intelligence" पेश किया था, तो लोगों को उससे काफी उम्मीदें थीं, लेकिन वो फ्लॉप साबित हुआ और इंटरनेट पर लोगों ने उसकी काफी खिल्ली भी उड़ाई.
अब 9 सितंबर को Apple का बहुत बड़ा लॉन्च इवेंट है और ठीक एक हफ्ते पहले जॉन टर्नस को CEO बना दिया गया है. उनके पास खुद को साबित करने के लिए सालों का टाइम नहीं है, बस कुछ ही हफ्ते हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है कि जो बंदा जिंदगी भर आईफोन के पार्ट्स और हार्डवेयर बनाता आया है, क्या वो Apple के इस सबसे बड़े सॉफ्टवेयर और AI के लोचे को सॉल्व कर पाएगा?
15 साल बाद बदला बॉस, लेकिन साथ आया कंपनी का सबसे बड़ा संकट
Tim Cook ने 15 साल तक Apple को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, रिकॉर्डतोड़ आईफोन बेचे और कंपनी को पैसों की तिजोरी बना दिया. लेकिन जब उन्होंने कमान John Ternus को सौंपी, तो जश्न मनाने का टाइम ही नहीं मिला.
Apple पिछले तीन सालों से Siri को समझदार बनाने में लगा था ताकि वो Google Assistant या ChatGPT की तरह बातें समझ सके. लेकिन Apple इसमें पूरी तरह नाकाम रहा. इसी बीच Samsung ने अपने फोन्स में धांसू AI फीचर्स दे दिए और Google ने अपने Gemini AI से मार्केट में हलचल मचा दी.
अब 9 सितंबर वाले इवेंट में Apple अपनी नई Siri लॉन्च करने वाला है, जिसके अंदर Google Gemini का दिमाग लगा होगा. यह इवेंट तय करेगा कि नए CEO जॉन टर्नस की शुरुआत धमाकेदार होगी या फिर पहले ही राउंड में उनका गेम बजा जाएगा.
कौन हैं John Ternus और Apple के बोर्ड ने उन पर दांव क्यों लगाया?
John Ternus कोई बाहर से लाए गए हाई-प्रोफाइल बंदे या वॉल स्ट्रीट के फेवरेट नेता नहीं हैं. वह पिछले 25 सालों से चुपचाप Apple में काम कर रहे कंपनी के सच्चे वफादार हैं. 51 साल के जॉन टर्नस ने 2001 में Apple जॉइन किया था. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है.
उनका करियर ग्राफ एकदम सॉलिड रहा है. 2013 में वो हार्डवेयर इंजीनियरिंग के VP बने और 2021 में प्रमोट होकर Senior VP बन गए. Apple के इतिहास में वो सिर्फ 5वें CEO हैं. आपके हाथ में जो iPhone, iPad, Mac या Apple Watch है, उसे डिजाइन करने और बनाने के पीछे टर्नस का ही दिमाग रहा है. ऑफिस के लोग उन्हें बहुत पसंद करते हैं क्योंकि वो काम से काम रखते हैं और टेक की गहरी समझ रखते हैं.
लेकिन यहां एक बड़ा पेच है. टर्नस हार्डवेयर के मास्टर हैं, लेकिन AI या सॉफ्टवेयर के गुरु नहीं हैं. Apple के बोर्ड ने टिम कुक की तरह ही एक दांव खेला है. टिम कुक भी ऑपरेशन्स के बंदे थे और उन्होंने कंपनी को सुपरहिट बनाया. लेकिन कुक के पास टाइम था, टर्नस के पास टाइम बिल्कुल नहीं है. निवेशकों के सवाल शुरू होने से पहले उनके पास सिर्फ कुछ हफ्तों का वक्त है.
Google Gemini से हाथ मिलाया: 1 अरब डॉलर की सीक्रेट डील!
CEO बनते ही टर्नस के सामने एक ऐसा फैसला आया जो वैसे तो टिम कुक की पुरानी टीम ने लिया था, लेकिन इसने पूरी टेक इंडस्ट्री को चौंका दिया. Apple हमेशा इस बात पर घमंड करता है कि वो अपनी हर तकनीक (चिप, सॉफ्टवेयर, डिजाइन) खुद बनाता है और किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता. लेकिन Siri का कचरा होने के बाद Apple को अपनी इज्जत बचाने के लिए गूगल का AI किराए पर लेना पड़ा.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, Apple अपने सबसे बड़े दुश्मन Google को हर साल करीब 1 अरब डॉलर (लगभग 8,300 करोड़ रुपये) देगा. इसके बदले में Apple को Google Gemini के उस 1.2 ट्रिलियन पैरामीटर वाले पावरफुल AI मॉडल का एक्सेस मिलेगा, जो Apple के खुद के AI से 8 गुना ज्यादा ताकतवर है.
यह डील कई सालों के लिए है और Google को इससे करीब 5 अरब डॉलर की कमाई हो सकती है. मजेदार बात यह है कि Google पहले से ही आईफोन में अपना सर्च इंजन डिफॉल्ट रखने के लिए Apple को हर साल 20 अरब डॉलर देता है. अब उल्टी गंगा बह रही है और Apple को AI के लिए गूगल को पैसे चुकाने पड़ रहे हैं.
किराए का AI: स्मार्ट चाल या मजबूरी का सौदा?
कहा जा रहा है कि यह डील बस कुछ टाइम के लिए है, जब तक Apple का अपना AI तैयार नहीं हो जाता. लेकिन सच तो यह है कि Apple इस रेस में काफी पीछे छूट चुका है. अब कहने को तो फोन में "Apple Intelligence" होगा, लेकिन असल में उसके पीछे दिमाग Google का ही चल रहा होगा.
यह स्थिति Apple जैसी प्रीमियम कंपनी के लिए खतरे की घंटी है:
- दुश्मन पर निर्भरता: अगर आपकी कार में इंजन ही आपके सबसे बड़े कॉम्पिटिटर का लगा है, तो कंट्रोल किसके पास हुआ? Siri के सारे एडवांस काम अब गूगल के भरोसे हैं.
- कानूनी झमेले: यूरोपियन यूनियन (EU) की नजर इस डील पर पड़ चुकी है. वो जांच कर सकते हैं कि Google और Apple का यह गठजोड़ कहीं मार्केट का माहौल खराब तो नहीं कर रहा.
- ब्रांड इमेज को झटका: Apple हमेशा कहता आया है कि उसका प्राइवेसी और टेक्नोलॉजी पर 100% कंट्रोल होता है. किराए का AI इस्तेमाल करने से उसकी इस साख को धक्का लगा है.
9 सितंबर का इवेंट: नए कप्तान की पहली और सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा
John Ternus के पास अपनी बात साबित करने के लिए ज्यादा टाइम नहीं बचा है. अगर Apple अपने दम पर AI बनाएगा, तो उसमें सालों लगेंगे और तब तक हर साल गूगल को अरबों डॉलर देने होंगे.
एक ऐसा बंदा जिसने अपनी पूरी लाइफ आईफोन की स्क्रीन, बॉडी और चिप्स बनाने में बिताई हो, उसे अब यह साबित करना है कि वो AI जैसी मुश्किल चीज को भी संभाल सकता है. 9 सितंबर को जब जॉन टर्नस स्टेज पर आएंगे, तो वो सिर्फ नया आईफोन पेश नहीं कर रहे होंगे, बल्कि पूरी दुनिया को यह दिखा रहे होंगे कि क्या वो किराए के AI के दम पर भी Apple को नंबर-1 बनाए रख सकते हैं या नहीं.