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156 एकड़ का मंदिर: अंदर बसा है पूरा शहर, आखिर किसने बनवाया था इतना बड़ा देवालय?

आज हम भारत के सबसे बड़े मंदिर यानी श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, जो 156 एकड़ में फैला हुआ है, के बारे में डिटेल से बताएंगे. कावेरी नदी के द्वीप पर बने इस मंदिर-शहर का निर्माण चोल, पांड्य और विजयनगर राजवंशों ने कराया था.

Written By Harsh Singh
Published: Oct 26, 2026, 12:13 PM IST | Updated: Oct 26, 2026, 12:30 PM IST
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भारत में ऐसे बहुत से मंदिर हैं जो अपने-अपने खासियत के लिए जाने जाते हैं. लेकिन अगर आपको कोई कहे कि एक मंदिर ऐसा भी है जिसमें पुरा शहर बसता है.

जी हां, ऐसा है. तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में एक ऐसा मंदिर स्थित है. जिसके परिसर में पूरा शहर बसता है.

कहा जाता है ये दुनिया के सबसे छोटे देश, वेटिकन सिटी से भी बड़ा है. साथ ही इसे भारत का सबसे बड़ा मंदिर भी कहा जाता है.

अब आपके मन में ये भी सवाल आ रहा होगा कि ये मंदिर एक देश से भी बड़ा है वो कैसे. तो वेटिकन सिटी का साइज लगभग 109 से 121 एकड़ है

वहीं इस मंदिर का साइज युनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के मुताबिक 156 एकड़ का है. जो इसे देखने में बहुत विशाल बनाता है.

मंदिर का नाम श्री रंगनाथस्वामी मंदिर है. ये खूबसूरत मंदिर कावेरी नदी के द्वीप पर बना हुआ है. जो इसको और खास बनाती है.

ये मंदिर भगवान विष्णु के श्री रंगनाथ स्वरूप को समर्पित किया गया है. आज हम इस खबर में मंदिर के बारे में डिटेल से जानकारी देंगे.

किसने बनवाया ये विशाल मंदिर?

सबके मन में ये सवाल आ रहा होगा, कि आखिर इतने विशाल मंदिर को बनवाया किसने था. तो इसके पीछे बहुत सारी मान्यताएं हैं.

पौराणिक मान्यताओं के हिसाब से तो इस मंदिर को सबसे पहले राजा धर्म वर्मा ने कावेरी नदी के द्वीप पर कराया था.

लेकिन समय के साथ मंदिर ने कई समस्याएं झेली थी. बाढ़ की वजह से मंदिर रेत की परतों के नीचे पूरी तरह दब गया था.

मान्यता है कि बाद में चोल वंश के एक राजा अपने बगीचे में आराम कर रहे थे तभी वहां एक तोता बैठा था. उस तोते ने एक श्लोक कहा, जिससे प्रेरित होकर उन्होंने श्री रंगनाथस्वामी मंदिर को खोज निकाला.

पहली शताब्दी से 16वीं सदी तक किसने कराया निर्माण?

इस विशाल मंदिर का बनना किसी एक राजा के कार्यकाल में तो संभव नहीं था. इस मंदिर का निर्माण एक राजा ने नहीं बल्कि कई राजवंशों ने मिलकर करवाया था.

जिसमें सैकड़ों साल लगे थे. चोल राजाओं ने जब इसे खोजा तो इसके परिसर को बेहतर करने का काम किया था.

इसके बाद 13वीं सदी के चोल राजाओं, तंजौर के पांड्य शासकों और होयसल राजाओं ने इस मंदिर को और विशाल और बड़ा बनाया.

आगे चलकर 16वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य और नायक शासकों ने मंडपों और विशाल दीवारों को बनवाया था. ये जानकारी भी युनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के साइट से ली गई है. 

953 खंभों का मंडप

मंदिर के अंदर खूबसूरत और भव्य मंडप और कलाकृतियां बनी हुई हैं. जिसे देखकर आंखें खुली की खुली रह जाती है.

