सांसों पर पहरा, चेहरे पर कैमरा... चेहरा देखते ही खुल जाएगी पूरी कुंडली! ड्रोन, रूफटॉप स्पॉटर्स और AI कैमरों के पहरे में कैसे घिरी दिल्ली?
दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने 35,000 से अधिक जवानों के साथ-साथ आसमान में ड्रोन, छतों पर स्पॉटर्स, वर्दी पर बॉडी कैम और चप्पे-चप्पे पर AI फेशियल रिकग्निशन कैमरों (FRS) का हाई-टेक जाल बिछाया, जो सेकंडों में चेहरों को स्कैन कर डेटाबेस से मैच कर लेते हैं. आइए जानते हैं क्या है यह टेक्नोलॉजी...
दिल्ली एक बार फिर विरोध प्रदर्शनों और नारों का केंद्र बना. चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और इलेक्टोरल रोल्स के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के खिलाफ प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए. 35,000 से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती, लाठी-डंडों से लैस जवान और छह अलग-अलग स्टेडियमों को डिटेंशन सेंटर बनाने जैसी खबरें तो आम हैं, लेकिन इस बार सबसे ज्यादा चर्चा सुरक्षा में इस्तेमाल हो रहे AI सर्विलांस (AI Surveillance) और हाई-टेक टेक्नोलॉजी की है.
प्रदर्शन स्थल पर सिर्फ पुलिस बल ही तैनात नहीं है, बल्कि आसमान में उड़ते ड्रोन, इमारतों की छतों पर बैठे रूफटॉप स्पॉटर्स (Rooftop Spotters), पुलिसकर्मियों की वर्दी पर लगे बॉडी कैम (Body-worn Cameras), और चप्पे-चप्पे पर नजर रखते AI इनेबल्ड फेसिअल रिकग्निशन कैमरे (FRS Cameras) का एक अभेद्य जाल बिछाया गया है.
लेकिन सवाल यह है कि यह AI कैमरा टेक्नोलॉजी कैसे काम करती है? एक कैमरा भीड़ में खड़े सैकड़ों लोगों के बीच से किसी एक व्यक्ति का चेहरा कैसे पहचान लेता है? बॉडी कैम का क्या मकसद है और प्रदर्शनकारियों को इससे प्राइवेसी का डर क्यों सता रहा है?
दिल्ली बनी हाई-टेक छावनी: क्या-क्या था सुरक्षा में?
जंतर-मंतर पर होने वाले इस प्रदर्शन को कंट्रोल करने के लिए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के 35,000 से ज्यादा जवान तैनात किए गए थे. इसके अलावा सिक्योरिटी अरेंजमेंट को मजबूत करने के लिए कई मॉर्डन टेक्नोलॉजी का एक साथ इस्तेमाल किया गया:
ड्रोन कैमरे: हवा में उड़ते हुए ड्रोन आसमान से पूरे इलाके की पल-पल की फुटेज और भीड़ के मूवमेंट को ट्रैक कर रहे थे.
रूफटॉप स्पॉटर्स: ऊंची इमारतों की छतों पर विशेष जवानों को दूरबीन और हाई-जूम कैमरों के साथ तैनात किया गया था ताकि दूर की हर हरकत पर नजर रखी जा सके.
बॉडी-वर्न कैमरे: पुलिसकर्मियों की वर्दी पर छोटे कैमरे लगे थे.
AI फेशियल रिकग्निशन कैमरे: हर मुख्य रास्ते और चौराहे पर ऐसे स्मार्ट कैमरे लगाए गए थे जो किसी भी शख्स के गुजरते ही उसके चेहरे को स्कैन कर सकते थे.
AI कैमरा और फेस रिकग्निशन सिस्टम (FRS) क्या है?
आम सीसीटीवी कैमरे सिर्फ वीडियो रिकॉर्ड करते हैं. अगर पुलिस को किसी खास शख्स को ढूंढना हो, तो उन्हें घंटों पुरानी फुटेज बैठकर देखनी पड़ती है. लेकिन AI कैमरे स्मार्ट होते हैं. इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल होता है, जिससे ये खुद सोच और समझ सकते हैं.
दिल्ली पुलिस के पास इस समय देश का सबसे बड़ा AI सर्विलांस नेटवर्क है, जिसमें लगभग 25,000 सीसीटीवी कैमरे जुड़े हुए हैं. हाल ही में 'सेफ सिटी प्रोजेक्ट' के तहत इसमें 2,100 से ज्यादा एडवांस AI कैमरे और जोड़े गए हैं. यह पूरा सिस्टम दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर में बने C4I सेंटर से कंट्रोल होता है.
AI कैमरे सिर्फ चेहरा ही नहीं पहचानते, बल्कि ये काम भी करते हैं:
भीड़ गिनना: भीड़ कितनी घनी हो रही है, यह AI अपने आप भांप लेता है.
हाथों के इशारे पढ़ना: अगर कोई शख्स भीड़ में पत्थर उठाने या कोई आक्रामक इशारा करने की कोशिश करता है, तो AI उसे तुरंत पकड़ लेता है.
