मास्टर ब्लास्टर, किंग कोहली, गब्बर और गौती को गढ़ने वाले 5 गुरु, जिन्होंने बदल दी भारतीय क्रिकेट की दिशा
भारतीय क्रिकेट के कई सितारों की सफलता के पीछे उनके गुरुओं की अहम भूमिका रही है. रमाकांत आचरेकर ने सचिन तेंदुलकर, तारक सिन्हा ने ऋषभ पंत, संजय भारद्वाज ने गौतम गंभीर और राजकुमार शर्मा ने विराट कोहली को तराशा. वहीं युवराज सिंह नई पीढ़ी के खिलाड़ियों को मेंटर कर रहे हैं.
कोई भी फिल्म जब बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ती है, तो चर्चा सिर्फ उसके हीरो-हीरोइन तक सीमित नहीं रहती. दर्शक उस कहानी को पर्दे पर उतारने वाले डायरेक्टर का नाम भी उतनी ही शिद्दत से लेते हैं, क्योंकि सितारों की चमक के पीछे उस शख्स की सोच और मेहनत छिपी होती है, जिसने उन्हें सही दिशा दी. खेल की दुनिया में भी कहानी कुछ ऐसी ही है. जब कोई खिलाड़ी सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए देश और दुनिया में अपनी पहचान बनाता है, तो उसके गुरु का जिक्र भी जरूर होता है.
आखिर उस प्रतिभा को तराशने, उसकी कमियों को सुधारने और उसे बड़े मंच के लिए तैयार करने वाला भी तो कोई होता है. भारतीय क्रिकेट में ऐसे कई गुरु रहे हैं, जिन्होंने मैदान पर खुद ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोरीं, लेकिन उनके शिष्यों ने इतिहास जरूर रचा. आइए नजर डालते हैं ऐसे ही 5 क्रिकेट गुरुओं पर, जिन्होंने अपने-अपने दौर के सितारों को तराशकर भारतीय क्रिकेट की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई.
रमाकांत आचरेकर: शिवाजी पार्क से निकली क्रिकेट की महान पाठशाला
अगर भारतीय क्रिकेट की गुरु-शिष्य परंपरा की बात हो और रमाकांत आचरेकर का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है. मुंबई के शिवाजी पार्क को उन्होंने सिर्फ क्रिकेट का मैदान नहीं रहने दिया, बल्कि उसे भारतीय क्रिकेट की एक ऐसी पाठशाला बना दिया, जहां से आगे चलकर कई बड़े क्रिकेटर निकले. उनके सबसे प्रसिद्ध शिष्यों में सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली शामिल रहे. आचरेकर को सचिन के करियर को शुरुआती दिशा देने वाले सबसे महत्वपूर्ण लोगों में माना जाता है.
आचरेकर की कोचिंग का अंदाज बेहद अनुशासित था. वो प्रतिभा से ज्यादा मेहनत और अभ्यास पर भरोसा करते थे. सचिन की तकनीक, बल्लेबाजी की आदतों और मैच की मानसिकता को निखारने में उनका बड़ा योगदान रहा. आचरेकर को 1990 में द्रोणाचार्य पुरस्कार और 2010 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. सफलता की तमाम ऊंचाइयों को छूने के बावजूद मास्टर ब्लास्टर अपने गुरु को भूले नहीं हैं. आचरेकर का सम्मान और उनकी तारीफ करने से सचिन कभी पीछे नहीं हटते हैं.
2. तारक सिन्हा: सोननेट क्लब के ‘उस्तादजी’
दिल्ली की क्रिकेट संस्कृति में तारक सिन्हा का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है. उन्हें प्यार से ‘उस्तादजी’ कहा जाता था. सिन्हा ने दिल्ली के सोननेट क्रिकेट क्लब को युवा क्रिकेटरों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाया. पांच दशक से ज्यादा के कोचिंग करियर में उन्होंने कई ऐसे खिलाड़ियों को तैयार किया, जिन्होंने आगे चलकर भारत के लिए खेला.
तारक सिन्हा के शिष्यों में ऋषभ पंत, आशीष नेहरा, शिखर धवन, आकाश चोपड़ा और अंजुम चोपड़ा जैसे नाम शामिल रहे. उपलब्ध रिकॉर्ड्स के मुताबिक उनके प्रशिक्षित खिलाड़ियों में एक दर्जन से ज्यादा क्रिकेटर भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल चुके हैं. तारक सिन्हा की खासियत थी कि वह खिलाड़ी की प्राकृतिक प्रतिभा को खत्म किए बिना उसकी कमजोरियों पर काम करते थे. यही वजह है कि उनके स्कूल से अलग-अलग शैली और अलग-अलग दौर के खिलाड़ी निकले. 2018 में उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
3. संजय भारद्वाज: बदल दी गौतम गंभीर की जिंदगी
आज गौतम गंभीर भारतीय क्रिकेट के सबसे चर्चित चेहरों में से एक हैं. लेकिन उनके क्रिकेटर बनने की कहानी में एक नाम बेहद महत्वपूर्ण है, वो है संजय भारद्वाज.उन्होंने गंभीर को बचपन से कोचिंग दी. गंभीर जब करीब 10 साल के थे, तभी से भारद्वाज उनके साथ काम कर रहे थे. दिल्ली की लाल बहादुर शास्त्री अकादमी से जुड़े भारद्वाज ने गंभीर के खेल के साथ-साथ उनकी मानसिकता को भी आकार दिया. गंभीर की सबसे बड़ी पहचान रही है, हार न मानने की आदत और जीतने की जिद.
