)
श्रीनगर के फतेह कदल इलाके में एक बहुत पुराना श्री दुर्गेश्वरी मंदिर है. ये मंदिर सालों से वीरान पड़ा था. लेकिन अब बिना किसी सरकार की मदद के, स्थानीय लोगों ने मिलकर इसे फिर से सुंदर बना दिया है.
मां दुर्गा को समर्पित यह लगभग 700 साल पुराना मंदिर मुख्य रूप से उन कश्मीरी पंडितों द्वारा बहाल किया जा रहा है जो कभी यहां रहते थे.
इसमें मंदिर के आस-पास रहने वाले मुस्लिम निवासियों का भी सक्रिय सहयोग मिल रहा है.
माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1350 के आसपास राजा जैन-उल-आबिद्रीन बुदशाह के शासनकाल में हुआ था.
लंबे समय तक यह न केवल पूजा-स्थल रहा, बल्कि एक सामुदायिक केंद्र के रूप में भी काम करता रहा.
1910 में, यहां के सभी धर्मों के लोगों ने मंदिर परिसर में दुर्गा पाठशाला'नाम का एक प्राथमिक विद्यालय शुरू किया, जहां बच्चों को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के मुफ्त शिक्षा दी जाती थी.
बाना मोहल्ला और फतेह कदल के कश्मीरी पंडित परिवारों के लिए, ये मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं था, बल्कि ये उनकी जड़ों, त्योहारों, परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों से जुड़ा एक जीवंत माध्यम था.
साल 1989 के बाद हालात पूरी तरह बदल गए. आतंकवाद की वजह से घाटी में डर का माहौल बन गया था.
इस डर और हमलों के कारण करीब तीन लाख कश्मीरी पंडितों को अपना घर-बार और पुरानी जगहें छोड़कर जाना पड़ा. इसकी वजह से कश्मीर के सैकड़ों मंदिर वीरान हो गए और धीरे-धीरे खंडहर बन गए
दुर्गेश्वरी मंदिर भी इससे अछूता नहीं रहा. मंदिर परिसर पर आवारा कुत्तों, गायों, जंगली घास और मलबे का कब्जा हो गया.
सालों तक, जब भी कश्मीरी पंडित यहां वापस आते, तो वे टूटे हुए दरवाजों के बाहर से ही हाथ जोड़कर चले जाते थे.
हालात तब बदलने लगे जब लगभग एक महीने पहले, यहां के पूर्व निवासी शशि टिक्कू अपने पैतृक स्थान पर लौटे और देखा कि मंदिर की हालत इतनी खराब हो गई थी कि उसे पहचानना भी मुश्किल था.
टिक्कू ने कहा, "मैं अक्सर यहां आया करता था. हर साल जब मैं आता, तो बाहर से ही सम्मानपूर्वक सिर झुकाकर नमस्कार करता और चला जाता. लेकिन इस बार मैंने देखा कि गेट टूटे हुए पड़े थे, अंदर आवारा कुत्ते और गायें थीं, मलबा पड़ा था और घास काफी बड़ी हो गई थी. तब मेरे मन में आया कि जैसे हम अपना घर साफ रखते हैं, वैसे ही मुझे इसे भी साफ करना चाहिए. लेकिन अकेले यह संभव नहीं था. जब मैं यहां से जा रहा था, तो लोगों ने मुझे घेर लिया. उन्होंने कहा, 'नहीं, आप इसे कीजिए, हम पूरा सहयोग देंगे.' उन्होंने मुझे आर्थिक रूप से उतना सहयोग नहीं दिया, जितना कि अन्य कई तरीकों से मदद की," टिक्कू ने याद करते हुए बताया.
जो काम एक व्यक्ति के प्रयास से शुरू हुआ था, वह जल्द ही एक सामूहिक आंदोलन बन गया. टिक्कू ने सबसे पहले अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके गेट बनवाए और लगभग चार-पांच कनाल में फैले इस परिसर को सुरक्षित किया.
इसके बाद उन्होंने इलाके में रहने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के अन्य पूर्व निवासियों से संपर्क किया.
सबकी मदद लेने के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया. इसके बाद लोगों ने पैसे जोड़े और जरूरी सामान जुटाया. मंदिर में पानी और बिजली का कनेक्शन लिया गया.
