पितृ पक्ष की नवमी पर महिलाओं का श्राद्ध किया जाता है. यह तिथि माताओं और मातृशक्ति को समर्पित है. खासतौर पर सुहागिन महिलाओं को, यानी कि जिनका निधन पति के जीवित रहते हुआ हो. इस मौके पर हम मातृ ऋण दोष की बात करते हैं, जिसकी चर्चा ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में मिलती है. माता का ऋण धन या उपहार से नहीं चुकाया जा सकता है. उनकी सेवा, स्मरण और उनके नाम पर किए गए सत्कर्म ही इस ऋण से उबार सकते हैं. मातृ नवमी का दिन इसके लिए विशेष है.
लाल किताब के अनुसार, जब चौथे भाव में केतु स्थित हो तो व्यक्ति के ऊपर मातृऋण होता है. चौथे भाव का स्थायी स्वामी चन्द्रमा को माना गया है, जिसका संबंध मां और मामा पक्ष से होता है. इस घर में केतु आए तो भाव दूषित हो जाता है और व्यक्ति मातृऋण से प्रभावित हो जाता है.
लाल किताब के अनुसार, मातृ ऋण के लक्षण धन, स्त्रियों, भोजन आदि से जुड़े होते हैं.
- मातृ ऋण से पीडि़त व्यक्ति को समय पर कहीं से सहायता नहीं मिलती है.
- ऐसे व्यक्ति की जमापूंजी भी व्यर्थ में खर्च हो जाती है. उस पर कर्ज हो जाता है.
- घर की शांति भंग हो जाती है. ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है कि वह सामने रखी थाली का भोजन भी सुख से नहीं कर पाता है. यानी कि जैसे ही वह खाना खाने बैठता है झगड़ा-क्लेश हो जाता है
- यदि कुंडली में मातृ ऋण दोष का संकेत मिले तो ऐसे में घर का हर सदस्य बराबर-बराबर मात्रा में चांदी लेकर सोमवार के दिन नदी में बहा दे.
- चंद्रमा की शांति करना भी मातृ ऋण दोष में कमी लाता है, इसके लिए भगवान शिव की उपासना करें.
- मातृ नवमी पर श्राद्ध करके परिवार की दिवंगत महिलाओं के प्रति श्रद्धा-सम्मान व्यक्त करें.
- उनके नाम से अनाज दान करें.
- सबसे महत्वपूर्ण बात किसी भी महिला का अपमान न करें.
(Disclaimer: मातृ ऋण और उससे जुड़े लक्षण-उपाय ज्योतिषीय एवं धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं. अलग-अलग परंपराओं में इसकी व्याख्या अलग हो सकती है. इसे वैज्ञानिक तथ्य या किसी समस्या का निश्चित कारण न माना जाए.)