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दरबार से डेटा तक: कभी महाराजाओं की मर्जी, अब प्रदर्शन की कसौटी; 94 साल में कैसे बदला टीम इंडिया का सेलेक्शन?

बीसीसीआई की चयन समिति में बड़ा बदलाव होने वाला है. अजीत अगरकर के बाद नए चीफ सेलेक्टर का इंतजार है. ऐसे में हम आपको यहां 94 सालों के भारतीय क्रिकेट इतिहास में लगातार बदली चयन प्रक्रिया के बारे में बता रहे हैं.

दरबार से डेटा तक: कभी महाराजाओं की मर्जी, अब प्रदर्शन की कसौटी; 94 साल में कैसे बदला टीम इंडिया का सेलेक्शन?
Image Credit: बीसीसीआई.

भारतीय क्रिकेट इतिहास में कप्तान, कोच और यहां तक कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष पद से जुड़े कई विवाद दर्ज हैं. इन पदों के लिए कई तरह के 'कोल्ड वॉर' देखने को मिले हैं. कभी महाराजा ही बोर्ड के अध्यक्ष होते थे. कप्तान और कोच पद भी उनके ही चहेते को बनाया जाता था. यहां तक कि कई महाराजा तो कप्तान भी बने. हालांकि, अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं. छोटे शहर के खिलाड़ी भी कप्तान बन जा रहे हैं और टीम को सफलता के शिखर पर ले जा रहे हैं. इन पदों के अलावा एक और ऐसा पद है, जिसके लिए काफी 'कोल्ड वॉर' हुए हैं. वह पद मुख्य चयनकर्ता का है. भारतीय क्रिकेट में एक बार फिर से यह पद सुर्खियों में है.

अजीत अगरकर का कार्यकाल समाप्त हो चुका है. उनकी जगह बीसीसीआई को नए मुख्य चयनकर्ता की तलाश है. इसके लिए उसने आवेदन भी मंगाए हैं. मौजूदा चयन समिति में प्रज्ञान ओझा, आरपी सिंह, अजय रात्रा और शिवसुंदर दास हैं. समिति में पांचवें और आखिरी पद को भरा जाना है. चारों सदस्यों में ओझा सबसे ज्यादा टेस्ट मैच खेलने वाले सदस्य हैं. ऐसे में उनका दावा मजबूत है, लेकिन अगर पांचवां सदस्य उनसे ज्यादा टेस्ट खेलने वाला आया तो नियमों के अनुसार वही मुख्य चयनकर्ता बनेगा.

94 साल में बदले कई नियम

मुख्य चयनकर्ता बनने की प्रक्रिया अब जितनी पारदर्शी है, उस तरह पहले नहीं थी. भारतीय क्रिकेट के 94 सालों के इतिहास में यह पद शक्तिशाली, सबसे ज्यादा चर्चित और विवादित रहा है. एक समय था जब टीम इंडिया का चयन रजवाड़ों के दीवानखानों में होता था. उस समय खेलने की क्षमता से ज्यादा क्षेत्रीय वफादारी और रसूख मायने रखती थी. आज वही प्रक्रिया कड़े पात्रता मानदंडो, पारदर्शी विज्ञापनों, इंटरव्यू और डेटा एनालिटिक्स से होकर गुजरती है.

अंग्रेजों और राजाओं का वर्चस्व

भारतीय टीम ने अपना पहला इंटरनेशनल मैच 1932 में खेला था. उस समय देश पर अंग्रेजों का शासन था. क्रिकेट भी वही लेकर आए थे तो उनका ही वर्चस्व टीम चयन में देखने को मिलता था. ब्रिटिश अधिकारी भारत के महाराजा और नवाबों के साथ टीम को चुनते थे. इसका फायदा बेहतर खेलने वालों को नहीं, बल्कि दरबारी लोगों को मिलता था.  टीम चुनने वाले अधिकांश लोगों का खेल से कोई सीधा संबंध नहीं होता था. 1930 और 1940 के दशक में चयनकर्ता बनने के लिए खिलाड़ी होना जरूरी नहीं था.

बीसीसीआई के संस्थापक सदस्यों में शामिल एंथनी डी मेलो एक बेहतरीन खेल प्रशासक माने गए, लेकिन कभी उन्होंने क्रिकेट नहीं खेला था. वह चयन समिति में अहम फैसले लेते थे. उस समय क्रिकेट के प्रशासकों का मानना था कि खिलाड़ियों का चयन एक व्यावसायिक निर्णय है और इसमें खिलाड़ियों की कोई आवश्यकता नहीं थी. टीम को यात्रा करने के लिए पैसों की जरूरतों को महाराजा ही देखते थे. ऐसे में उनकी मर्जी ही चलती थी.

