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टीवी पर वो दौर डीडी नेशनल का था.. पिछली सदी का आखिरी दशक और इस सदी का पहला दशक. यानि तकरीबन बीस साल का समय. पुरुष क्रिकेट के फैंस से लबालब देश के गली-मोहल्ले, चौराहों और सड़कों के किनारे बने ढाबों पर मैच देखने वाले लड़के ये सुनना शुरू कर चुके थे कि देश में महिला क्रिकेट भी होता है. उसके तमाम कारणों में एक कारण ये भी था कि मैच के बीच में डीडी नेशनल पर फोर्थ अम्पायर आया करता था और उसमें एक पैनल का नाम अंजुम चोपड़ा था. इसके अलावा एक नाम सुनीता शर्मा का भी होता था. ऐसा नहीं है उस समय से पहले महिला क्रिकेट की चर्चा नहीं थी. खूब चर्चा थी. मगर उस दौर के बहुतायत जेन-जी कम वाकिफ थे. अंजुम चोपड़ा के रिटायरमेंट के बाद मोर्चा मिताली राज और झूलन गोस्वामी ने संभाला और फिर देखते देखते महिला क्रिकेट ने अपने हिस्से का सब कुछ देखा. हम इन सब बातों का जिक्र क्यों कर रहे हैं. क्योंकि हरमनप्रीत कौर ने कप्तानी छोड़ने का ऐलान किया है.
अपनी टीम में हैरी दी के नाम से मशहूर हरमनप्रीत कौर भारतीय महिला क्रिकेट की सबसे सफल कप्तान के रूप में ऐसा कर रही हैं. जिस तरीके से और जिस समय में उन्होंने ये ऐलान किया वो क्रिकेट पंडितों के लिए एक सुखद आश्चर्य वाला घटनाक्रम है. इसकी उम्मीद बहुत कम लोगों ने की थी. भारतीय महिला टीम को पहला वनडे वर्ल्ड कप दिलाने वाली हरमनप्रीत कौर ने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए तीनों फॉर्मेट की कप्तानी छोड़ने का ऐलान किया है. यह संन्यास नहीं है. वे बतौर खिलाड़ी खेलती रहेंगी.
यह फैसला अचानक क्यों आया. इसका कोई एक आधिकारिक कारण नहीं बताया गया. मगर इस फैसले की टाइमिंग जरूर गौर करने लायक है.
सोमवार को गुवाहाटी में BCCI ने महिला टीम की रिव्यू मीटिंग हुई. अध्यक्षता बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने की. उसमें हरमनप्रीत, उप-कप्तान स्मृति मंधाना और हेड कोच अमोल मजूमदार शामिल थे. अगले ही दिन मंगलवार को हरमनप्रीत ने कप्तानी छोड़ने की घोषणा कर दी. अपने पोस्ट में उन्होंने कहा कि उन्हें भरोसा है, उनकी टीम इस समय अच्छी स्थिति में है.
मतलब साफ है कि हरमनप्रीत कौर ने खुद तय किया कि अब नेतृत्व आगे बढ़ाने का समय है. खेल की दुनिया में कप्तानी छोड़ना शायद सबसे मुश्किल फैसला है. इतिहास गवाह है कि ज्यादातर कप्तान यह फैसला खुद नहीं लेते. उन पर दबाव बनाया जाता है. कभी बोर्ड और चयनकर्ताओं की तरफ से दबाव बनता है. कभी लगातार हार के बाद आलोचना का शोर इतना बढ़ जाता है कि कुर्सी छोड़नी पड़ती है. कई बार कप्तान आखिरी समय तक पद से चिपके रहते हैं और विदाई कड़वाहट के साथ होती है. यह चलन किसी एक देश या एक जेंडर तक सीमित नहीं है.
