जामिया में दो दशक बाद छात्रसंघ चुनाव का रास्ता खुलने का स्वागत किया जाना चाहिए. विश्वविद्यालय का यह फैसला देश के परिसरों में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की वापसी की उम्मीद है.
जामिया में छात्रसंघ चुनाव होने और रुक जाने की कहानी लंबी है. ये उन आवाजों की दास्तान भी है जो समय-समय पर अपने प्रतिनिधित्व के लिए उठती रहीं. 1981-82 में शुरू हुआ चुनावों का सिलसिला विवादों, टकरावों और लंबे विराम से गुजरता हुआ 2005 में लौटा, लेकिन फिर थम गया. इस बीच कैंपस ने आंदोलन देखे, अदालतों की चौखट पर पहुंचती उम्मीदें देखीं. मगर अब क्या हुआ?