विजयनगरम के महाराज (विजी) का दौर

भारतीय क्रिकेट इतिहास में साल 1936 को काफी याद किया जाता है. टीम इंडिया इंग्लैंड दौरे पर गई थी. उस समय कुछ ऐसा हुआ, जिसे आज तक लोग काले समय के रूप में याद करते हैं. महाराज कुमार विजयनगरम (विजी के नाम से मशहूर) बिना किसी अनुभव के टीम के कप्तान बन गए थे. उन्होंने सिर्फ कप्तानी नहीं की, बल्कि टीम के चयन और प्रबंधन में भी मनमर्जी चलाई थी. महान बल्लेबाज लाला अमरनाथ पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाया गया था. इसे लोगों ने मनगढ़ंत कहा था. अमरनाथ को इस कारण दौरे के बीच में ही स्वदेश भेज दिया गया था. इससे आप समझ सकते हैं कि उस समय चयन प्रक्रिया में प्रशासकों और रजवाड़ों का कितना वर्चस्व था. विजी ने करियर में 3 टेस्ट मैच खेले और 8.25 की औसत से 33 रन ही बनाए. बाद में वह बीसीसीआई के अध्यक्ष भी बने थे.

भारतीय क्रिकेट ने देखी रियासतों की लॉबिंग

उस समय बड़ौदा के गायकवाड़, पटियाला के महाराजा, नावानगर के नवाब और विजयनगरम की रियासतें टीम चयन को तय करती थीं. इस बात का फैसला वही करते थे कि उनके क्षेत्र से किस खिलाड़ियों को भारतीय टीम की कैप मिलेगी. चयन समिति की बैठकों में खिलाड़ियों के प्रदर्शन की जगह इस बात की चर्चा होती थी कि किस रियासत से किसे टीम में लिया जाएगा. कुल मिलाकर प्रदर्शन नहीं, वर्चस्व मायने रखती थी

जोनल व्यवस्था का उदय

स्वतंत्रता के बाद बीसीसीआई धीरे-धीरे और ज्यादा मजबूत और संगठित हुआ. उस समय भी रियासती मानसिकता थी, लेकिन उसका स्वरूप दूसरा था. बड़े शहरों के खिलाड़ियों का चयन हो रहा था. छोटे शहर से इक्का-दुक्का प्लेयर ही टीम में जगह बना पाते थे. बीसीसीआई ने 'जोनल सिस्टम' को लाया. पांच जोन बनाए गए. 5 सदस्यीय जोनल सिस्टम के आधार पर पांच दशकों तक क्रिकेट टीम का चयन किया गया. यह नियम बनाया गया था कि हर जोन से एक-एक चयनकर्ता आएंगे और ये मिलकर एक चयन समिति बनाएंगे. इसमें सबसे सीनियर को मुख्य चयनकर्ता बनाया जाएगा.

बीसीसीआई का जोनल मॉडल

उत्तर क्षेत्र (नॉर्थ जोन)
दक्षिण क्षेत्र (साउथ जोन)
पूर्व क्षेत्र (ईस्ट जोन)
पश्चिम क्षेत्र (वेस्ट जोन)
मध्य क्षेत्र (सेंट्रल जोन)

जोनल मॉडल पर क्यों हुआ विवाद?

रियासतों का दौर खत्म हुआ तो जोनल मॉडल आने पर खिलाड़ियों के चयन में थोड़ी पारदर्शिता तो आई, लेकिन अभी भी कई सुधार बाकी थे. जोनल मॉडल ने क्षेत्रीय पक्षपात को बढ़ावा दिया. जोनल मॉडल में अपने जोन के खिलाड़ियों को प्राथमिकता देने की खबरें खूब आईं. जब पश्चिम क्षेत्र मजबूत होता था तो मुंबई और गुजरात के खिलाड़ियों को बढ़ावा मिलता था. उत्तर क्षेत्र के मजबूत होने पर दिल्ली और पंजाब के खिलाड़ी ज्यादा चुने जाते थे. वहीं, दक्षिण क्षेत्र के मजबूत होने पर कर्नाटक, आंध्र और तमिलनाडु के प्लेयर्स ज्यादा दिखते थे. पूर्व और मध्य क्षेत्र को तो उस समय सबसे कमजोर माना गया था.