गाड़ियों के नंबर पढ़ना: गुजरने वाली हर गाड़ी का नंबर स्कैन करके उसकी पूरी कुंडली स्क्रीन पर ले आता है.
फेस रिकग्निशन कैमरा आपका चेहरा कैसे पढ़ता है?
जब आप कैमरे के सामने से गुजरते हैं, तो AI आपके चेहरे को किसी इंसान की तरह 'सुंदर या गोरा' नहीं देखता. वह आपके चेहरे को मैथ्स और नंबर्स (Geometric Shapes) में बदल देता है. यह काम 4 स्टेप्स में होता है:
1. फेस डिटैक्शन: कैमरा भीड़ में से इंसानी चेहरे को अलग करता है (यानी दीवार, पेड़ और इंसान में फर्क समझता है).
2. नोडल पॉइंट्स की माप: हमारे चेहरे पर लगभग 80 खास पॉइंट्स होते हैं. AI आपकी दोनों आंखों के बीच की दूरी, नाक की चौड़ाई, गालों की बनावट और जॉलाइन के एंगल को तुरंत माप लेता है.
3. फेशियल प्रिंट: मापे गए इन सभी आंकड़ों को मिलाकर एक डिजिटल कोड (डिजिटल फिंगरप्रिंट) बना दिया जाता है. यह हर इंसान का अलग होता है.
4. डेटाबेस से मिलान: यह डिजिटल कोड पुलिस के पास मौजूद अपराधियों और संदिग्धों के डेटाबेस से सेकंडों में मिलाया जाता है.
80% मैच का नियम: एक आरटीआई के जवाब में पुलिस ने बताया था कि अगर लाइव चेहरे और डेटाबेस की फोटो में 80% या उससे ज्यादा समानता (Similarity Score) मिलती है, तो सिस्टम अलार्म बजा देता है. इसके बाद वहां बैठा पुलिसकर्मी खुद चेक करता है कि वो सही इंसान है या नहीं.
पुलिस के डेटाबेस में किसके चेहरे होते हैं?
इस सर्विलांस का सबसे बड़ा विवाद यही है कि AI कैमरे किसके डेटाबेस से चेहरा मैच कर रहे हैं? रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस के पास अलग-अलग समय पर 20,000 से लेकर 3.5 लाख तक रिकॉर्ड्स का डेटाबेस रहा है.
इसमें पुराने हिस्ट्रीशीटर, भगोड़े और कुछ मामलों में पुराने आंदोलनों के दौरान खींची गई तस्वीरों से तैयार की गई 'उपद्रवियों और प्रदर्शनकारियों' की सूचियां भी शामिल होती हैं. यह सिस्टम 10 लाख लोगों के बीच से भी चेहरा सिर्फ 0.2 सेकंड (200 मिलीसेकंड) में ढूंढ सकता है.
बॉडी कैम क्या है और यह क्यों लगाया जाता है?
प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों की छाती पर छोटे-छोटे कैमरे लगे होते हैं, जिन्हें बॉडी-वर्न कैमरा कहते हैं.
फीचर्स: ये कैमरे अंधेरे या रात में भी साफ HD वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं और इनका लेंस बहुत चौड़ा होता है (सामने की पूरी एक्टिविटी कवर होती है). यह वीडियो के साथ आवाज भी रिकॉर्ड करता है.
मकसद: पुलिस का कहना है कि अक्सर प्रदर्शनों के दौरान उन पर ज्यादती या बदसलूकी के झूठे आरोप लग जाते हैं. बॉडी कैम ऑन रहने से यह साफ हो जाता है कि असल में मौके पर क्या हुआ था. साथ ही, अगर कोई प्रदर्शनकारी पुलिस के साथ धक्का-मुक्की करता है, तो उसका भी पुख्ता सबूत रिकॉर्ड हो जाता है.
प्रदर्शनकारियों को इस AI तकनीक से डर क्यों लग रहा है?
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे कई छात्र और युवा इस निगरानी से डरे हुए नजर आए. कई लोग अपने चेहरों को गमछे या मास्क से ढकते दिखे. इसकी वजहें ये हैं:
करियर की चिंता: कई स्टूडेंट्स यूपीएससी या सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं. उनके मन में यह डर है कि अगर AI कैमरे ने उनका चेहरा 'प्रदर्शनकारी' के तौर पर सेव कर लिया, तो पुलिस वेरिफिकेशन में दिक्कत आ सकती है और भविष्य खराब हो सकता है.
प्राइवेसी और डेटा सेव रहना: सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस इन वीडियो और बायोमेट्रिक डेटा को अपने सर्वर में कितने दिनों तक संभाल कर रखेगी? इसको लेकर कोई साफ कानून नहीं है.
क्या भारत में यह पूरी तरह कानूनी है?
भारत में अभी तक फेस रिकग्निशन तकनीक (FRT) या पब्लिक सर्विलांस को कंट्रोल करने के लिए कोई डेडिकेटिड कानून नहीं है. हालांकि, 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act)' है, लेकिन उसमें सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को देश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के नाम पर छूट दी गई है.