कौन से पेड़ से बरसा था सोना? दशहरे पर आज भी होती है इसकी पूजा, बांटी जाती हैं पत्तियां
दशहरा पर्व इस साल 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा. इस मौके पर दशहरे से जुड़ी एक रोचक कहानी जानते हैं कि कैसे एक पेड़ से सोना बरसा था. उसकी याद में आज भी लोग उस पेड़ की पूजा करते हैं और समृद्धि की कामना करते हुए उसकी पत्तियां बांटते हैं.
दशहरा या विजयादशमी पर्व केवल रावण दहन की घटना तक सीमित नहीं है. बुराई पर अच्छाई की जीत का यह पर्व देश भर में फैली कई परंपराओं को समेटे हुए है. आज हम एक ऐसी ही परंपरा और उससे जुड़ी कहानी के बारे में जानते हैं जिसके चलते देश के कुछ राज्यों में दशहरा के दिन लोग एक खास पेड़ की पत्तियां एक-दूसरे को बांटते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. ये है शमी का पेड़.
क्या है परंपरा?
दशहरा के दिन शमी के पेड़ की पूजा करने की परंपरा है. यहां तक कि कुछ जगहों पर लोग एक-दूसरे को शमी के पेड़ की पत्तियां बांटते हैं और धन-समृद्धि की कामना करते हैं. वहीं महाराष्ट्र में आपटा के पेड़ की पत्तियां बांटी जाती हैं. वहीं दशहरा के दिन घर में या खेत में शमी का पेड़ लगाना भी शुभ माना जाता है.
क्या है कहानी?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में महर्षि वर्तन्तु हुआ करते थे. उनके एक शिष्य थे कौत्स. महर्षि ने अपने शिष्य कौत्स से शिक्षा पूरी होने के बाद गुरू दक्षिणा के रूप में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्रा की मांग की. चूंकि शिष्य के पास तो इतनी स्वर्ण मुद्राएं थीं नहीं तो वे गुरू दक्षिणा की मांग को पूरा करने के लिए महाराज रघु के पास पहुंचे.
महाराज रघु ने कुछ दिन पहले ही एक महायज्ञ करवाया था, जिसके कारण उनका खजाना खाली हो चुका था. ऐसे में जब उनके पास कौत्स पहुंचे तो उन्होंने उनकी मांग को पूरी करने के लिए 3 दिन का समय मांगा. महाराज रघु ने अपने पास आए कौत्स की मांग पूरी करने के लिए 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं जुटाने के कई उपाय सोचे, लेकिन इतने कम समय में इतनी बड़ी मात्रा में स्वर्ण मुद्राएं जुटाना आसान नहीं था.
तब राजा रघु ने सोचा कि इसका एक ही उपाय है कि स्वर्गलोक पर आक्रमण किया जाए और वहां से मिले धन से कौत्स की मांग पूरी की जा सकती है. राजा के मन में जैसे ही यह विचार स्वर्ग में बैठे देवराज इंद्र घबरा गए और कोषाध्याक्ष कुबेर से रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करने का आदेश दिया.
इंद्र के आदेश पर रघु के राज्य में कुबेर ने शमी वृक्ष के माध्यम से स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करा दी. माना जाता है कि जिस तिथि को स्वर्ण की वर्षा हुई थी उस दिन विजयादशमी थी. तब राजा ने शमी वृक्ष से प्राप्त स्वर्ण मुद्राएं कौत्स को दे दीं. साथ ही प्रजा को भी बांटीं. इस घटना के बाद विजयादशमी के दिन शमी के वृक्ष के पूजा होने लगी.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई कथा और मान्यताएं धार्मिक एवं पौराणिक परंपराओं पर आधारित हैं. अलग-अलग क्षेत्रों और ग्रंथों में इनसे जुड़े विवरणों में अंतर मिल सकता है.)