वोटिंग के जरिए होता था चयन

1980 और 1990 के दशक में तो कई बार खिलाड़ियों का चयन वोटिंग के आधार पर होता था. उस वक्त खिलाड़ियों की क्षमता नहीं देखी जाती थी. जिस जोन के ज्यादा चयनकर्ता होते थे, वह जीत जाता था और खिलाड़ी टीम में आ जाते थे. पूर्व क्षेत्र ने हमेशा इस बात को लेकर शिकायत की है कि उनके खिलाड़ियों को हमेशा कमतर आंका गया और उत्तर या पश्चिम जोन के वर्चस्व के कारण उन्हें नजरअंदाज किया गया.

कपिल देव-गावस्कर और तेंदुलकर का काल

जोनल मॉडल में आगे चलकर इस नियम को लागू किया गया कि चयनकर्ता केवल वही खिलाड़ी बन सकते हैं जिन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेले हैं. अब इसका भी लोग नाजायज फायदा उठा लेते थे. कभी-कभी तो 10-12 प्रथण श्रेणी खेलने वाले खिलाड़ी ही टीम चयन में अहम भूमिका निभाने लगे थे. उनके पास इंटरनेशनल क्रिकेट का अनुभव जीरो होता था. इसके बावजूद वह कपिल देव, सुनील गावस्कर, मोहम्मद अजहरुद्दीनऔर सचिन तेंदुलकर जैसे बड़े खिलाड़ियों के भविष्य को तय करते थे.

जोनल मॉडल के चर्चित विवाद

  • 1979 में कृष्णमाचारी श्रीकांत का चयन दक्षिण क्षेत्र के चयनकर्ताओं की लॉबिंग के बाद हो पाया था. इसका विरोध काफी हुआ, लेकिन श्रीकांत टीम में बने रहे. उन्होंने बाद में अपने खेल से खुद को साबित भी किया.
  • 1996 वर्ल्ड कप में मोहम्मद अजहरुद्दीन को मौका नहीं मिला था. सचिन तेंदुलकर को कप्तान बनाने और अजहर को हटाने में जोनल मॉडल का ही बड़ा हाथ था.
  • 2005 में सौरव गांगुली और ग्रेग चैपल विवाद में भी जोनल मॉडल के प्रभाव को देखा गया. किरण मोरे टीम के मुख्य चयनकर्ता थे और भारत के सबसे सफल कप्तानों में एक गांगुली को टीम से ही बाहर कर दिया गया था. उस समय यह कहा गया कि पूर्व क्षेत्र के हितों की फिर से अनदेखी हुई है और चयनकर्ता चैपल के प्रभाव में काम कर रहे थे.

लोढ़ा समिति ने किए क्रांतिकारी बदलाव

आईपीएल 2013 में स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी कांड ने भारतीय क्रिकेट को हिला दिया. उच्चतम न्यायालय ने बीसीसीआई के प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा के लिए जस्टिस आरएम लोढ़ा समिति का गठन किया गया. लोढ़ा समिति की सिफारिशों ने भारतीय चयन प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव कर दिए.

  • लोढ़ा समिति ने जोनल कोटा को खत्म कर दिया. यह बताया गया कि जोनल मॉडल के कारण योग्यता की जगह क्षेत्रीय राजनीति को बढ़ावा मिलता है. ऐसे में अब सिर्फ योग्यता के आधार पर टीम का चयन होगा.
  • चयन समिति का सदस्य बनने के लिए भी नियमों में कड़े बदलाव किए गए. अब उम्मीदवारों के पास पर्याप्त इंटरनेशनल क्रिकेट का अनुभव होना जरूरी हो गया.
  • चयन समिति के चुनाव की प्रक्रिया बंद कमरों की जगह पारदर्शी करने की बात कही गई. इसके लिए बीसीसीआई को विज्ञापन निकालने और इंटरव्यू कराने को कहा गया.
  • चयनकर्ता बनने वाले सदस्यों को किसी भी तरह के हितों के टकराव से बचना होगा. सदस्य का संबंध किसी आईपीएल टीम, मीडिया हाउस, प्लेयर मैनेजमेंट एजेंसी या निजी अकादमी से नहीं होना चाहिए.

