हिंदू धर्म में विष्णु भगवान के दस अवतारों का बहुत बड़ा महत्व माना जाता है. जब-जब धरती पर पाप बढ़ा और बुराई हावी हुई, तब-तब विष्णु भगवान अलग-अलग रूप लेकर दुनिया को बचाने आए.
सतयुग में जब राक्षस हिरण्याक्ष ने पूरी पृथ्वी को समुद्र के गहरे पानी में छिपा दिया था, तब सृष्टि बचाने के लिए विष्णु भगवान ने अपना तीसरा अवतार लिया.
इस अवतार को वराह यानी सूअर अवतार कहा जाता है.आखिर भगवान को ये अनोखा रूप क्यों लेना पड़ा और कैसे हिरण्याक्ष का अंत हुआ, इसके बारे में हम इस खबर में डिटेल से जानेंगे.
इस कहानी की शुरुआत बैकुंठ धाम से होती है. श्रीमद्भागवत महापुराण के मुताबिक जय और विजय विष्णु भगवान के बैकुंठ धाम के दरबान थे.
एक बार सनकादि ऋषि बैकुंठ में जाना चाहते थे, पर जय और विजय ने उन्हें दरवाजे पर ही रोक दिया.
इस बात से नाराज होकर ऋषियों ने उन्हें राक्षस बनकर जन्म लेने का श्राप दे दिया. इसी श्राप की वजह से दोनों ने कश्यप ऋषि और दिति के घर जन्म लिया. वे आगे चलकर हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु नाम के दो बहुत शक्तिशाली राक्षस बने.
हिरण्याक्ष ने ब्रह्मा जी को खुश करने के लिए बहुत बड़ी तपस्या की. इससे खुश होकर ब्रह्मा जी ने उसे ये वरदान दे दिया कि वो किसी से नहीं हारेगा.
ये वरदान मिलते ही हिरण्याक्ष बहुत घमंडी हो गया. उसने देवलोक पर कब्जा कर लिया और देवताओं को परेशान करने लगा.
अपनी ताकत के नशे में उसने पूरी पृथ्वी को पानी में डुबो दिया और उसे समुद्र की गहराई में छिपा दिया. इससे पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया और सभी देवता डर गए.
जब पृथ्वी पर यह संकट आया, तो सभी देवता और ऋषि-मुनि ब्रह्मा जी के पास पहुंचे. ब्रह्मा जी ने देवताओं को बचाने के लिए विष्णु भगवान को याद किया.
उसी वक्त ब्रह्मा जी की नाक से एक छोटा सा वराह यानी सूअर का रूप निकला. देखते ही देखते वह बहुत बड़ा हो गया. विष्णु भगवान का ये रूप एक बड़े पहाड़ जितना विशाल था.
उनकी गर्जना से चारों तरफ आवाज गूंज उठी. इसके बाद वराह भगवान पृथ्वी को खोजने समुद्र के अंदर उतर गए.
नारद जी से वराह अवतार की खबर मिलते ही हिरण्याक्ष गुस्से से भर गया. वह तुरंत समुद्र के अंदर पहुंचा. वहां उसने देखा कि विशाल वराह भगवान अपने दांतों पर पूरी पृथ्वी को उठाकर बाहर ला रहे हैं.
हिरण्याक्ष ने विष्णु भगवान को लड़ाई के लिए ललकारा. दोनों के बीच समुद्र के अंदर जबरदस्त युद्ध हुआ.
आखिरकार वराह भगवान ने अपनी गदा से वार करके हिरण्याक्ष का वध कर दिया. फिर उन्होंने पृथ्वी को सुरक्षित लाकर उसकी सही जगह पर वापस रख दिया.
धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक वराह भगवान विष्णु का तीसरा अवतार हैं. हर साल भादो महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को वराह जयंती मनाई जाती है.
मान्यता है कि इसी दिन विष्णु भगवान ने धरती को संकट से बचाया था. मिथिला और काशी पंचांग के मुताबिक इस साल 2026 में वराह जयंती 13 सितंबर, रविवार को मनाई जाएगी.
कहा जाता है कि इस दिन वराह रूप की पूजा करने से जिंदगी के सारे कष्ट और डर दूर हो जाते हैं.