)
क्या आप सोच सकते हैं कि आज से 1300 साल पहले लोग कैसे कपड़े पहनते थे? अगर नहीं, तो डेनमार्क की एक कब्र से निकला यह नया खजाना आपके होश उड़ा देगा. आर्किओलॉजिस्ट को एक वाइकिंग महिला की ऐसी ड्रेस मिली है जो सदियों पुरानी होने के बावजूद पूरी तरह खराब नहीं हुई. इस खोज ने इतिहास के पन्नों में एक नया रोमांच भर दिया है और वाइकिंग दौर के फैशन, लाइफस्टाइल और रहन-सहन के कई राज खोल दिए हैं.
1300 साल पुरानी वाइकिंग ड्रेस का अनोखा राज
डेनमार्क के पश्चिमी इलाके से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया के इतिहासकारों और युवाओं को हैरान कर दिया है. वर्दे शहर के पास स्कॉनेगर नाम की जगह पर वैज्ञानिकों को एक बहुत पुरानी कब्र मिली है. यह कब्र एक यंग वाइकिंग महिला की है जो आज से लगभग 1300 साल पहले रहती थी. सबसे कमाल की बात यह है कि इस कब्र से कपड़े के कुछ टुकड़े मिले हैं. आमतौर पर इतने सालों में मिट्टी के अंदर कपड़ा सड़कर खत्म हो जाता है, लेकिन इस केस में ऐसा नहीं हुआ. यह खोज वैज्ञानिकों के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं है, क्योंकि इससे हमें वाइकिंग काल की महिलाओं के पहनावे के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलेगा.
धातु के ब्रोच ने कैसे बचाया 13 सदी पुराना कपड़ा
आप सोच रहे होंगे कि आखिर 1300 साल तक यह कपड़ा मिट्टी में सुरक्षित कैसे रहा. इसका जवाब छुपा है उस महिला के साथ दफनाए गए दो खास मेटल के ब्रोच (पिन/गहने) में. यह ब्रोच तांबे या चांदी के बने हुए हैं, जिन्हें उस जमाने में महिलाएं अपने कपड़ों को सेट करने के लिए लगाती थीं. जब मिट्टी में ये मेटल ब्रोच धीरे-धीरे गलने लगे, तो इनमें से मेटल साल्ट निकले. इन केमिकल्स ने ब्रोच के आसपास मौजूद बैक्टीरिया को खत्म कर दिया. इसी वजह से कपड़े के धागे गलने से बच गए. मेटल के इसी अनोखे रिएक्शन के कारण 13 शताब्दियों के बाद भी कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़े वैज्ञानिक जांच के लिए बच गए.
कपड़ों की परतों में छिपा है वाइकिंग फैशन का ट्रेंड
एक्सपर्ट्स को ब्रोच के दोनों तरफ कपड़े के टुकड़े चिपके हुए मिले हैं. इसका मतलब बहुत इंटरेस्टिंग है. ब्रोच के एक तरफ मिला कपड़ा शायद उस महिला की ड्रेस की आउटर लेयर (बाहरी हिस्सा) का था. वहीं ब्रोच की दूसरी तरफ मिला कपड़ा उसके अंदर पहने जाने वाले कपड़ों का हिस्सा हो सकता है. फैब्रिक एक्सपर्ट्स की टीम अब इस कपड़े की गहराई से जांच कर रही है. वे यह देखना चाहते हैं कि उस दौर में धागे कैसे बनते थे, बुनाई का तरीका क्या था और कपड़ों की क्वालिटी कैसी थी. इससे हमें पता चलेगा कि 8वीं सदी में वाइकिंग महिलाएं कपड़े कैसे स्टाइल करती थीं.
पुश्तैनी गहने और परिवार की अनदेखी कहानी
इस खुदाई में मिले ब्रोच सिर्फ कपड़ों को बचाने का काम ही नहीं कर रहे, बल्कि वे एक फैमिली स्टोरी भी बता रहे हैं. रिसर्च में पाया गया कि महिला के साथ दफनाया गया एक ब्रोच कब्र में रखने से पहले रिपेयर किया गया था. इससे वैज्ञानिकों का मानना है कि यह कोई नया खरीदा गया सामान नहीं था, बल्कि उसके परिवार का एक कीमती गहना था जो पीढ़ियों से चला आ रहा था. वैज्ञानिक अब कपड़े और मेटल दोनों की रेडियोकार्बन डेटिंग कर रहे हैं, ताकि यह पक्का हो सके कि कपड़ा और गहने एक ही समय के हैं या नहीं.
वैज्ञानिक ढूंढ रहे हैं ड्रेस के असली रंग
क्या आप जानना चाहते हैं कि 1300 साल पहले वह वाइकिंग महिला किस कलर के कपड़े पहनती थी? वाइकिंग एज प्रोजेक्ट के फैब्रिक एक्सपर्ट्स उल्ला मैनरिंग और शार्लोट रिमस्टैड इसी काम में लगे हैं. वे कपड़े के टुकड़ों पर केमिकल टेस्ट कर रहे हैं ताकि उसमें इस्तेमाल की गई पुरानी डाइज या नेचुरल कलर्स के निशानों को पहचाना जा सके. अगर यह रिसर्च सफल रही, तो हमें पहली बार पता चलेगा कि वाइकिंग दौर में महिलाएं कौन-से ब्राइट या डार्क कलर्स पसंद करती थीं और उनकी ड्रेस दिखने में कैसी लगती थी.
दांत खोलेंगे बचपन और खान-पान के गहरे राज
इस रिसर्च की सबसे खास बात यह है कि वैज्ञानिक सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न डेनमार्क की टीम उस महिला के दांतों की स्टडी कर रही है. दांतों की जांच से यह पता लगाया जा सकता है कि वह महिला बचपन में कहां रहती थी, उसकी हेल्थ कैसी थी और वह क्या खाती-पीती थी. दांतों से बचपन की बीमारियों के निशान भी पता चल जाते हैं. इससे वैज्ञानिकों को वाइकिंग महिला की लाइफस्टाइल का पूरा बायोडेटा मिल जाएगा.
संरक्षण का बेहद नाजुक और सावधानी भरा काम
चूंकि ये सभी चीजें बेहद नाजुक हैं, इसलिए कंजर्वेशन सेंटर के एक्सपर्ट्स बहुत संभालकर काम कर रहे हैं. वे मिट्टी को इस तरह हटा रहे हैं ताकि हड्डियों, कपड़ों और ब्रोच का आपस का कनेक्शन न टूटे. किसी भी चीज की जगह बदलना सबूतों को नुकसान पहुंचा सकता है. इस पूरी रिसर्च को एग्नेस गेइजर ट्रस्ट से फंड मिल रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसानी अवशेष, गहने और कपड़े एक साथ मिलना एक बहुत बड़ी बात है, जो हमें 8वीं सदी के वाइकिंग समाज की एक साफ तस्वीर दिखाएगी.