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भारतीय लोकतंत्र की एक विडंबना है. देश के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों को संविधान, लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में पढ़ाया जाता है लेकिन अपने ही कैंपस में प्रतिनिधि चुनने का अवसर मांगने के लिए उन्हें आंदोलन करना पड़ता है.
दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव की बहाली के लिए हुआ आंदोलन इसी विरोधाभास को सामने लाता है. 26 अक्टूबर को विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा चुनाव कराने के आश्वासन और निलंबन वापसी की घोषणा के बाद गतिरोध दूर करने की दिशा में प्रगति हुई है.
करीब दो दशक बाद चुनाव का रास्ता खुलना महत्वपूर्ण कदम है. इस निर्णय ने एक बुनियादी सवाल फिर खड़ा कर दिया है. क्या छात्रों को अपने विश्वविद्यालय के संचालन और फैसलों पर अपनी बात रखने के लिए आंदोलन का सहारा लेना चाहिए या उनके पास इसके लिए कोई लोकतांत्रिक मंच पहले से मौजूद होना चाहिए?
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी छात्र प्रतिनिधियों के चुनाव को लेकर नियमों पर विवाद सामने आया. विश्वविद्यालय में करीब आठ साल बाद होने वाले छात्र प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए पहले लिंगदोह समिति की सिफारिशें लागू करने की व्यवस्था की गई थी.
छात्रों ने इस आधार पर आपत्ति जताई कि विश्वविद्यालय कोर्ट के प्रतिनिधियों और छात्रसंघ की भूमिका अलग-अलग है, इसलिए दोनों के चुनावों पर समान नियम थोपना उचित नहीं है. इसके बाद चुनाव अधिकारी ने एएमयू के कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार चुनाव कराने का निर्णय लिया.
इन दोनों घटनाओं से स्पष्ट है कि छात्र राजनीति की बहस केवल चुनाव कराने या न कराने तक सीमित नहीं है. असली सवाल यह है कि विश्वविद्यालय अपने छात्रों को किस तरह का प्रतिनिधित्व देना चाहते हैं और उस प्रतिनिधित्व की सीमाएं कौन तय करेगा?
विश्वविद्यालय केवल डिग्री हासिल करने की जगह नहीं होते हैं. यहां युवा पहली बार स्वतंत्र विचार, असहमति, सार्वजनिक बहस और सामूहिक निर्णय की प्रक्रिया से बड़े पैमाने पर रूबरू होते हैं.
हॉस्टल की समस्याएं, फीस में बढ़ोतरी, छात्रवृत्ति, पुस्तकालयों का समय, परिवहन, परीक्षा व्यवस्था, शिक्षकों की उपलब्धता और परिसर की सुरक्षा जैसे मुद्दे छात्रों के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करते हैं.
इन समस्याओं को उठाने के लिए यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है तो प्रशासन और छात्रों के बीच संवाद अक्सर व्यक्तिगत शिकायतों, अनौपचारिक मुलाकातों या विरोध प्रदर्शनों तक सिमट जाता है.
छात्रसंघ इस दूरी को कम कर सकते हैं. वे विद्यार्थियों की सामूहिक मांगों को व्यवस्थित ढंग से प्रशासन के सामने रखते हैं और फैसलों के लिए जवाबदेही तय करने का माध्यम बनते हैं.
निर्वाचित प्रतिनिधि के पास अपने साथियों के बीच लौटने, उनके सवाल सुनने और अपने काम का हिसाब देने की जिम्मेदारी होती है. यही लोकतंत्र की पहली पाठशाला है.

किसी युवा के लिए यह सीखना महत्वपूर्ण है कि केवल विरोध करना पर्याप्त नहीं, बल्कि मांगों को तार्किक ढंग से रखना, दूसरे पक्ष को सुनना, सहमति बनाना और परिणाम की जिम्मेदारी लेना भी जरूरी है.
छात्रसंघ की अनुपस्थिति में सबसे अधिक नुकसान उन विद्यार्थियों को होता है जिनकी प्रशासन तक सीधी पहुंच नहीं है. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले छात्र, दूरदराज के इलाकों से पढ़ने पहुंचे युवा इसका शिकार होते हैं. एक प्रभावी छात्रसंघ परिसर में आवाजों के इस असंतुलन को कम कर सकता है.
भारतीय छात्र राजनीति का इतिहास औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध और सामाजिक बदलाव की कोशिशों से जुड़ा है. 1828 में हेनरी विवियन डीरोजियो की पहल पर कलकत्ता में एकेडमिक एसोसिएशन बनी थी. इसके बाद उन्नीसवीं सदी में कई छात्र संगठनों ने आकार लिया.
1875 में आनंद मोहन बोस और 1876 में सुरेंद्रनाथ बनर्जी से जुड़ी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने राजनीतिक जागरूकता के विस्तार में भूमिका निभाई.
1905 के स्वदेशी आंदोलन, 1920 के असहयोग आंदोलन और 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में विद्यार्थियों ने भागीदारी की. 1936 में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की स्थापना हुई.
आजादी के बाद 1969 का तेलंगाना आंदोलन, 1974 का गुजरात नवनिर्माण आंदोलन, बिहार में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाला संपूर्ण क्रांति आंदोलन और असम आंदोलन छात्र शक्ति के व्यापक प्रभाव के उदाहरण बने.