पुरुष क्रिकेट में कपिल देव का मामला याद कीजिए. विश्वकप जीत के बाद भी उनको हटाया गया और उनको जानकारी नहीं थी. गांगुली और चैपल का विवाद याद कीजिए. खुद तेंदुलकर के अंदर आज भी ये टीस रहती है कि बतौर कप्तान उन्हें अपने मन मुताबिक टीम नहीं मिली. विराट कोहली का मामला याद कीजिए. टी20 की कप्तानी उन्होंने खुद छोड़ी लेकिन उसके बाद वनडे की कप्तानी से हटाए जाने का घटनाक्रम इतना विवादित रहा कि बोर्ड और कप्तान के बयान आपस में टकराते दिखे. पाकिस्तान में बाबर आजम को भी बार-बार इसी तरह के दबाव और उठापटक से गुजरना पड़ा है.
महिला क्रिकेट भी इससे अछूता नहीं रहा. कुछ साल पहले मिताली राज और तत्कालीन कोच रमेश पवार का विवाद सार्वजनिक मंच तक पहुंचा था. यानी कप्तानी से विदाई अक्सर शांत नहीं, शोर के साथ होती है. इस पृष्ठभूमि में हरमनप्रीत का फैसला अलग खड़ा दिखता है.
हरमनप्रीत की उपलब्धियां इतनी बड़ी हैं कि वे चाहतीं तो कुर्सी पर बने रहने का दावा आराम से कर सकती थीं. इतनी उपलब्धियां उनके हिस्से में हैं जिसकी गिनती कम है.
हाल ही में एशियन गेम्स में भारत ने उनकी अगुवाई में गोल्ड जीता. पिछले साल वे भारत को पहला वनडे वर्ल्ड कप दिला चुकी थीं. वर्ल्ड कप जीत वाला पल तो बहुत बड़ा मील का पत्थर था. जिस दिन हरमनप्रीत कौर ने वर्ल्ड कप ट्रॉफी उठाई थी तो उन्होंने अकेले नहीं उठाई थी. मिताली राज, झूलन गोस्वामी जैसी कई पूर्व दिग्गज उस ट्रॉफी को खुद उठाते हुए फील कर रही थी. ब्रॉडकास्टर के रूप में उस दिन भी मैदान में रहीं अंजुम चोपड़ा की आंखों में आंसू थे.
इस स्तर की सफलता के बाद बतौर कप्तान हरमनप्रीत कौर पर कोई सवाल उठाने वाला नहीं है. उनकी टीम की लड़कियां हमेशा तारीफ करती आई हैं. खुद स्मृति मंधाना के साथ उनकी जुगलबंदी आज भी देखने लायक है. फिर भी हरमनप्रीत ने अपनी मर्जी से और शिखर पर रहते हुए पद छोड़ दिया. यही बात उनके इस फैसले को खास बनाती है. ये बाकी कप्तानों के लिए एक सबक भी है.
हरमनप्रीत का सफर पंजाब के मोगा से शुरू हुआ था. 2009 में बीस साल की उम्र से भी एक दिन पहले उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा था. 2016 में उन्हें भारत की कप्तानी मिली और करीब एक दशक तक वे इस भूमिका में रहीं. बल्लेबाज के तौर पर उनकी पहचान बेखौफ हिटिंग रही और दाएं हाथ की ऑफ-स्पिन से वे जरूरत पड़ने पर टीम को विकेट भी दिलाती रहीं.
कप्तानी के दौर में उन्होंने जितना बोझ उठाया उसे उनके संन्यास वाली पोस्ट से भी समझा जा सकता है कि कई मौकों पर उन्हें अपनी निजी महत्वाकांक्षाएं किनारे रखनी पड़ीं.
2017 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी जोरदार नाबाद 171 रनों की पारी ने क्रिकेट प्रेमियों को झकझोर दिया. वो पारी हमेशा महिला क्रिकेट की सबसे यादगार पारियों में गिनी जाएगी. उसी पारी ने देश में महिला क्रिकेट का रुख मोड़ते हुए उसे रफ्तार दे दी. उस पारी ने देश में कई लड़कियों को बल्ला उठाने की प्रेरणा दी.