गंभीर के भारतीय टीम का हेड कोच बनने के बाद भारद्वाज ने भी कहा था कि गंभीर में खिलाड़ियों से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करवाने की क्षमता है. यानी जिस मानसिकता के लिए गंभीर आज अपने खिलाड़ियों से जाने जाते हैं, उसकी जड़ें उनके शुरुआती क्रिकेट दिनों में ही दिखाई देने लगी थीं.
4. राजकुमार शर्मा — 9 साल के विराट से ‘किंग कोहली’ तक
विराट कोहली के क्रिकेट करियर की कहानी में अगर किसी एक शुरुआती गुरु का नाम सबसे पहले लिया जाए तो वह हैं राजकुमार शर्मा. विराट महज 9 साल की उम्र में वेस्ट दिल्ली क्रिकेट अकादमी पहुंचे थे, जहां उन्होंने राजकुमार शर्मा से क्रिकेट की शुरुआती बारीकियां सीखीं. इसके बाद दोनों के बीच गुरु-शिष्य का रिश्ता लगातार मजबूत होता गया. राजकुमार शर्मा ने विराट के तकनीकी खेल के साथ-साथ उनकी मानसिकता पर भी काम किया. विराट के अंदर बचपन से ही नेतृत्व की क्षमता दिखाई देती थी. उनके कोच ने भी बाद में बताया कि वह अकादमी में भी कप्तान बनने की कोशिश करते थे. समय के साथ वही बच्चा भारत का कप्तान बना और दुनिया के सबसे बड़े बल्लेबाजों में शामिल हुआ. राजकुमार शर्मा को 2016 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
सफलता की तमाम ऊंचाइयों को छूने के बावजूद आज भी जब किसी मैच से पहले विराट कोहली के सामने उनके गुरु आते हैं तो आंख नीचे कर, मुस्कान के साथ झुककर उन्हें प्रणाम जरूर करते हैं. गुरु-शिष्य का ये 'विराट' रिश्ता वाकई में प्रेरणादायक है.
5. युवराज सिंह — जब चैंपियन खुद बन गया Gen-Z का गुरु
इस लिस्ट में एक नाम उसका भी है, जिसने खुद भी क्रिकेट के मैदान पर सफलता हासिल की और अब वही लगन और जुनून के साथ आज के दौर के खिलाड़ियों का फ्यूचर बनाने में लगा है. जी हां, वो नाम है भारत को दो वर्ल्ड कप जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले युवराज सिंह. युवी ने औपचारिक तौर पर खुद को पारंपरिक क्रिकेट कोच के रूप में स्थापित नहीं किया, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वह पंजाब के कई युवा क्रिकेटरों के मेंटॉर और ट्रेनर के रूप में सामने आए हैं. सबसे चर्चित नाम हैं शुभमन गिल और अभिषेक शर्मा.
कोविड लॉकडाउन के दौरान युवराज ने शुभमन गिल, अभिषेक शर्मा और कुछ अन्य युवा खिलाड़ियों के साथ लंबे ट्रेनिंग सेशन किए. गिल के खेल को फाइन-ट्यून करने में इन कैंप्स की भूमिका बताई गई है. अभिषेक शर्मा के साथ युवराज का रिश्ता और भी खास है. युवराज ने उनकी बल्लेबाजी पर काफी काम किया और आक्रामक खेल के साथ सही गेंद का इंतजार करने जैसी चीजों पर जोर दिया. अभिषेक खुद भी युवराज को अपने खेल के विकास में अहम मेंटॉर मानते रहे हैं.
इसके बाद युवराज की मेंटरशिप का दायरा और बढ़ा. प्रभसिमरन सिंह और प्रियांश आर्य जैसे पंजाब के युवा बल्लेबाजों को भी उनके साथ ट्रेनिंग करते देखा गया. युवराज की खासियत यह है कि वह खुद उस दौर से आए हैं जहां क्रिकेट में मानसिक दबाव, फिटनेस और लगातार प्रदर्शन की चुनौती का सामना करना पड़ा. इसलिए आज वह युवा खिलाड़ियों को सिर्फ शॉट खेलना नहीं, बल्कि दबाव में सही फैसले लेना और अपने खेल पर भरोसा करना भी सिखाते हैं.