साफ-सफाई और रंग-रोगन का काम पूरा किया गया. सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए, जिनका कंट्रोल रूम पास के ही एक मुस्लिम परिवार के घर में रखा गया. यह आपसी भाईचारे की एक बहुत बड़ी मिसाल है.
टिक्कू ने कहा. "मेरा हर काम आराम से और धीरे-धीरे होता गया, इसलिए मुझे लगा कि भगवान का मुझ पर आशीर्वाद है. या इसे आप नेक नीयत कह लें, जो भी कहें मैं तो बस एक मामूली इंसान हूं, लेकिन फिर भी कहूंगा कि ऊपर वाले का साथ है. नल आसानी से लग गया, बिजली का कनेक्शन भी मिल गया, और थोड़ा-बहुत पैसा भी आने लगा. लेकिन हां, आर्थिक रूप से हमें सबकी थोड़ी मदद चाहिए, क्योंकि यहां रहने वाले बुजुर्ग अपनी पेंशन पर निर्भर हैं. ऐसे में मैं अकेले कितना कर सकता हूं? स्थानीय लोगों ने आर्थिक रूप से तो कोई खास मदद नहीं की है, वैसे भी, पैसों के लिए किसी से मदद मांगना अच्छा नहीं लगता. लेकिन पैसों के अलावा भी, जैसे मान लीजिए हम पेंटिंग कर रहे हैं और पानी न हो, तो काम कैसे होगा? अगर सीढ़ी न हो, तो इतनी ऊंचाई पर कैसे चढ़ेंगे? या फिर कभी हथौड़े की जरूरत पड़ी, इन सब चीजों में उन्होंने मदद की," उन्होंने कहा.
यहां रहने वाले लोग भी इसे अपनी साझा जिम्मेदारी मानते हैं और मंदिर निर्माण कार्य में पूरा सहयोग दे रहे हैं.
पास ही रहने वाले एक इलेक्ट्रीशियन, फयाज अहमद ने बताया कि "मैं यहीं पास में रहता हूं. मुझे बचपन से ही पता था कि यहां एक मंदिर है. जब भी मैं इस तरफ आता था, तो मंदिर को देखता था. पहले यहां काफी चहल-पहल रहती थी. लोग पूजा-पाठ करते थे और पंडित समुदाय के लोग यहां पूजा करने आते थे. मैं भी कभी-कभी उन्हें देखता था. पिछले 10-20 सालों से यह जगह वीरान पड़ी थी. अब यहां काम शुरू हो गया है. अब काफी बदलाव आ गया है. यह खुशी की बात है कि पंडित समुदाय के लोग यहां आकर पूजा-पाठ करते हैं. इससे हमें भी मानसिक शांति मिलती है, और उन्हें भी."
मंदिर को ठीक करने के साथ ही टिक्कू जी ने सरकारी अधिकारियों से भी बात की. उन्होंने श्रीनगर के डिप्टी कमिश्नर से मिलकर एक आवेदन दिया.
उन्होंने ये भी कहा कि मंदिर के पास खाली पड़ी जमीन पर एक पार्क बनाया जाए, ताकि सभी धर्मों के बच्चे वहां खेल सकें.
जिंदा हो रही है सांस्कृतिक विरासत
आज मंदिर लगभग तैयार है. जल्द ही यहां फिर से घंटियां बजेंगी और आस-पास के इलाकों में शंख की ध्वनि सुनाई देगी.
बाना मोहल्ला और फतेह कदल में पीढ़ियों से रह रहे कश्मीरी पंडित परिवारों के लिए, यह जीर्णोद्धार केवल एक इमारत की मरम्मत नहीं है.
यह अपनी यादों और सम्मान को वापस पाने जैसा है, और कश्मीर की मिली-जुली सांस्कृतिक विरासत के एक हिस्से को फिर से जीवित करने जैसा है.
इस पहल ने एक उम्मीद जगाई है कि कश्मीर की अन्य जगहों पर भी इसी तरह के सामुदायिक प्रयासों से, घाटी में उपेक्षित पड़ी अन्य धरोहरों को पुनर्जीवित किया जा सकता है.
अगर ऐसा होता है, तो यह सिर्फ मंदिरों के जीर्णोद्धार से कहीं बढ़कर होगा.
यह उस सदियों पुराने भाईचारे के एक हिस्से को फिर से बहाल करने में मदद करेगा, जो कभी सूफियों और संतों की भूमि, कश्मीर की पहचान हुआ करता था.
खालिद हुसैन
जी मीडिया कश्मीर