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कब है वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी और क्या है इस व्रत का महत्व? नोट करें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Sankashti Chaturthi 2026: इस बार वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी व्रत 29 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा. इस दिन गणेश जी के वक्रतुंड स्वरूप की विधि-विधान से पूजा की जाती है. आइए जानें भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त क्या है.

Written By Padma Shree Shubham
Published: Oct 22, 2026, 10:33 PM IST | Updated: Oct 23, 2026, 12:42 PM IST
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Vakratunda Sankashti Chaturthi 2026: हर माह में दो चतुर्थी तिथि पड़ती हैं. इसी तरह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भक्त वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखेंगे. इस साल वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का व्रत 29 अक्टूबर 2026 को गुरुवार के दिन रखा जाएगा. भगवान गणेश के ‘वक्रतुंड’ रूप की पूजा कर शाम के समय पारण करने का विधान है. वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी पर क्या शुभ मुहूर्त बन रहे हैं, इस दिन किस विधि से पूजा करें और इस व्रत का महत्व क्या है? आइए इस बारे में यहां विस्तार से जानें.

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का शुभ मुहूर्त

चतुर्थी तिथि प्रारम्भ - 29 अक्टूबर 2026 को आधी रात 01:06 बजे.
चतुर्थी तिथि समाप्त - 29 अक्टूबर 2026 को रात 10:09 बजे.
वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी व्रत गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा.
संकष्टी के दिन चंद्रोदय - रात 08:17 बजे
अभिजीत मुहूर्त - सुबह 11:48 बजे से लेकर  दोपहर 12:33 बजे तक.
अमृत काल - सुबह 08:17 बजे से लेकर  सुबह 09:44 बजे तक, आधी रात 01:01 बजे से लेकर प्रातः 02:29  बजे तक.
ब्रह्म मुहूर्त - सुबह 04:58 बजे से लेकर सुबह 05:46 बजे तक.

गणेश जी की पूजा विधि

चतुर्थी तिथि पर सूर्योदय से पहले उठ जाएं. स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें.
इस समय भगवान गणेश का ध्यान करें 
अब आचमन कर व्रत पूजा का संकल्प करें.
पूजा स्थल की साफ-सफाई करें
अब पंचोपचार कर भगवान गणेश की पूजा शुरू करें.
पीले रंग और दूर्वा अर्पित करें.
भोग में फूल, फल, मोदक चढ़ाएं.
अंत में आरती कर पूजा को संपन्न करें.
दिनभर उपवास रहें और शाम में फिर से गणेश जी की आरती करें.
इसके बाद व्रत का पारण कर लें.

वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी का महत्व

मुद्गल पुराण जैसे कई और अलग-अलग धर्मग्रन्थों में भगवान गणेश के कई रूपों का वर्णन मिलता है. ऐसी पौराणिक कथा है कि मत्सरासुर नामक दैत्य के वध करने के लिए भगवान गणेश ने वक्रतुण्ड रूप का धारण किया. अंततः युद्ध में गणेश जी से हारकर मत्सरासुर ने क्षमा मांगी और अपने प्राण बचाएं. वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी व्रत का संकल्प  करने से जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाओं का अंत होता है और दुख दूर होता है.

(डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार व्रत-त्योहारों की तिथि, पूजा-विधि एवं मान्यताओं में अंतर संभव है. पाठक इसे सामान्य धार्मिक जानकारी के रूप में देखें.)

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About the Author

पद्मा श्री शुभम् को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव. मॉस कम्‍युनिकेशन ग्रेजुएट और हिंदी लिटरेचर से पोस्‍ट ग्रेजुएट. मीडिया में डिजिटल प्लेटफॉर्म से करियर शुरू करने के बाद कई संस्थाओं में काम किया. Nedrick News, TFI Post जैसी संस्थाओं में कार्यरत रहीं. इसके बाद Zee News जॉइन किया. समाचार और वर्तमान घटनाओं पर लिखने पढ़ने में रुचि. धर्म और ज्योतिष में अधिक रुचि. वर्तमान में धर्म और ज्योतिष संबंधी लेख लिखने में कार्यरत. पद्मा से आप padma.shubham@India.com मेल के जरिए सीधे संपर्क कर सकते हैं.
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