कभी कभी हम सोचते हैं तब के लोगों ने इन्हें कैसे डिजाइन किया होगा. विजयनगर काल में ग्रेनाइट पत्थरों से बना 953 खंभों का मंडप तैयार किया गया था.

जो किसी थिएटर की तरह लगता है. नायक शासक भी पीछे नहीं थे उन्होंने शेषरायर मंडप तैयार किया था, जो अपनी गजब के नक्काशी के लिए जानी जाती है.

खंभों पर पर उछलते हुए घोड़ों की 40 मूर्तियां बनाई गई हैं. जो बाघों को कुचल रही हैं.

236 फीट ऊंचा राजगोपुरम

श्री रंगनाथस्वामी मंदिर की बनावट भव्य है. ये मंदिर सात बड़ी दीवारों से घिरा है, जिन्हें प्राकारम कहा जाता हैं.

ये दीवारें ब्रह्मांड के सात लोकों को दर्शाती हैं. पूरे परिसर में कुल 21 गेट (यानी गोपुरम) बने हुए हैं.

इनमें सबसे मुख्य गेट राजगोपुरम है, जिसकी ऊंचाई 236 फीट है. ये पूरे एशिया का सबसे बड़ा गोपुरम है, जिसे करीब 16 किमी दूर से भी आसानी से देखा जा सकता है.

चूने-शहद के गारे से बनी मूर्ति और 4 दांतों वाला हाथी

इस मंदिर में भगवान रंगनाथ की मूर्ति किसी ग्रेनाइट पत्थर से नहीं बनी है. इसे चूने, गारे, कस्तूरी, कपूर, शहद, गुड़ और चंदन के विशेष लेप के मिश्रण यानी स्टुको से बनाया गया है.

मंदिर की दीवारों पर जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक रंगों से बनी दुर्लभ चित्रकारी मौजूद है. एक बेहद दिलचस्प बात ये है कि भगवान के यानै वाहन ( हाथी का वाहन) में 4 दांत बने हुए हैं.

विज्ञान के अनुसार 4 दांतों वाले हाथी 1.5 करोड़ साल पहले विलुप्त हो चुके हैं, जो इस मंदिर की प्राचीनता का संकेत देते हैं.

विभीषण और दक्षिण दिशा का पौराणिक रहस्य

रामायण काल से जुड़ी कथा के अनुसार, लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ने ये दिव्य मूर्ति विभीषण को उपहार में दी थी.

विभीषण जब इसे लंका ले जा रहे थे, तो वे कावेरी नदी के तट पर रुके. वहां के राजा धर्म वर्मा की प्रार्थना और भगवान की इच्छा से ये मूर्ति यहीं स्थापित हो गई और आगे हिलने से मना कर दिया.

वैसे तो भगवान ने विभीषण को रक्षा का वचन दिया. यही कारण है कि मंदिर में भगवान रंगनाथ का मुख दक्षिण दिशा यानी श्रीलंका की ओर है.

(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), ऐतिहासिक अभिलेखों और मंदिर के आधिकारिक दस्तावेजों पर आधारित है.

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About the Author

हर्ष सिंह जी न्यूज डिजिटल में एक अनुभवी और धारदार शैली के पत्रकार हैं. उन्होंने मार्च 2024 में जी न्यूज जॉइन किया था. वर्तमान में हर्ष धर्म और ज्योतिष से जुड़ी खबरों की खास कवरेज कर रहे हैं. वे देश-दुनिया के धार्मिक आयोजनों, अध्यात्म और ज्योतिषीय गणनाओं से जुड़े जरूरी अपडेट्स दर्शकों तक पूरी सटीकता के साथ पहुंचाते हैं. हर्ष को उनकी फैक्ट-आधारित और भरोसेमंद लेखन शैली के लिए जाना जाता है.बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन करने वाले हर्ष अपनी पूरी ऊर्जा और समझ के साथ धर्म-कर्म और ऐस्ट्रो की दुनिया के खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं.अगर आप हर्ष सिंह से संपर्क करना चाहते हैं या उनसे जुड़ा कोई सुझाव साझा करना चाहते हैं, तो उन्हें इस ईमेल आईडी पर लिख सकते हैं: Harsh.singh@India.com
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