2020 में उनकी कप्तानी में भारत पहली बार टी20 वर्ल्ड कप के फाइनल तक पहुंचा. इंटरनेशनल क्रिकेट में वे 8000 से ज्यादा रन बना चुकी हैं. इस साल जून में वे टी20 वर्ल्ड कप में भारत की सबसे ज्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी बनीं और इस मामले में मिताली राज को पीछे छोड़ा.
कप्तानी के रिकॉर्ड के आंकड़े भी उतने ही दमदार हैं. दिसंबर 2025 में वे महिला टी20 इंटरनेशनल में सबसे ज्यादा जीत दिलाने वाली कप्तान बनीं और उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की मेग लैनिंग को पीछे छोड़ा. इसी सितंबर में वे 150 टी20 इंटरनेशनल में कप्तानी करने वाली दुनिया की पहली क्रिकेटर बनीं. नवंबर 2025 में फाइनल में दक्षिण अफ्रीका को 52 रन से हराकर उन्होंने भारत को वनडे वर्ल्ड कप का पहला खिताब दिलाया. सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ उनकी 89 रनों की पारी और जेमिमा रॉड्रिग्स के साथ 167 रनों की साझेदारी ने ही उस जीत की नींव रखी थी.
हरमनप्रीत का फैसला सिर्फ भावनात्मक ही नहीं है रणनीतिक रूप से भी समझदारी भरा भी है. अगले वनडे वर्ल्ड कप में अभी तीन साल हैं और टीम का एक नया नेतृत्व तैयार करने के लिए यह सही समय है. उनकी उम्र सैंतीस की हो चली है. स्मृति मंधाना को अगली कप्तान बनाए जाने की चर्चा भी है. वो सबसे फिट भी हैं इस पोस्ट के लिए. जिम्बाब्वे के खिलाफ घरेलू सीरीज 16 अक्टूबर से रायपुर में शुरू होनी है. बदलाव का पहला इम्तिहान भी जल्द ही है.
जिन्होंने भी हाल फिलहाल में महिला क्रिकेट की बारीकियों पर नजर रखा होगा वो हरमनप्रीत के इस फैसले पर खुश होंगे. इस मामले में बोर्ड ने भी समझदारी दिखाई है.
इस साल की शुरुआत में पूर्व भारतीय कप्तान शांता रंगास्वामी ने एक कार्यक्रम में कहा था कि कप्तानी के बोझ से मुक्त होकर हरमनप्रीत बल्लेबाज के तौर पर और ज्यादा योगदान दे सकती हैं. अब यह मौका उनके पास है. और वो हरमनप्रीत ने कर दिखाया है.
वर्ल्ड क्रिकेट में ऐसे उदाहरण विरले ही होते हैं. हमने ग्रीम स्मिथ, पोंटिंग, फ्लेमिंग और धोनी का दौर देखा. महिला क्रिकेट में भी चार्लोट एडवर्ड्स, बेलिंडा क्लार्क, मेग लैनिंग, खुद मिताली राज का दौर बतौर कप्तान देखा. अच्छा कप्तान वही है जो जानता हो कि कब जाना है. जब टीम शिखर पर हो, ट्रॉफियां हाथ में हों और सवाल उठाने वाला कोई न हो, उस वक्त खुद हट जाना हिम्मत मांगता है. हरमनप्रीत ने वो साबित कर दिया कि कप्तानी पद नहीं, एक जिम्मेदारी है, जिसे सही समय पर सौंपना भी नेतृत्व का हिस्सा है.
हरमनप्रीत के मामले में बोर्ड, कप्तान और टीम ने भी समझदारी दिखाई. सबके लिए यह आदर्श समय था. मगर भले ही कप्तानी का अध्याय बंद हुआ है.. हरमनप्रीत का क्रिकेट अभी बाकी है.
भारतीय क्रिकेट का एक फैन -गौरव