इन आंदोलनों ने दिखाया कि विश्वविद्यालयों में उठने वाली आवाजें जरूरत पड़ने पर राष्ट्रीय राजनीति और सत्ता के फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं.
सत्तर के दशक में छात्र आंदोलनों ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी. महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के खिलाफ गुजरात और बिहार में शुरू हुए आंदोलन व्यापक राजनीतिक असंतोष का प्रतीक बन गए.
जयप्रकाश नारायण ने बिहार के छात्र आंदोलन को व्यापक जनांदोलन में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आपातकाल के विरोध में भी युवाओं ने सक्रिय भागीदारी की. इस दौर से निकले कई नेता आगे चलकर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति में प्रभावशाली बने.
लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज और सीताराम येचुरी जैसे नाम छात्र राजनीति से जुड़े रहे. इसका अर्थ यह नहीं कि छात्रसंघ से निकला हर नेता बेहतर साबित हुआ, बल्कि यह कि छात्र राजनीति ने नेतृत्व विकसित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराया.
फिर ऐसा क्या हुआ कि कई विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव नियमित प्रक्रिया के बजाय अपवाद बन गए? इसका जवाब केवल प्रशासनिक उदासीनता में नहीं, छात्र राजनीति के भीतर आई गिरावट में भी तलाशना होगा.
समय के साथ कई परिसरों में बाहुबल, धनबल, जातीय ध्रुवीकरण, हिंसा और राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप की शिकायतें बढ़ीं. चुनावों में खर्च का प्रदर्शन होने लगा और कुछ जगह छात्र हितों से अधिक व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं प्रभावी होती गईं.
इन परिस्थितियों ने विश्वविद्यालय प्रशासनों ने चुनाव टालने या छात्रसंघों को सीमित करने का तर्क दिया. साल 2006 में सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर गठित लिंगदोह समिति ने छात्रसंघ चुनावों को अधिक पारदर्शी और अनुशासित बनाने के लिए सिफारिशें कीं.
इनमें उम्मीदवारों की आयु, उपस्थिति, चुनावी खर्च और अन्य पात्रता संबंधी शर्तें शामिल थीं. इनका उद्देश्य चुनाव को धनबल और बाहुबल से मुक्त करना था.
हालांकि नियमों का उद्देश्य चुनाव को बेहतर बनाना होना चाहिए. इसे आधार बनाकर चुनाव को अनिश्चितकाल तक टालना गलत है.
एएमयू का विवाद इसी बात की याद दिलाता है कि चुनावी नियम बनाते समय संस्थान की प्रकृति, प्रतिनिधित्व के स्वरूप और विद्यार्थियों की वास्तविक परिस्थितियों पर भी विचार होना चाहिए.
यह भी समझना होगा कि छात्र राजनीति की बुराइयां छात्रसंघों की मौजूदगी से ही पैदा नहीं होतीं. वे उस व्यापक राजनीतिक संस्कृति से भी पोषण पाती हैं जिसमें सत्ता और प्रभाव हासिल करने के लिए नियमों को दरकिनार करना स्वीकार्य मान लिया जाता है.
यदि परिसर में हिंसा होती है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए. यदि कोई उम्मीदवार धनबल का इस्तेमाल करता है तो उस पर रोक लगनी चाहिए.

यदि बाहरी राजनीतिक संगठन चुनावों को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं तो विश्वविद्यालयों को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए.
लेकिन कुछ लोगों की गलतियों की सजा पूरे विद्यार्थी समुदाय को चुनाव के अधिकार से वंचित करके नहीं दी जा सकती.
जामिया में बनी सहमति की वास्तविक सफलता चुनाव निष्पक्ष रूप से संपन्न होने पर ही सिद्ध होगी. घोषणा और चुनाव के बीच की दूरी कम करना अब विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है.
चुनाव का कार्यक्रम स्पष्ट हो, पात्रता के नियम पहले से सार्वजनिक हों और सभी उम्मीदवारों को समान अवसर मिले. चुनावी खर्च की सीमा का पालन हो, प्रचार में हिंसा और धमकी के लिए कोई जगह न हो तथा शिकायतों के निपटारे की निष्पक्ष व्यवस्था बने.
छात्रसंघों को राजनीतिक दलों की नर्सरी बनाने के बजाय विद्यार्थियों के वास्तविक सवालों का मंच बनाना भी उतना ही जरूरी है. फीस, छात्रवृत्ति, रोजगार की तैयारी, लैंगिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, शोध की सुविधाएं और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में होने चाहिए.
आज देश के अनेक परिसरों में छात्रसंघों की भूमिका सीमित है. ऐसे समय में जामिया का घटनाक्रम उम्मीद जगाता है कि संवाद और लोकतांत्रिक दबाव से संस्थागत बदलाव संभव है.
आखिरकार, छात्रसंघ चुनाव का सवाल केवल कुछ पदों पर प्रतिनिधि चुनने का नहीं है. यह तय करने का सवाल है कि विश्वविद्यालय छात्रों को केवल निर्देश मानने वाले नागरिक बनाना चाहते हैं. या फिर सवाल पूछने, जिम्मेदारी उठाने वाले लोकतांत्रिक नागरिक बनाना चाहते हैं.
अगर विश्वविद्यालय अपने छात्रों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाते हैं, तो उन्हें लोकतंत्र का अभ्यास करने का अवसर भी देना होगा.