डेटा एनालिटिक्स का वर्चस्व

लोढ़ा समिति की सिफारिशों के बाद बीसीसीआई ने चयन समिति में सदस्यों के चुनाव को पारदर्शी बनाया. नए नियम बनाए गए, जो आज भी लागू हैं. अब यह प्रक्रिया किसी कॉर्पोरेट कंपनी या सिविल सेवा परीक्षा की तरह है. पहले सार्वजनिक विज्ञापन निकालना है. उसके बाद आवेदन आएंगे और फिर उसे शॉर्टलिस्ट किया जाएगा. इसके बाद क्रिकेट सलाहकार समिति (सीएसी) इंटरव्यू लेगी और फिर नियुक्ति होगी. चयन समिति के पास खिलाड़ी के सारे डेटा होते हैं. इसमें यो-यो टेस्ट के नतीजे, फिटनेस रिजल्ट, चोटों का इतिहास, फॉर्म, जीपीएस ट्रैकिंग के नतीजे शामिल होते हैं. इसे देखने के बाद ही अंडर-19, इंडिया ए और सीनियर टीम का चयन होता है.

सीएसी का गठन कैसे होता है?

बीसीसीआई देश के महान खिलाड़ियों को क्रिकेट सलाहकार समिति (सीएसी) में लाती है. क्रिकेट सलाहकार समिति बीसीसीआई को समय-समय पर अलग-अलग सुधारों को लेकर सलाह देती है. यह चयनकर्ताओं से इंटरव्यू में यह पूछती है कि आप तीन अलग-अलग प्रारूपों में टीम को कैसे चुनेंगे? वर्कलोड मैनेजमेंट कैसे करेंगे? घरेलू क्रिकेट से प्रतिभाओं को कैसे निकालेंगे? कप्तान और कोच के बीच अगर मतभेद होता है तो उसे कैसे सुलझाएंगे? इनके अलावा भी कई तरह के प्रश्न इंटरव्यू में पूछे जाते हैं.

चयन समिति की मुख्य जिम्मेदारियां

  • निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से सबसे अच्छी सीनियर नेशनल मेंस टीम चुनना, साथ ही टैलेंट की पहचान करना और एक मजबूत बेंच स्ट्रेंथ बनाना.
  • घरेलू और इंटरनेशनल मैचों के जरिए खिलाड़ियों की खोज और उनका आकलन करना. इसके अलावा सभी फॉर्मेट में सीनियर नेशनल मेंस टीम के सेलेक्शन और विकास में योगदान देना.
  • जरूरत के हिसाब से टीम मीटिंग में शामिल होना. घरेलू और इंटरनेशनल मैच देखने के लिए यात्रा करना.
  • बीसीसीआई की एपेक्स काउंसिल को टीम के परफॉर्मेंस पर हर तीन महीने में रिपोर्ट तैयार करना और देना.
  • टीम चयन पर मीडिया से बात करना.
  • हर फॉर्मेट में टीम के लिए कप्तान नियुक्त करना.

योग्यता और अनुभव

  • कम से कम 7 टेस्ट मैच खेले हों; या 30 प्रथम श्रेणी मैच; या 10 वनडे मैच और 20 प्रथम श्रेणी मैच खेले हों.
  • कम से कम पांच साल पहले खेल से रिटायर होना चाहिए.
  • कोई भी व्यक्ति जो बीसीसीआई के मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन और नियम और विनियम में बताई गई किसी भी क्रिकेट समिति का कुल मिलाकर पांच साल तक सदस्य रहा हो, वह चयन समिति का सदस्य बनने के लिए पात्र नहीं होगा.
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About the Author

Rohit Raj

Rohit Raj

रोहित राज एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. दैनिक जागरण से करियर की शुरुआत करने वाले रोहित ईटीवी, दैनिक भास्कर, जनसत्ता और अमर उजाला से होते हुए जी न्यूज के हिंदी डिजिटल में चीफ सब एडिटर हैं और स्पोर्ट्स टीम को लीड करते हैं. रोहित कई एक्सक्लूसिव खबरें और एथलीट्स का इंटरव्यू कर चुके हैं. पत्रकारिता में 40 अंडर 40 अवॉर्ड विजेता हैं. खेलों में ज्यादा रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, फीफा वर्ल्ड कप, हॉकी वर्ल्ड कप, वर्ल्ड पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 और अन्य खेलों के बड़े-बड़े इवेंट को करने का अनुभव रखते हैं. ब्रेकिंग न्यूज, एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर पकड़ है. क्रिकेट के अलावा हर खेलों को आसान भाषा में लोगों तक पहुंचाने की कोशिश में लगे रहते हैं.
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